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कैसे आए पटरी पर अर्थव्यवस्था?

ग्रामीण संकट, खत्म होती नौकरियां, गिरता निर्यात, ठहरी हुई कॉर्पोरेट वृद्धि, वैश्विक मंदी के मिले-जुले माहौल में सरकार तीसरे बजट का इस्तेमाल आखिर इस अर्थव्यवस्था को धुंधलके से बाहर निकालने में कैसे कर पाएगी.

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aajtak.in
श्वेता पुंजनई दिल्ली, 15 February 2016
कैसे आए पटरी पर अर्थव्यवस्था?

पिछले महीने स्विट्जरलैंड के दावोस में सालाना विश्व आर्थिक मंच के समारोह में हिस्सा लेने गए वित्त मंत्री अरुण जेटली को दुनिया भर के नेताओं की ओर से बधाइयां मिल रही थीं क्योंकि भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था में इकलौते “चमकदार सितारे” के तौर पर देखा जा रहा था. चीन की आर्थिक वृद्धि की दास्तान अब ठंडी पडऩे लगी थी और वह ढलान की ओर थी. ब्रिक्स समूह के दो अन्य सदस्य ब्राजील और रूस अपनी-अपनी समस्याओं से जूझ रहे थे. बाकी यूरोप भी पीछे-पीछे घिसट रहा था. अकेले अमेरिका थोड़ा-बहुत महफूज दिख रहा था.

ऐसे वैश्विक वातावरण के बीच जबकि तमाम अर्थशास्त्री यह कह रहे हों कि 2016 में वैश्विक अर्थव्यवस्था 2008 की महामंदी के दोहराव से गुजरेगी, 2015-16 के लिए अनुमानित 7 फीसदी की जीडीपी वृद्धि दर के साथ भारत उम्मीद की एक किरण की तरह अलग से खड़ा दिख रहा है. जब चीन की अर्थव्यवस्था भी धीमी पड़ रही हो, तब भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कई बरस हिचकोले खाने के बाद बहाल होती नजर आ रही है. जाहिर है, ऐसे में दावोस सम्मेलन में जेटली वैश्विक नेताओं की आंखों का तारा रहे.

लेकिन भारत लौटकर इस माह के अंत में जेटली जब अपना तीसरा बजट पेश करने की तैयारियों में जुटे हुए हैं तो उनकी रातों की नींद हराम है. उन्होंने एक बातचीत में इंडिया टुडे से कहा, “जब आप अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाते हैं तो हर कोई आपको चमकदार सितारा कहकर बुलाता है क्योंकि आपकी तुलना में दूसरों का प्रदर्शन ठीक नहीं दिखता. घरेलू मोर्चे पर हालांकि कृषि, निजी क्षेत्र में निवेश, बैंकिंग, रोजगार वगैरह के मसले पर आपकी रातों की नींद उड़ी रहती है.” असलियत यह है कि करीब से देखने पर भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल बुरा नजर आ रहा है. लगातार 13वें महीने में निर्यात गिरा है. कॉर्पोरेट राजस्व में वृद्धि ठहरी हुई है. कॉर्पोरेट कर्ज उच्चतम स्तर पर है और अच्छे दिनों में तमाम कंपनियों को जो कर्ज मिला था, उसे चुकाने में उनके पसीने छूट रहे हैं.

वास्तविकता यह है कि कॉर्पोरेट जगत में माहौल इस वक्त सबसे ज्यादा खराब है और शेयर बाजार, जो मोदी के आने के बाद अचानक उछला था, अब गोते खा रहा है.

इस दौरान दो साल लगातार खराब मॉनसून के चलते कृषि क्षेत्र में वृद्धि पूरी तरह ठहर चुकी है. इस दशक में ग्रामीण आय की रफ्तार सबसे धीमी चल रही है. नतीजतन, ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग की दर में आई कमी तमाम क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है, चाहे वह ट्रैक्टर और मोटरसाइकिल हो या फिर बिस्कुट और जूस जैसी उपभोक्ता सामग्री और फ्रिज तथा वॉशिंग मशीन जैसी टिकाऊ उपभोक्ता वस्तु.

वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा कहते हैं, “अर्थव्यवस्था में हम दो मसलों से जूझ रहे हैं- एक अतीत में की गई अति, अतिरिक्त क्षमता और रुकी हुई परियोजनाएं और साथ ही दूसरा तथ्य यह है कि दुनिया भर में जिंसों में मंदी आई है. यह दोहरी समस्या है जिसने अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में वास्तविक चुनौतियां पैदा की हैं.”

