एडवांस्ड सर्च

देश की सड़कों पर उमड़ा मजदूरों का हुजूम, हालात देखकर दहल जाएगा दिल

इस दुनिया में सबसे ज़्यादा इंतज़ार अगर किसी का होता है, तो वो भोजन है. इस दुनिया में जहां भी जिस शक्ल में भी ज़िंदगी नज़र आती है, उसका पहला इंतज़ार होता है खाना. इंसानों में इस खाने को कहते हैं रोटी.

Advertisement
aajtak.in
शम्स ताहिर खान नई दिल्ली, 15 May 2020
देश की सड़कों पर उमड़ा मजदूरों का हुजूम, हालात देखकर दहल जाएगा दिल भारत के तमाम राज्यों से मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं

था तुझे ग़रूर ख़ुद के लंबा होने का..

ऐ सड़क ग़रीब के हौसले ने तुझे पैदल ही नाप दिया...

हिंदुस्तान की सड़कों पर उमड़ पड़े उस हुजूम के दर्द के साथ जिन्हें भूख शहर लाई थी और जिन्हें वही भूख अब वापस घर ले जा रही है. 130 करोड़ की आबादी वाले हमारे देश के किसी भी राज्य, किसी भी हाईवे, किसी भी सड़क से गुज़र जाइए. एक ही तस्वीर दिखाई देगी. तस्वीर बिलखते मासूम भूखे चेहरों की. तस्वीर जवान पीठ पर सवार बूढ़ी भूख की. तस्वीर घर पहुंचने के लिए बैल की जगह खुद को जोत देने की. तस्वीर एड़ियों के फट जाने की. घिस जाने की. छिल जाने की. जल जाने की.

इस दुनिया में सबसे ज़्यादा इंतज़ार अगर किसी का होता है, तो वो भोजन है. इस दुनिया में जहां भी जिस शक्ल में भी ज़िंदगी नज़र आती है, उसका पहला इंतज़ार होता है खाना. इंसानों में इस खाने को कहते हैं रोटी. रोटी से बड़ा इंतज़ार किसी भी चीज़ का नहीं है. प्यार का भी नहीं. रिश्तों नातों का भी नहीं. अपने बेगानों का भी नहीं. यहां तक कि नफ़रत का भी नहीं. लेकिन आईए आपको मिलवाते हैं, एक ऐसी बदनसीब रोटी से जो इंतज़ार ही करती रह गई. उसे पता ही नहीं चला कि कब भूख मर गई.

कोरोना पर फुल कवरेज के लि‍ए यहां क्लिक करें

सियासत के चश्मे से देखिएगा, तो भूख का मर जाना कोई हादसा नहीं है. हां, अगर इंसान मर जाता तो सियासत के माथे पर पसीना आ जाता. लेकिन कोई भूखा ना रहे यही तो कलमा है, जिस पढ़ कर मज़हब ए सियासत का पहला क़दम ही तल्ख हो जाता है, तो फिर इस तरह भूख के मर जाने पर उससे किसी ग़म या अफ़सोस की उम्मीद रखनी ही नहीं चाहिए. कोरोना के इस ख़ौफ़ के बीच वो सब लोग जो इंसान कहलाते हैं, वो सब अपने-अपने कमरों में बंद हैं. और आप सड़कों पर ये जो हुजूम देख रहे हैं, ये भूख है. सड़क के किनारे किनारे बस अड्डों के आंगन में रेलवे लाइन के साथ-साथ पटरियों पर प्लेटफॉर्म पर ये जो कभी ना ख़त्म होने वाली क़तारें सुबह शाम रात दिन आपको दिखाई दे रही हैं, ये भूख है. इस भूख को खत्म करना है. करना ही पड़ेगा. क्योंकि हिंदुस्तान तभी आत्मनिर्भर बन सकेगा, जब ये भूख ख़त्म हो जाएगी.

भूख की अपनी एक दुनिया है साहब. हमारी और आपकी तरह इनका भी परिवार होता है. मां-बाप होते हैं. बीवी-बच्चे होते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि कोरोना पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी आफ़त ले कर आया है. लेकिन हम इस आफ़त में भी अपने लिए मौक़े ढूंढ लेंगे. इस आफ़त में जो ये बिलबिलाती हुई भूख बाहर निकली है, ये इस तेज़ गर्मी और लू में ज़्यादा नहीं टिक पाएगी. ये बिलखते हुए मासूम भूखे चेहरे, ये बूढ़ी भूख, जो जवान भूख की पीठ पर सवार है. ये मासूम भूख जो नौजवान के हाथों में लहरा रहा है. ये जवान भारत का भूख जो भूख से मर चुके बैल की जगह खुद बैलगाड़ी खींच रहा है. आखिर कब तक ज़िंदा रह पाएगी? फिक्र मत कीजिए जल्दी मर जाएगी.

