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राज्यसभा में पास होने के बाद भी लटक सकता है कोई बिल, ये है उदाहरण

बिल एक पूरी प्रक्रिया से तैयार होकर और पास होकर नये कानून का रूप लेता है. लेकिन, एक सवाल ये भी है क्या ये संभव है कि कोई बिल लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बावजूद कानून का रूप न लें. लेकिन, इतिहास के पन्नों को खंगालें तो देश में एक बिल के साथ ऐसा भी हुआ है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 11 December 2019
राज्यसभा में पास होने के बाद भी लटक सकता है कोई बिल, ये है उदाहरण राज्यसभा में चल रही है कैब पर चर्चा

संसद में भारी गतिरोध के बाद मंगलवार को CAB यानी सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल पास हो गया. अब राज्यसभा में इस पर बहस जारी है. जानिए, राज्यसभा में पारित होने के बाद किस तरह कोई बिल एक कानून का रूप लेता है. कोई बिल एक पूरी प्रक्रिया से तैयार होकर फिर इस तरह पास होकर नये कानून का रूप लेता है. लेकिन, एक सवाल ये भी है क्या ये संभव है कि कोई बिल लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बावजूद कानून का रूप न लें. लेकिन, इतिहास के पन्नों को खंगालें तो देश में एक बिल के साथ ऐसा भी हुआ है.

बिल क्या होता है?

नये कानून के निर्माण के लिए या किसी पुराने कानून को बदलने के लिए सबसे पहले अधिनियम लाया जाता है. पहले चरण में नये कानून को बनाने के लिए मुख्य प्रस्ताव, सुझाव या पुराने कानून में बदलाव के प्रस्ताव या सुझाव लाये जाते हैं. विधेयक एक तरह का प्रस्ताव होता है, इसे कानून में ढालने के लिए इसे तीन चरणों से गुजरना होता है. विधेयक को कानून बनाने के लिए 5 चरणों से गुजरना होता है.

पहले तीन चरणों में विधेयक पर दोनों सदनों लोकसभा, राज्यसभा में चर्चा होती है. यहां चर्चा के बाद विधेयक को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा जाता है. चौथे चरण में विधेयक को दोनों सदनों की साझा बैठक में पास किया जाता है. विधेयक के आखिरी यानी पांचवे चरण में इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. फिर राष्ट्रपति की मुहर के बाद ही ये विधेयक कानून का रूप लेता है. नियम के अनुसार अगर राष्ट्रपति चाहे तो अपनी वीटो पॉवर का इस्तेमाल करके इसे लटका सकता है.

चर्चा के बाद होती है वोटिंग

विधेयक पर चर्चा के बाद इस पर सवालों और संशोधनों पर वोट कराया जाता है. फिर विधेयक पर चर्चा शुरू होती है. फिर इस पर उठे सवालों को वोट के लिए सदन में रखते हैं. फिर सदन में पास होने के बाद बिल को आधिकारिक राजपत्र के तौर पर पब्लिश किया जाता है. इसे सिर्फ स्पीकर की इजाजत से पब्लिश किया जा सकता है. चर्चा के बाद विधेयक में संशोधन के सुझाव को शामिल किया जाता है इसके बाद विधेयक को स्टैंडिंग कमेटी में भेजा जाता है.

आखिरी चरण में संचालक अधिकारी विधेयक की जांच करके इसपर एक रिपोर्ट तैयार करता है. स्टैंगिंग कमेटी विधेयक पर विशेषज्ञों से राय लेकर सुझावों को विधेयक में शामिल किया जा सकता है. ठीक ये ही प्रक्रिया राज्यसभा में भी होती है.

राष्ट्रपति की मुहर जरूरी

राज्यसभा में बिल पास होने के बाद इसमें राष्ट्रपति की मुहर लगना जरूरी है. इसके बाद ही कोई बिल यानी विधेयक कानून का रूप लेता है. ये दोनों सदनों की साझा बैठक के बाद ही राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद ही विधेयक कानून का रूप ले लेता है, फिर ये पूरे देश में लागू होता है.

जब इस राष्ट्रपति ने नहीं किया था हस्ताक्षर

साल 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी. ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद देश में उनके खिलाफ माहौल काफी खराब हो गया था. ऐसे में देश के पहले सिख राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह पर इस्तीफा देने का दबाव बढ़ रहा था. वो इंदिरा गांधी से बेतरह नाराज थे. ज्ञानी जैल सिंह को उनके समर्थकों ने समझाया कि ऐसे वक्त में ये अगर सियासी कदम उठाने से सिखों और गैरसिखों के बीच की फांक और गहरी हो जाएगी. वो फिर भी स्वर्णमंदिर गए. इसके बाद इंदिरा गांधी को 31 अक्टूबर को उनके अपने ही सुरक्षा दस्ते के दो जवानों (जो धर्म से सिख थे) ने गोली मार दी थी. उस वक्त राष्ट्रपति ओमान के राजकीय दौरे पर थे और इंदिरा के राजनीतिक वारिस राजीव गांधी पं. बंगाल के दौरे पर थे. राजीव गांधी वापस आए और बिना राष्ट्रपति का इंतजार किए, उपराष्ट्रपति से प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई.

इससे राजीव और तत्कालीन राष्ट्रपति के बीच राजनीतिक खाईं और भी गहरी हो गई. एक संवैधानिक व्यवस्था के सहारे ज्ञानी जैल सिंह ने सरकार पर नकेल कसनी शुरू की. इसी कड़ी में जब राजीव सरकार ने राज्यसभा में पास हो चुका पोस्टल एमेंडमेंट बिल भेजा तो ज्ञानी जैल सिंह ने वीटो का इस्तेमाल कर दिया. इस पॉवर से राष्ट्रपति स्वीकृति के लिए आए किसी बिल को अनियमित काल तक अपने पास रोक सकते हैं.

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