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एथलेटिक्स में फिर दिखी भारत की ‘वूमन पावर’

उड़नपरी पी टी उषा ने 1986 में सोल एशियाई खेलों से एथलेटिक्स में भारत की जिस ‘वूमन पावर’ का सिलसिला शुरू किया था, कृष्णा पूनिया और रिले टीम ने इस बार राष्ट्रमंडल खेलों में उसे नये मुकाम पर पहुंचाया.
एथलेटिक्स में फिर दिखी भारत की ‘वूमन पावर’
भाषानई दिल्ली, 13 October 2010

उड़नपरी पी टी उषा ने 1986 में सोल एशियाई खेलों से एथलेटिक्स में भारत की जिस ‘वूमन पावर’ का सिलसिला शुरू किया था, कृष्णा पूनिया और रिले टीम ने इस बार राष्ट्रमंडल खेलों में उसे नये मुकाम पर पहुंचाया.

उषा के संन्यास लेने के बाद ओलंपिक से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों तक भारत को एथलेटिक्स में इतना कमजोर माना जाने लगा था कि अपने जमाने के दिग्गज धावक मिल्खा सिंह ने खेलों से पहले बयान दे दिया था कि भारत एथलेटिक्स में एक भी पदक नहीं जीत पाएगा लेकिन भारतीय महिलाओं ने ‘उड़नसिख’ को गलत साबित कर दिया.

पूनिया ने महिलाओं की चक्का फेंक में स्वर्ण पदक जीता जो भारत का राष्ट्रमंडल खेलों की एथलेटिक्स में 52 साल बाद सोने का पहला तमगा था. यही नहीं इसमें हरवंत कौर ने रजत और सीमा एंतिल ने कांस्य पदक जीता और इस तरह से पहली बार किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहले तीन स्थान भारत ने हासिल किये.

चक्का फेंक में स्वर्णिम सफलता के बाद मनजीत कौर, सिनी जोस, अश्विनी चिदानंदा अकुंज और मनदीप कौर ने चार गुणा 400 मीटर रिले में सोने का तमगा जीतकर दिखा दिया कि महिलाएं फिर से भारतीय एथलेटिक्स का झंडा उंचा करने के लिये पूरी तरह से तैयार हैं.

भारत की इस स्वर्णिम सफलता पर मिल्खा सिंह भी आह्लादित थे. उन्होंने कहा, ‘इन लड़कियों ने नयी राह दिखा दी है. मुझे पूरा विश्वास है कि आगे की पीढ़ी अब इनसे प्रेरणा लेगी और भारत एथलेटिक्स में भविष्य में भी अच्छा प्रदर्शन करेगा.’ पूनिया और महिला रिले टीम ने स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय एथलेटिक्स में नया इतिहास रचा. इसके अलावा भारत ने तीन रजत और सात कांस्य पदक सहित कुल 12 पदक हासिल किये जो नया रिकार्ड है.

यह राष्ट्रमंडल खेलों में पहला अवसर है जबकि भारत एथलेटिक्स में दस या इससे अधिक पदक जीतने में सफल रहा. भारत को जो तीन रजत पदक मिले, उनमें से दो महिला खिलाड़ियों ने हासिल किये. हरवंत ने यदि चक्का फेंक में दूसरा स्थान हासिल किया तो इससे एक दिन पहले प्रजूषा मल्लिकल ने महिलाओं की लंबी कूद में रजत पदक हासिल किया. प्रजूषा आखिरी प्रयास से पहले तक शीर्ष पर थी लेकिन कनाडा की एलिस फालिये ने उसे बाद में पीछे छोड़ दिया.

इसके अलावा महिलाओं ने तीन कांस्य पदक (कविता राउत ने दस हजार मीटर, सीमा एंतिल और चार गुणा 100 मीटर रिले टीम) भी जीते. इस तरह से महिला एथलीटों ने कुल सात पदक हासिल किये जो ट्रैक एंड फील्ड में भारत की ‘वूमन पावर’ को दिखाता है. उषा यदि अपनी शिष्या टिंटु लुका के महिलाओं की 800 मीटर दौड़ में हार से दुखी थी तो अन्य खिलाड़ियों के प्रदर्शन से बेहद खुश हैं.

उन्होंने कहा, ‘मुझे इन लड़कियों में पूरा विश्वास था. अब महत्वपूर्ण यह है कि हम यही प्रदर्शन आगे भी बरकरार रखें. आशा है कि वे इसके लिये आगे भी कड़ी मेहनत जारी रखेंगी.’ एथलेटिक्स की महिला ब्रिगेड आगे भी बेहतर प्रदर्शन करने के लिये तैयार है. सीमा एंतिल यदि मिल्खा के बयान से बेहद खफा थी लेकिन इसने किसी हद उनमें अच्छा प्रदर्शन करने का जोश भी भरा.

उन्होंने कहा, ‘हम आगे भी मिल्खा सर को गलत साबित करती रहेंगी.’ भारतीय महिलाएं मानती हैं कि मुकाबला कहीं भी आसान नहीं होगा लेकिन वे इसके लिये तैयार हैं. रिले टीम की एथलीट अश्विनी के अनुसार, ‘हम अपने दुश्मनों को कमजोर करके नहीं आंकते और इसलिए एशियाई खेल (ग्वांग्झू) में अपना पदक पक्का मानकर नहीं चलेंगे. हमें अभी से उसके लिये कड़ी मेहनत करनी होगी.’

महिलाओं ने यदि परचम लहराया तो पुरुष भी इस बार पीछे नहीं रहे और उन्होंने पांच पदक जीते जबकि भारतीय एथलेटिक संघ को खेलों से पहले केवल छह सात पदकों की आशा थी और इनमें भी महिलाओं से उसे अधिक आशा थी.

हरमिंदर सिंह ने पुरुषों की 20 किमी पैदल चाल में भारत को एथलेटिक्स में पहला पदक जीता था. इसके बाद विकास गौड़ा ने चक्का फेंक में रजत पदक हासिल किया जबकि रंजीत माहेश्वरी (त्रिकूद), काशीनाथ नाइक (भाला फेंक और चार गुणा 100 मीटर रिले टीम) ने कांसे का तमगा हासिल किया.

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