आप शायद भूख को जानते नहीं. ये एक ऐसी नस्ल है जो खाने की तलाश में अपने-अपने गांव में हज़ारों मील दूर तक का सफ़र कर लेती है. और दूर-दूर बसे शहरों में जाकर दो वक़्त की रोटी के लिए उनके चेहरों को चमकाती है. इंसान इस भूख का बड़ी होशियारी से फायदा उठाता है. वो जानता है कि भूख बड़ी ज़िद्दी और संवेदनशील होती है. दो रोटी पर थोड़ा नमक रख कर दे दीजिए, फिर ये कभी नमक हरामी नहीं करती है. जीने के लिए तो ये पैदा हुई नहीं होती. क्योंकि मरना ही इसका जीना है.

इस भूख का एक नाम और है, ये जो ना ख़त्म होने वाली क़तारें सड़कों पर आप देख रहे हैं, इन्हें आप अंगूठे भी कह सकते हैं. जी हां, अंगूठे. आनंद विहार बस अड्डे पर ये ना ख़त्म होनेवाली अंगूठों के ही क़तारें थी. सड़कों पर रेलवे के किनारे भी ये क़तारें अंगूठों की हैं. दरअसल, इनका ये नाम सियासत का रखा हुआ है. सियासतदान इन्हें अंगूठा कहते हैं. हर पांच साल बाद उन्हें इन अंगूठों की ज़रूरत पड़ती है. ये भूखे अंगूठे आपको रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इंसानों जैसे दिखाई देते हैं. किसी ठेले को खींचते हुए, रिक्शे के पैडल पर पांव रखे हांफते हुए, सब्ज़ी बेचते हुए, बोझा उठाते हुए, मज़दूरी करते हुए, सेठ की गालियां खाते हुए, मौत से जूझते हुए, आपको धोखा होता है कि ये आप जैसे हैं. नहीं, ये इंसान नहीं हैं. ये भूखे अंगूठे हैं.

कोरोना कमांडोज़ का हौसला बढ़ाएं और उन्हें शुक्रिया कहें...

आज जब आप घरों में कोरोना के डर से दुबके बैठे हैं, तब ये सड़क पर हैं. ये आपकी कॉलोनियों में आते-जाते ज़रूर हैं, लेकिन इनकी रिहाइश आपके घरों के पिछवाड़े बने उन नालों के आस-पास होती है, जहां से आपका निकला हुआ गंदा बह कर जाता है. आज ये भूखे अंगूठे घबरा कर अपने उन बदबूदार घरों को छोड़ कर निकल पड़े हैं.

पहले लॉकडाउन के वक़्त जब सरकारी ऐलान हुआ था कि जो जहां है, वहीं ठहर जाए तो ये भी ठहर गए थे. इन्हें लगा था कि इस ऐलान का वो भी हिस्सा हैं. लेकिन जैसे जैसे दिन गुज़रे उन्हें अंदाज़ा हो गया कि वो बड़ी गलतफहमी में थे. वो ऐलान शहरियों के लिए हुआ था. इनका भोलापन ये कि ये खुद को शहरी समझ बैठे थे. मगर जब इनके पास बचे पैसे ख़त्म हो गए, दो गज़ की दूरी ने सेठों को इनसे दूर कर दिया. शहरवालों के घर के दरवाज़े इनके लिए बंद हो गए. और कहीं से कोई मदद नहीं आई, तब जाकर इन्हें होश आया. जब ये भूख से नहीं लड़ पाए तो उन शहरों को छोड़ कर निकल पड़े जिसे बरसों से अपना समझते आ रहे थे.

और अब हाल ये है कि ये भूखे अंगूठे पूरे देश में बदहवास घूम रहे हैं. इन्हें सामने मौत नाचती दिखाई दे रही है. इनके और मौत के बीच एक जंग सी छिड़ गई है. ये चाहते हैं कि अब अगर मरना ही है तो अपने गांव जाकर मरें. लेकिन मौत चाहती है कि जब मारना ही है, तो यहीं क्यों नहीं. अभी क्यों नहीं. अब देखना ये है कि इस जंग में जीत किसकी होती है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay