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क्या पहाड़-क्या मैदान: आफत के सैलाब में बह गया सब कुछ

सदियों से क़ुदरत ने जब जब अपना तेवर बदला तो तबाही के ऐसे निशान छोड़े कि एक पल में इंसान और इंसानी बस्तियों को मिटा गए. क़ुदरत के क़हर ने कई कई बार अनगिनत ज़िन्दगियों को हमेशा के लिये ख़ामोश कर दिया.

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aajtak.in
परवेज़ सागर नई दिल्ली, 25 September 2018
क्या पहाड़-क्या मैदान: आफत के सैलाब में बह गया सब कुछ उत्तराखंड और हिमाचल में कुदरत अपना कहर बरपा रही है

एक-एक कस्बे को बसाने और संवारने में सदियां लग जाती हैं. पर उजड़ने में लगते हैं सिर्फ चंद मिनट. आसमान से आई आफत फकत चंद मिनट की होती है. पर उस आफत से उबरने में बरसों लग जाते हैं. बादल की शक्ल में मानसून से लिपट कर आई बारिश और फिर सैलाब ने हाल ही में उत्तराखंड और हिमाचल के कई इलाकों में वो कहर बरपाया कि घर, खेत-खलिय़ान, बस, ट्रक गाड़ियां सब बह गईं. पर क्या ये आफत सचमुच आसमानी है? यह क़हर वाकई आसामन से टूटा है? या फिर इसकी बुनियाद ज़मीन पर पड़ी है?

कुदरत से छेड़छाड़ का नतीजा

बहती बस. बहता ट्रक. बहते लोग. उफनती नदियां. ग़ुस्साई लहरें. कहते हैं कि क़ुदरत कभी भी किसी को परेशान नहीं करती लेकिन ये बस तब तक सही है जब तक आप उसे छेड़ें नहीं. उत्तराखंड या हिमाचल के दामन में ख़ौफ़ के जो मंज़र इधर उधर बिखरे पड़े हैं, वो दरअसल सालों से क़ुदरत के साथ की जा रही लागातार छेड़छाड़ का नतीजा हैं.

इंसानी लापरवाही का अंजाम

कोई ख़ामोश रहे और कुछ न कहे तो इसका मतलब ये नहीं कि वो कमज़ोर है. मगर हवस के ठेकेदारों को ये कहां पता था. लेकिन मान लीजिये कि अगर उन्हें इसका पता भी होता तो शायद वो इसे ज़ाहिर नहीं करते क्योंकि लालच उन्हें ऐसा करने नहीं देती. कुल मिलाकर उत्तराखंड या हिमाचल में क़ुदरत ने जो कुछ किया वो पिछले क़रीब तीस-पैंतीस सालों की इंसानी लापरवाहियों का नतीजा हैं. लेकिन ये लापरवाहियां इतनी बड़ी क़ीमत अदा करेंगी शायद इन लालच के कारोबारियों को इसका ज़रा भी इल्म नहीं था वरना शायद. लेकिन अब सायद शब्द का कोई मतलब नहीं रह गया है.

कुदरत की ताकत के सामने बेबस इंसान

सदियों से क़ुदरत ने जब जब अपना तेवर बदला तो तबाही के ऐसे निशान छोड़े कि एक पल में इंसान और इंसानी बस्तियों को मिटा गए. क़ुदरत के क़हर ने कई कई बार अनगिनत ज़िन्दगियों को हमेशा के लिये ख़ामोश कर दिया. मासूम और बेगुनाह क़ुदरती क़हर के आगे बेबस और लाचार नज़र आए. क़ुदरत हर बार बेधड़क क़हर बरपाती रही और इंसानियत उजड़ती रही. क्योंकि क़ुदरत की ताक़त पर इंसान या इंसानी क़ानून का बस नहीं चलता.

सुनामी का खौफनाक कहर

समंदर की ये लहरें अपने साथ कोई कचरा नहीं, बल्कि पूरे के पूरे शहर को उखाड़ कर ले जा रही है. ये तस्वीरें मार्च 2011 की हैं. जब जापान में पहले भूकंप और फिर सुनामी आई थी. भूकंप के आधा घंटे बाद आई सुनामी ने पूरे के पूरे कस्बे को खत्म कर दिया. लोगों ने अपनी आंखों से शहर को उजड़ते देखा. और तबाही के इस मंज़र को अपने कैमरे में कैद किया.

किसका है कुसूर?

पर इतनी बड़ी तबाही के बावजूद, शहर और कस्बे के पूरी तरह उजड़ जाने के बाद भी जापान की इस सुनामी में मरने वालों की तादाद कम थी. जो तबाही हुई थी उसके हिसाब से लाखों मौत होनी चाहिए थी. पर ऐसा नहीं हुआ. फिर हमारे य़हां ऐसा क्यों? क्या ये सिर्फ बादल फटने का नतीजा है. सैलाब का कुसूर? या फिर सच कुछ और है? एक ऐसा सच जो सबको पता है पर जिससे सबने आंखें मूंद रखी हैं.

नदियों ने धारण किया रोद्र रूप

अचानक गर्मी से तपते देश में मानसून ने इस बार वक्त पर दस्तक दी थी. राहत की ये बारिश देखते ही देखते आफ़त में बदल गई. उत्तराखंड के दामन में बहने वाली अलकनंदा की सभी सहेलियां भागीर थी, धौली, पिंडर, मंदाकिनी, विष्णुगंगा ने अचानक उस इंसान को चुनौती देने की ठान ली जो घमंडी हो चुका है. जिसे लगता है कि क़ुदरत के दिन और रात भी उसकी बनाई सरकारों के ग़ुलाम हैं. मौसम उसके ही अध्यादेशों का पालन करते हैं.

नदियों से गैरकानूनी छेड़छाड़

सूरज, चांद, बादल, हवाएं सब आगे बढ़ने से पहले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, चीफ़ इंजीनियर और सरकारी बाबू से इजाज़त लेकर और बेलगाम ठेकेदारों को कुछ खिला-पिलाकर आगे बढ़ते हैं. पर इस बार अचानक इन नदियों ने फ़ैसला कर लिया कि वह तरक्की के नाम पर की जा रही इस गैरकानूनी छेड़छाड़ से अपनी ज़मीन को पाक करेंगे.

पहाड़ों में सेंध लगाकर बनाई सुरंगें

और फिर कुदरत ने अपना दामन साफ़ करना शुरू किया. उफनती नदियों के इस तांडव ने उत्तराखंड, हिमाचल, के कई हिस्सों को जलमग्न कर दिया. विकास के नाम पर जिस तरह ज़िदगी देने वाली इन नदियों को बांधा जा रहा है, जिस तरह इन पहाड़ों में, जिनसे लिपटकर ये नदियां मैदान पर उतरती हैं, इन भीगीरथी जटाओं में, सेंध लगाकर अनगिनत सुरंगे खोदी जा रही हैं, उनके ख़िलाफ़ क़ुदरत का ये ग़ुस्सा भी है और चेतावनी भी.

तबाही के लिए इंसान जिम्मेदार

कुल मिलाकर लापरवाह सरकारी और सामाजिक दोहन पर कुदरत का ज़ोरदार तमाचा है ये. ये है अनियंत्रित विकास का वह मॉडल जो चुटकी बजाते सब कुछ पा लेना चाहता है. पिछले लगभग तीस-पैंतस सालों में, उत्तराखंड-हिमाचल में विकास और पर्यटन के नाम पर हर तरह की दुकानें खुल गई हैं. मनमाने तरीके से यहां ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त हो रही है. अंधाधुंध खुदाई चल रही है. बिजली के नाम पर जगह जगह डैम बनाकर नदियों को बांधा जा रहा है. विकास के लिए टिहरी जैसी प्राचीन बस्तियों की आहुति ले ली गई. नतीजा सामने है. यानी क़हर आसमानी ज़रूर था पर बुनियाद इंसानों ने ही रखी थी.

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