इस समस्या में और इजाफा उत्पादन और नई परियोजनाओं के निवेश से पैदा हो रहा है जिसमें जेटली के अधिकतम प्रयासों के बावजूद कोई सुधार नहीं आया है और जिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित प्रोग्राम “मेक इन इंडिया” का कोई असर नहीं पड़ा है. प्रत्यक्ष कर संग्रह शायद अपने लक्ष्यों से चूक जाएगा. इसके अलावा शेयर बाजार की मंदी के चलते वित्त मंत्री विनिवेश के लक्ष्य भी पूरे नहीं कर पाएंगे.

सरकार अब तक विनिवेश से बजट में प्रस्तावित 69,500 करोड़ की राशि का आधा भी नहीं जुटा सकी है. वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण वे यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था में तेजी ला दे, जैसा कि नब्बे के दशक और 2000 की शुरुआत में हुआ था.

जेटली को आखिरकार सरकारी बैंकों में पूंजी तो लगानी ही होगी जिनके डूबत खाते या नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) कुल 3.5 लाख करोड़ तक पहुंच चुके हैं. सरकार ने चार साल की अवधि में बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 70,000 करोड़ के पैकेज का ऐलान किया है जो सरकारी राजस्व पर एक और बोझ है. इस समस्या को दुरुस्त किए बगैर वे उम्मीद नहीं कर सकते कि बैंक कंपनियों को ऋण दें, भले ही कंपनियां बड़ी परियोजनाओं के लिए कर्ज लेने को तैयार हों. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी कहता है कि दिसंबर 2015 में 381 परियोजनाओं के लिए 1.05 लाख करोड़ रु. के निवेश का ऐलान किया गया था, जो वित्त वर्ष 2015 की तीसरी तिमाही से 74 फीसदी कम था.

इन तमाम समस्याओं के मद्देनजर जेटली, उनके मातहत जयंत सिन्हा और मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने वृद्धि के अपने अनुमानों को पहले ही लचीला बना दिया है. दुनिया में भले ही भारत की 7.5 फीसदी की अनुमानित सालाना आर्थिक वृद्धि का डंका बज रहा हो लेकिन जेटली जानते हैं कि साल की शुरुआत में उनके घोषित अनुमान 8.1-8.5 फीसदी की वृद्धि दर से यह काफी कम है. इस बात की उम्मीद कम दिखती है कि अर्थव्यवस्था 2016-17 में 9 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ पाएगी, जैसा उन्होंने 2015 के आरंभ में उम्मीद जताई थी. इतना ही नहीं, वित्त मंत्री इस बात से भी बखूबी वाकिफ हैं कि 7.5 फीसदी का आंकड़ा दरअसल पिछले साल भारत की जीडीपी की गणना के तरीके में किए गए बदलाव से पैदा हुआ है. अगर अब भी पुराने तरीके अपनाए जाएं तो अधिकतर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वास्तविक वृद्धि दर 5 से 5.5 फीसदी के बीच बैठेगी बिल्कुल उतना ही जितना यूपीए के आखिरी वर्षों में दर्ज की गई थी.

जेटली के सामने एक और बड़़ी समस्या यह है कि उन्हें न सिर्फ यह आश्वस्त करना है कि वृद्धि में और तेजी आए बल्कि यह भी देखना होगा कि यह वृद्धि ऐसी हो जो रोजगार पैदा कर सके. हर महीने करीब दस लाख युवा रोजगार के बाजार में प्रवेश कर रहे हैं और मोदी सरकार का एक बड़ा सिरदर्द यह है कि काफी तेजी से रोजगार पैदा हो सकें ताकि बढ़ती भीड़ को काम मिल सके. अब तक अर्थव्यवस्था में पैदा हो रहे रोजगारों की संख्या घिसटती रही है और जब तक इस अहम समस्या को दुरुस्त नहीं कर लिया जाता, यह बड़े सामाजिक तनावों को जन्म दे सकती है.

सात अहम क्षेत्रों कपड़ा, धातु, ऑटोमोबाइल, आभूषण और रत्न, परिवहन, आइटी/बीपीओ और खनन में लेबर ब्यूरो के किए गए सर्वेक्षण में चिंताजनक पहलू उभरा है. अप्रैल से दिसंबर, 2014 के बीच इन क्षेत्रों में 4,60,000 रोजगार पैदा हुए थे. इसके बाद जनवरी से मार्च 2015 के बीच 64,000 और रोजगार सृजित हुए लेकिन अप्रैल से जून 2015 के बीच कपड़ा और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में 43,000 रोजगार घट गए. मुंबई के एक अर्थशास्त्री कहते हैं, “यह चिंताजनक है. लोगों ने नौ महीने तक इंतजार किया कि जमीन पर कुछ हरकत हो, अपनी क्षमता को अतिरिक्त निर्मित किया और फिर उन्हें यह एहसास हुआ कि अब और लोगों को रोजगार देने की जरूरत नहीं है. असली मसला रोजगार-सघन उद्योगों पर ध्यान देना है. रक्षा और उत्पादन क्षेत्र की बजाए रोजगार सृजन पर ध्यान दिया जाना होगा. डिजिटल इंडिया या रक्षा क्षेत्र रोजगार पैदा नहीं करते.”

