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'योगी' जिस संप्रदाय से आते हैं, वहां साधु अंत में धूनी रमाते हैं...

'योगी' जिस संप्रदाय से आते हैं, वहां साधु अंत में धूनी रमाते हैं...
aajtak.in [Edited By: आरती मिश्रा]नई दिल्‍ली, 20 May 2017

जिस नाथ सम्प्रदाय से यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ हैं, ऐसी मान्‍यता है कि उसकी स्थापना आदिनाथ भगवान शिव ने की थी. यह कथा प्रचलित है कि भगवान से ही मत्स्येन्द्रनाथ ने ज्ञान प्राप्त किया था और फिर मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य गोरखनाथ हुए.

गोरखनाथ के कारण नाथ संप्रदाय बहुत लोकप्रिय हो गया. उन्‍होंने बारह पंथी मार्ग बताया जो नाथ संप्रदाय कहलाया. कहा जाता है कि उसी के बाद से इस संप्रदाय को मानने वाले लोग अपने नाम के पीछे नाथ लगाने लगे. मान्‍यताओं के अनुसार नाथ संपद्राय से जुड़े लोग कान छिदवाते हैं. चूंकि ये गोरखनाथ के अनुनायी होते हैं इसलिए इन्‍हें गोरखनाथी भी कहा जाता है.

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क्‍या करते हैं नाथ साधु
ऐसी मान्‍यता है कि नाथ संप्रदाय के साधु-संत, दुनिया भर में भ्रमण के बाद, उम्र के अंतिम चरण में, किसी एक स्थान पर रुकते हैं और वहां अखंड धूनी रमाते हैं. अगर वे ये ना करना चाहें तो हिमालय में खो जाते हैं. बताया गया है कि एक नाथ साधु के हाथ में चिमटा और कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करते हैं.

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ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ भी रखते हैं जिसे 'सिले' कहा जाता है. गले में एक सींग की नादी रखते हैं, इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं.


महंत अवैद्यनाथ ने गढ़वाल के विज्ञान स्नातक अजय सिंह बिष्ट को 15 फरवरी 1994 को उत्तराधिकारी बनाया. और इस तरह से देश की राजनीति में एक युवा हिंदू नेता योगी आदित्यनाथ का उदय हुआ. चार वर्ष बाद 1998 में योगी आदित्यनाथ नाथ गोरखपुर से चुनाव लड़े और 26 वर्ष की आयु में सांसद बन गए.

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