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73 पन्नों की चार्जशीट में दर्ज है 'शेल्टर होम कांड' की खौफनाक कहानी

Shelter Home Sexual Harassment Chargesheet Disclosure बेसहारा लड़कियों को सहारा देने के नाम पर बिहार के मुज़फ़्फरपुर में सात से 17 साल की उम्र की लडकियों के साथ महीनों बलात्कार होता रहा और सरकार चुप रही.

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aajtak.in [Edited by: परवेज़ सागर]नई दिल्ली, 08 January 2019
73 पन्नों की चार्जशीट में दर्ज है 'शेल्टर होम कांड' की खौफनाक कहानी CBI ने इस मामले में 73 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है

वो कहते थे फेंको मत हमें दे दो. हम पालेंगे. दुनिया ने समझा मज़लूमों की मदद करने मसीहा आ गया. बेसहारा यतीमों के सिर पर हाथ रखने वाला सहारा आ गया. मगर ये नज़रों का धोखा था. वो बसेहारा बच्चियों के सिर पर हाथ तो रखता था, मगर सिर्फ अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए. बिहार के मुज़फ्फरपुर के उस शेल्टर होम या यूं कहें कि बालिका गृह की कहानी तो आपको याद होगी जो इतिहास के पन्नों में बिहार के सबसे बड़े रेप कांड के नाम से दर्ज हो चुका है. अब उसी रेप कांड की कहानी को सीबीआई ने 73 पन्नों में कलमबंद कर अदालत को सौंप दी है. 73 पन्नों में सिमटी 34 मासूम बच्चियों की चीखों की ये चार्जशीट बताएगी कि बिहार के मुज़फ्फरपुर के बालिका गृह का वो नंगा और खौफनाक सच था क्या?

मुज़फ्फरपुर के शेल्टर होम में जिन बच्चियों को उन अश्लील गानों के लफ्ज़ों के मानी भी नहीं मालूम थे. उन्हें उन पर नचाया गया. गंदी फिल्मे दिखाई गईं. नशे के इंजेक्शन और दवाएं दी गईं. खुले और भद्दे कपड़े पहनाए गए. महफिलों का सामान बनाया गया. रेप किया गया. और वो ये सब सहती रहीं. सहती रहीं क्योंकि और रास्ता भी नहीं था. करतीं भी तो क्या. जातीं भी तो कहां. किससे कहतीं कि उनके साथ क्या हो रहा है. उनका तो कोई था ही नहीं. इसीलिए तो वो यहां आईं थीं. मगर यहां भी... मत पूछिए उनके साथ क्या क्या हुआ. उन्होंने क्या क्या सहा.

इस मामले में दाखिल की गई 73 पन्नों की चार्जशीट के हर एक पन्ने पर मुजफ्फरपुर बालिका गृह की उन लड़कियों की चीखें हैं. नोचे-खसोटे गए उनके बदन की तरह नाखून की खरोंचे हैं. सूखे हुए आंसू हैं. घबराई हुई पथराई आंखें हैं. सहमी हुई सिसकियां हैं. ज़ख्मों पर सूखी हुई पपड़ियां हैं. भूख है. प्यास है. और बरसों की छलनी रुह है.

क्या करतीं बेचारी. सहतीं भी थी. यहीं रहती भी थीं. जो हैवानों के सामने खुद को सौंप देती थीं वो दर्द से रोती थीं. और जो मना कर दिया करती थीं वो भूख से तड़पती थीं. खाना नहीं दिया जाता था उन बच्चियों को, जो ब्रृजेश ठाकुर और उसके मेहमानों के सामने अश्लील गानों पर थिरकने से. और खुद को ठाकुर के मोहमानों के आगे परोसने से मना कर देतीं. इन मेहमानों में में नेता भी थे. अफसर भी. ओहदेदार भी और रसूखदार भी.

सीबीआई की तरफ से तैयार इस चार्जशीट के मुताबिक बिहार में मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका गृह में रह रहीं 42 लड़कियों में से 34 के साथ बलात्कार किया गया. बलात्कार की शिकार लड़कियों की उम्र 7 से 13 साल की थी. एक तो सिर्फ 3 साल की थी. पर ब्रजेश ठाकुर ने उसे भी नहीं बख्शा बेहयाई को भी शर्म आ जाए. मगर इन्हें नहीं आई.

खैर जो इन्हें करना था इन्होंने कर दिया. अब अदालत की बारी है. सीबीआई ने अदालत में 73 पन्नों का आरोप पत्र दाखिल किया है. सीबीआई ने ठाकुर और 20 अन्य के खिलाफ रेप, समेत पॉक्सो की धारा 19 के तहत भी मामला दर्ज किया है. सीबीआई ने सबूत के तौर पर 143 दस्तावेज और 102 गवाह शामिल किए हैं. चार्जशीट में सभी आरोपियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. जिनमें लड़कियों को गंदे भोजपुरी गानों पर डांस कराने. उन्हें नशे के इंजेक्शन और दवा देने, अश्लील फिल्में दिखाने और इसके बाद उनके साथ अश्लील करने का ज़िक्र है.

आरोपों के समर्थन के लिए सीबीआई ने 102 गवाहों के सबूत भी पेश किए हैं. जिनमें बताया गया है कि कैसे बालिका गृह के मालिक ब्रजेश ठाकुर ने लड़कियों को खुले कपड़े पहनने, भोजपुरी गानों पर नाचने, नशा करने और मेहमानों द्वारा बलात्कार करने पर मजबूर किया. और मना करने पर उन्हें भूखा रखा. हालांकि बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में उन सरकारी अधिकारियों के नाम छोड़ दिए हैं जो इन ज़्यादतियों और उत्पीड़न के बारे में जानते थे. मगर उन्होंने ना तो उन्होंने हस्तक्षेप किया और ना कोई कार्रवाई ही की.

सीबीआई ने जिन 21 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायक की है, उनमें ब्रजेश ठाकुर, इंदू कुमारी, मीनू देवी, मंजू देवी, चंदा देवी, नेहा कुमारी, हेमा मसीह, किरण कुमारी, रवि कुमार रोशन, विकास कुमार, दिलीप कुमार वर्मा, विजय कुमार तिवारी, गुड्डू कुमार पटेल उर्फ गुड्डू, कृष्ण कुमार राम उर्फ कृष्णा, रोज़ी रानी, रामानुज ठाकुर उर्फ मामू, रामाशंकर सिंह उर्फ मास्टर साहब उर्फ मास्टर जी, डॉ. अश्विनी उर्फ आसमनी, विक्की, साइस्ता परवीन उर्फ मधु और डॉ.प्रमीला के नाम शामिल हैं.

इन्हीं 21 दरिंदों ने उन 34 मासूमों की ज़िंदगी नर्क बना दी. जिनका अब ज़िक्र करना भी उनके साथ नाइंसाफी होगी. लिहाज़ा सीबीआई ने पीड़ित बच्चियों के नाम सार्वजनिक ना हो इसका खास ख्याल रखा है. और इनकी पहचान को छुपाने के लिए उन्हें वी-1 यानी विक्टिम वन से वी-33 यानी विक्टिम थर्टी थ्री तक की कोडिंग के साथ पेश किया है.

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