कृषि और संबद्ध क्षेत्र देश में करीब आधे रोजगार पैदा करते हैं. वित्त मंत्री और उनके कनिष्ठ मंत्री ग्रामीण तथा कृषि अर्थव्यवस्था को सरकार की अहम प्राथमिकताओं में गिनाते हैं. दोनों मंत्रियों ने गरीबी उन्मूलन, सिंचाई, इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण और सामाजिक अधिसंरचना को अहम क्षेत्र करार दिया है. सिन्हा कहते हैं, “हमने यह तय किया है कि मनरेगा में पर्याप्त पैसा हो. कोई भी इसे आय में सहयोग के लिए इस्तेमाल करना चाहे तो कर सकता है. मनरेगा में काम करने वालों की संख्या बढ़ी है. सूखे के बाद लोगों ने इसे अपनाया है. हम लोगों को फसल नुक्सान की भरपाई करेंगे, 50 नहीं बल्कि 30 फीसदी. राहत कोष का वितरण औसत 8,000-9,000 करोड़ रु. से बढ़कर 24,000 करोड़ रु. तक पहुंच चुका है. हमने सूखे और बाढ़ की मुआवजा राशि काफी बढ़ा दी है.”

एक अनपेक्षित मामले ने जेटली की किस्मत का साथ दिया है. वह है कच्चे पेट्रोलियम तेल की कीमतों में लंबे समय तक आई गिरावट. एनडीए के सत्ता में आने के महीने भर बाद जून, 2014 में ब्रेन्ट कच्चे तेल का एक बैरल 110 डॉलर पर बिक रहा था, जो 2015 के मध्य तक गिरकर 60 डॉलर पर आ गया. साल के अंत तक यह 30 से 35 डॉलर प्रति बैरल की दर से बिक रहा था. भारत अपनी जरूरत का तकरीबन सारा तेल आयात करता है. यह बात सरकार के लिए बड़ी लाभकारी रही है, साथ ही कोयले से लेकर जिंक और तांबा तक अन्य जिंसों की कीमतों में भी गिरावट आई है जिसने सरकार को सहारा दिया है.

अकेले तेल की कीमतों में आई गिरावट ने सरकार को आयात के मद में एक साल में 2 लाख करोड़ रु. बचा लेने का मौका दिया है. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के दौरान पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने के चलते इस साल सरकार के राजस्व में अतिरिक्त 3,700 करोड़ रु. का फायदा हुआ है. जिंसों की गिरती कीमतों ने सरकार को मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में मदद दी है&जो बीते कुछ महीनों के दौरान नकारात्मक रही है. हालांकि खाद्य कीमतों में इजाफे के चलते उपभोक्ता मूल्य सूचकांक चढ़ा रहा है तथा व्यापार संतुलन को नियंत्रण में रखने की सहूलियत दी है. इसने जेटली को वित्तीय घाटे के लक्ष्य को भी बनाए रखने में मदद की है (मौजूदा वित्त वर्ष के लिए 3.9 फीसदी) भले ही कर राजस्व में वृद्धि लक्ष्य से नीचे रही और विनिवेश के लक्ष्य पूरी तरह पीछे छूट गए.

उपभोक्ता कीमतों में आई गिरावट हालांकि दोधारी तलवार साबित हो सकती है. इससे मुद्रास्फीति और भारत के आयात की लागत तो कम हुई है, लेकिन इसने निर्यात को हतोत्साहित करने में भी एक भूमिका निभाई है तथा जिंस केंद्रित कई उद्योगों में काम कर रही कंपनियों के राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है.

अपने तीसरे बजट की तैयारी में जुटे जेटली के समक्ष सवाल है कि उन्हें फिलहाल क्या करने की जरूरत है. इससे भी अहम यह है कि वैश्विक आर्थिक मंदी और घरेलू मोर्चे पर उस कठोर विपक्ष की सूरत में वे वाकई क्या कुछ कर सकते हैं, जिसने सरकार के लाए कई विधेयकों को नाकाम कर डाला है जिनमें भूमि अधिग्रहण विधेयक पर अध्यादेश और वस्तु तथा सेवा कर विधेयक शामिल थे, जिनका विदेशी निवेशक बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.

