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सोशल मीडिया पर रहिए सावधान, एक पोस्ट भेज सकती है सलाखों के पीछे

संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी दी गई है. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इसे प्रोत्साहित करने में अहम रोल निभाया है. हालांकि अभिव्यक्ति की यह आजादी उसी सीमा तक है, जहां तक आप किसी कानून का उल्लंघन नहीं करते हैं और दूसरे को आहत या नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

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राम कृष्णनई दिल्ली, 19 July 2019
सोशल मीडिया पर रहिए सावधान, एक पोस्ट भेज सकती है सलाखों के पीछे सांकेतिक तस्वीर

संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी दी गई है. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इसे प्रोत्साहित करने में अहम रोल निभाया है. हालांकि अभिव्यक्ति की यह आजादी उसी सीमा तक है, जहां तक आप किसी कानून का उल्लंघन नहीं करते हैं और दूसरे को आहत या नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

अगर आपके किसी पोस्ट पर या फिर किसी पोस्ट को शेयर करने से किसी की भावना आहत होती है या दो समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है, तो आपको जेल की हवा खानी पड़ सकती है. भारतीय संसद ने साइबर क्राइम को रोकने के लिए साल 2000 में इनफॉर्मेशन एक्ट यानी आईटी एक्ट बनाया था.

इसके तहत अगर आप फेसबुक, ट्विटर, टिक टॉक, शेयर चैट, यूट्यूब समेत अन्य सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का आपत्तिजनक, भड़काऊ या फिर अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत पैदा करने वाला पोस्ट, वीडियो या फिर तस्वीर शेयर करते हैं, तो आपको जेल जाना पड़ सकता है. साथ ही जुर्माना देना पड़ सकता है. इससे संबंधित ताजा मामला बॉलीवुड अभिनेता एजाज खान का आया है. वो टिक टॉक पर एक विवादित वीडियो को लेकर बुरी तरह घिर गए हैं.

मुंबई पुलिस की साइबर क्राइम पुलिस ने अभिनेता एजाज खान को गिरफ्तार कर लिया है. उन पर झारखंड में तबरेज अंसारी की मॉब लिंचिंग की घटना को लेकर टिक टॉक के कुछ स्टार्स के साथ एक वीडियो बनाने और सोशल मीडिया पर शेयर करने का आरोप है. इसमें मुंबई पुलिस का मजाक उड़ाते हुए कहा गया था कि अगर अब कोई आतंकी बनता है, तो कुछ मत कहना.

आईटी एक्ट और आईपीसी के तहत केस

मुंबई की साइबर क्राइम पुलिस ने एजाज खान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 153A और 34 के साथ आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज किया है. आईपीसी की धारा 153A उनके खिलाफ लगाई जाती है, जो धर्म, नस्ल, भाषा, निवास स्थान या फिर जन्म स्थान के आधार पर अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत फैलाने और सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करते हैं. इस धारा के तहत तीन साल की जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है.

इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी यानी आईटी एक्ट 2000 की धारा 67 में प्रावधान किया गया है कि अगर कोई इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आपत्तिजनक पोस्ट करता है या फिर शेयर करता है, तो उसके खिलाफ मामला दर्ज किया जा सकता है. इसका मतलब यह है कि यदि कोई टिक टॉक, शेयर चैट, फेसबुक, ट्विटर समेत किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करके अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ आईटी की धारा 67 के तहत कार्रवाई की जाती है.

आईटी एक्ट की धारा 67 में कहा गया है कि अगर कोई पहली बार सोशल मीडिया पर ऐसा करने का दोषी पाया जाता है, तो उसे तीन साल की जेल हो सकती है. साथ ही 5 लाख रुपये का जुर्माना भी देना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, अगर ऐसा अपराध फिर दोहराया जाता है, तो मामले के दोषी को 5 साल की जेल हो सकती है और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है.

क्या कहते हैं कानून के जानकार

एडवोकेट मार्कंडेय पंत के मुताबिक सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म के जरिए किए जाने वाले अपराध को रोकने के लिए आईटी एक्ट बनाया गया है. अगर कोई अपराध सोशल मीडिया के जरिए किया जाता है, तो उस अपराध के लिए आईटी एक्ट के तहत भी सजा मिलेगी. जब उनसे सवाल किया गया कि क्या लोगों को सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, तो उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत हर नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की  स्वतंत्रता मिली हुई है, लेकिन यह स्वतंत्रता शर्तों के अधीन है. आप इस स्वतंत्रता के अधिकार की आड़ में कोई अपराध नहीं कर सकते हैं. अगर ऐसा करते हैं, तो आपको जेल जाना पड़ सकता है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है.

साइबर क्राइम में आजीवन कारावास तक की सजा

एडवोकेट मार्कंडेय पंत का कहना है कि कम्प्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, वर्ल्ड वाइड वेब, मोबाइल या अन्य किसी इलैक्ट्रॉनिक माध्यम से हैकिंग करना, ऑन लाइन फ्रॉड करना या फिर कोई अन्य अपराध करना दंडनीय है. ऐसे साइबर क्राइम के मामले में कार्रवाई करने के लिए आईटी एक्ट 2008 बनाया गया है. इस एक्ट के साथ ही साइबर क्राइम के मामलों में कॉपी राइट कानून, कंपनी कानून, भारतीय दंड संहिता, सरकारी गोपनीयता कानून, पॉर्नोग्राफी निरोध कानून और आतंकवाद निरोधक कानून के तहत भी कार्रवाई की जाती है. साइबर क्राइम के मामले में मामूली सजा से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया है.

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