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डीआरजी के लड़ाकों से खौफ खाते हैं नक्सली

छत्तीसगढ़ में सक्रीय नक्सली डीआरजी के लड़ाकों से खौफ खाने लगे हैं. डीआरजी की वजह से पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लग रही है.

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aajtak.in [Edited by: परवेज़ सागर]रायपुर, 05 February 2016
डीआरजी के लड़ाकों से खौफ खाते हैं नक्सली डीआरजी के लड़ाके नक्सलियों की हर चाल को नाकाम कर रहे हैं

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप यानी डीआरजी के लड़ाकों से नक्सली भी खौफ खाते हैं. मामूली से वेतन में काम करने वाले इन लड़ाकों के कारण बस्तर में पुलिस माओवादियों के खिलाफ अपने अभियान में लगातार कामयाबी हासिल कर रही है.

नक्सली

राज्य के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में नक्सलियों ने बसंत नाग के परिजनों की हत्या कर उसका घर जला दिया था. दरअसल, नाग का परिवार का नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुडूम में शामिल होकर नक्सलियों का पुरजोर विरोध करता था. इसी बात का बदला लेने के लिए नक्सलियों ने इस वारदात को अंजाम दिया था.

डीआरजी के जवान

यह कहानी केवल बसंत नाग की नहीं है बल्कि उसकी तरह कई और ऐसे आदिवासी युवक हैं, जिनके परिवार के सदस्यों को नक्सलियों ने बेरहमी से मार डाला. और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया. यह लड़के अब डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप यानी डीआरजी में शामिल होकर पुलिस के साथ नक्सलियों के खिलाफ लड़ रहे हैं.

अपनी जमीन के लिए लड़ रहे इन लड़ाकों के कारण पुलिस को लगातार सफलता मिल रही है. बसंत नाग और उसके जैसे कई युवक आज डीआरजी के सबसे अच्छे सिपाहियों में से एक हैं, जिनसे नक्सली खौफ खाते हैं.

नक्सली कैंप

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में वर्ष 2005-06 में वरिष्ठ आदिवासी नेता और विधानसभा में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में सलवा जुडूम आंदोलन शुरू किया गया था. इस आंदोलन में आदिवासी ग्रामीण नक्सलियों के खिलाफ एकजुट हुए और उनके के बीच सीधी लड़ाई शुरू हो गई थी.

नक्सलियों से लिया लोहा

बताते चलें कि विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के रूप में लड़ने वाले सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं के कारण पुलिस को कई मौकों पर सफलता मिली थी. लेकिन बाद में यह आंदोलन बंद हो गया. इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में भी शोर शराबा होने लगा था.

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