पहले दो बजट में जेटली की आलोचना इस बात के लिए की गई थी कि वे कोई साहसिक कदम उठाने से हिचक रहे हैं. आज इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि सरकार अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कुछ विशिष्ट क्षेत्रों को संज्ञान में रखते हुए काम कर रही है.

बेशक, कुछ बड़े विचार इस दिशा में लाए गए हैं, जैसे स्टार्ट-अप समुदाय को अब मान्यता दे दी गई है. इन्फोसिस के सह-संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति कहते हैं, “प्रधानमंत्री ने विकसित देशों के नेताओं के साथ निजी संबंध स्थापित किए हैं, उन्होंने स्टार्ट-अप इंडिया की शुरुआत की है यह सब कुछ मदद करेगा.” यह बात अलग है कि स्टार्ट-अप समुदाय की राय इस मामले में थोड़ा अलग है, जिसका कहना है कि इस योजना में भारत छोड़कर अमेरिका और सिंगापुर भाग जाने वाले उद्यमों को रोकने के लिए बहुत कुछ नहीं किया गया है.

आर्थिकी आज राजनीति के साथ गुत्थमगुत्था है और वस्तु तथा सेवा कर विधेयक को आगे ले जाने में सरकार की नाकामी ने काफी निराशा पैदा की है. दिवालिया होने संबंधी संहिता पर भी धीमी प्रगति हुई है. वित्त मंत्री ने साफ किया है कि यह विधेयक आखिरी चरण में है. अच्छा यह है कि शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार में कमी आई है.

इससे आगे बढ़ते हुए सरकार को देश की कुछ बड़ी चुनौतियों को स्वीकार करना होगा. फिलहाल सामान्य धारणा यह है कि ये बड़ी चुनौतियां रोजगार और घरेलू मांग से जुड़ी हुई हैं. यह याद रखना बेहतर होगा कि सभी को खुश करने के चक्कर में कहीं ज्यादा बड़ी हताशाएं जन्म ले सकती हैं. हर महीने लाई जा रही एक नई योजना और लगाए जा रहे अतिरिक्त शुल्कों ने इस तंत्र को और जटिल बना डाला है और सरकार के आर्थिक दर्शन के संबंध में भ्रामक संकेतों का प्रसार किया है, जिसके चलते निजीकरण पर उसके कदम ठिठक गए हैं और बहुत संभव है कि विनिवेश के लक्ष्यों से वह चूक जाएगी. वास्तव में सामान्य राय यह बन रही है कि सरकार हर कहीं घुसी हुई है होटलों से लेकर एयरलाइन तक, स्टार्ट-अप से लेकर डिजिटल क्षेत्र तक, जिस पर अरुण जेटली कहते हैं, “एक फर्क है; सरकार एक ऐसा वातावरण बना रही है, जहां निजी क्षेत्र और लोग तरक्की कर सकें. सरकार कारोबारों के भीतर घुस नहीं रही है. तो चाहे वह डिजिटल इंडिया हो या स्टार्ट-अप इंडिया या फिर स्टैंड अप इंडिया आप बैंकिंग संस्थानों को यह बता रहे हैं कि वे व्यावहारिक परियोजनाओं के लिए एससी, एसटी और औरतों को कर्ज जारी करें ताकि वे उद्यमी बन सकें. उन्हें फंड देना है जिनके पास धन नहीं है.”

पहला कदम यह होना चाहिए कि सरकार अधिरचना पर खर्च को बढ़ाए. जेटली और उनके सहयोगी इसी मसले पर सड़क परिवहन राजमार्ग और जहाजरानी मंत्रालय के मंत्री नितिन गडकरी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. गडकरी ने पुरानी परियोजनाओं में झोल को साफ करने में काफी अहम कदम उठाए हैं. इस काम में वित्त मंत्रालय ने उनकी मदद के लिए राष्ट्रीय निवेश और अधिसंरचना कोष की स्थापना की है, जिसे सरकार 49 फीसदी अनुदान देगी और विदेशी तथा रणनीतिक घरेलू साझीदारों की इसमें हिस्सेदारी होगी. इसकी आरंभिक राशि 40,000 करोड़ रु. तय की गई है.

हिसाब आसान है. लघु अवधि में अधिसंरचना आधारित परियोजनाओं पर सरकारी खर्च ढ़ेर सारे रोजगार पैदा करता है और सीमेंट तथा स्टील जैसे तमाम किस्म के उद्योगों में मांग को बढ़ाता है. लंबी अवधि में भी अधिसंरचना ऐसे अनिवार्य हालात पैदा कर देती है जिससे दूसरे उद्योगों की आर्थिक वृद्धि में सुधार आता है.

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