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जानें, कब है रंग भरी एकादशी और क्या है इसका महत्व

फाल्गुन शुक्ल-एकादशी को काशी में रंगभरी एकादशी कहा जाता है. इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और काशी में होली का पर्वकाल प्रारंभ हो जाता है.

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आजतक ऑनलाइन टीम 20 February 2018
जानें, कब है रंग भरी एकादशी और क्या है इसका महत्व रंग भरी एकादशी 2018

फाल्गुन शुक्ल-एकादशी को काशी में रंगभरी एकादशी कहा जाता है. इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और काशी में होली का पर्वकाल प्रारंभ हो जाता है. पौराणिक परम्पराओं और मान्यताओं के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के उपरान्त पहली बार अपनी प्रिय काशी नगरी आए थे. इस पर्व मे शिव जी के गण उन पर व समस्त जनता पर रंग अबीर गुलाल उड़ाते, खुशियाँ मानते चलते हैं. इस दिन से वाराणसी में रंग खेलने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है जो लगातार छह दिन तक चलता है.

ब्रज में होली का पर्व होलाष्टक से शुरू होता है वही वाराणसी में यह रंग भरी एकादशी से शुरू हो जाता है. इस दिन शिव जी को विशेष रंग अर्पित करके धन सम्बन्धी तमाम मनोकामनाएं पूरी की जा सकती हैं. इस बार रंग भरी एकादशी 26 फरवरी को जाएगी.

जानिए, कब, कहां और कैसे मनाई जाएगी होली

रंगभरी एकादशी पर किस प्रकार करें उपासना ताकि आर्थिक समस्याएं दूर हों?

- प्रातःकाल स्नान करके पूजा का संकल्प लें

- घर से एक पात्र में जल भरकर शिव मंदिर जाएँ

- साथ में अबीर गुलाल चन्दन और बेलपत्र भी ले जाएँ

- पहले शिव लिंग पर चन्दन लगाएं , फिर बेल पत्र और जल अर्पित करें

- सबसे अंत में अबीर और गुलाल अर्पित करें

- फिर आर्थिक समस्याओं के समाप्ति की प्रार्थना करें

रंग भरी एकादशी का आंवले से क्या सम्बन्ध है?

- इस एकादशी पर आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है

- साथ ही आंवले का विशेष तरीके से प्रयोग किया जाता है

- इससे उत्तम स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है

- इसीलिए इस एकादशी को "आमलकी एकादशी" भी कहा जाता है

इस एकादशी पर किस तरह करें आंवले के वृक्ष की पूजा?

- प्रातः काल आंवले के वृक्ष में जल डालें

- वृक्ष पर पुष्प , धूप , नैवेद्य अर्पित करें

- वृक्ष के निकट एक दीपक भी जलाएं

- वृक्ष की सत्ताइस बार या नौ बार परिक्रमा करें

- सौभाग्य और स्वास्थ्य प्राप्ति की प्रार्थना करें

- अगर आंवले का वृक्ष लगाएं तो और भी उत्तम होगा

इस एकादशी पर आंवले का प्रयोग कैसे करें?

- माना जाता है कि आंवले की उत्पत्ति भगवान विष्णु के द्वारा हुयी थी

- आंवले के प्रयोग से उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है

- और आंवले के दान से गौ दान का फल मिलता है

- इस दिन आंवले का सेवन और दान करें

- इसके बाद कनक धारा स्तोत्र का पाठ करें

- हर तरह की दरिद्रता का नाश होगा

साभार..............

शैलेन्द्र पाण्डेय - ज्योतिषी

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