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व्यंग्य: रिश्तेदारों का महापर्व है रिजल्ट

मानव सभ्यता के शुरुआती दिनों में सबके लिए खास दिन बंट रहे थे हर किसी के हिस्से कुछ आया अंत में जब भाई के लिए रक्षाबंधन, पति के लिए करवाचौथ और पत्नि के लिए सेल के दिन अलग कर दिए गए. ऐसे में रिश्तेदारों को खुद चुनने का हक दिया गया कि वो अपने लिए एक दिन निर्धारित कर लें और उनने रिजल्ट्स का दिन चुन लिया.

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आशीष मिश्रा [Edited By: महुआ बोस]नई दिल्ली, 26 May 2015
व्यंग्य: रिश्तेदारों का महापर्व है रिजल्ट नतीजों के बाद बच्चे

हर किसी के पास एक कन्वर्सेशन ओपनर होता है माँ का ‘कब तक पड़ा रहेगा?’ पापा का ‘इधर बैठो बात करनी है!’ गर्लफ्रेंड का ‘क्या कल्ला ऐ मेला बाबू?’ और दोस्तों का ‘भाई! तुझे देख के हंस रही थी’ उसी तरह रिश्तेदारों के पास भी एक कन्वर्सेशन ओपनर होता है ‘और रिजल्ट कैसा रहा?’ रिजल्ट पूछने का बहाना न हो तो आधे रिश्तेदार कभी हमसे बात ही न करें, आखिर वो भी कितनी बार ‘और सब बढ़िया चल रहा है!’ पूछना चाहेंगे. रिजल्ट्स तो आते ही इसीलिए हैं ताकि एक दिन रिश्तेदार पूछ सकें और बच्चे भी साल के दस महीने किताबों में मुंह दिए रहते हैं ताकि रिजल्ट के दिन रिश्तेदारों से मुंह छुपाना न पड़ जाए.

किसी रोज फुर्सत से बैठकर देखें तो पता लगेगा ‘रिश्तेदार’ और ‘रिजल्ट’ की राशि भी एक है. मानव सभ्यता के शुरुआती दिनों में सबके लिए खास दिन बंट रहे थे हर किसी के हिस्से कुछ आया अंत में जब भाई के लिए रक्षाबंधन, पति के लिए करवाचौथ और पत्नि के लिए सेल के दिन अलग कर दिए गए. ऐसे में रिश्तेदारों को खुद चुनने का हक दिया गया कि वो अपने लिए एक दिन निर्धारित कर लें और उनने रिजल्ट्स का दिन चुन लिया. वो दिन है और आज का दिन रिजल्ट्स आते हैं और उसके बाद रिश्तेदार, रिजल्ट्स अगर खराब आ जाएं तो घबराना नहीं चाहिए, खराब रिजल्ट आना सबसे बुरा नहीं होता और ये तब महसूस होता है जब पांच मिनट बाद रिश्तेदारों के फोन आने शुरू होते हैं.

रिजल्ट्स वो मौका होता है जब आपको पता लगता है कि चचेरे मामाओं और मौसेरे फूफाओं को भी आपकी जिन्दगी में इतना इंटरेस्ट है. भदोही वाली बुआ की जो ननद सालों से आपके बरहों में खुद के बेटे को बाबा सूट न मिलने पर नाराज होकर बैठी थी वो तपती दोपहर में रिजल्ट पूछने घर पर आ धमकती है. अमरकंटक वाली मौसी के जेठानी की बिटिया जिसने एक बार व्हाट्सएप का नंबर मांग देने पर फेसबुक पर ब्लाक कर रखा होता है. वो लैंडलाइन पर फोन कर रिजल्ट जानना चाहती है.

रिजल्ट के दिन लैंडलाइन फोन भी 26 जनवरी के दूरदर्शन सरीखा महसूस करते हैं. गलती बोर्ड वालों की है, उन्हें रिजल्ट नेट पर नही डालना चाहिए दो दिन पहले सारे रिश्तेदारों के घर भेज देना चाहिए. रिश्तेदारों में बात फैलाने की शक्ति बड़ी तेज होती है. हमें भी पता चला जाएगा. जिंदगी सिकुड़ सी रही है लोगों के पास वक़्त कम हो रहा है. मिलने और बात करने का वक़्त नहीं मिलता ऐसे में रिजल्ट्स हमें पास लाते हैं. किसी त्यौहार सा फील देते हैं, तभी तो ये रिश्तेदारों का महापर्व है. रिजल्ट अच्छा आ जाए तो छेने के रसगुल्ले का शीरा कमीज पर टपकने से बचाते रिश्तेदार भले लगते हैं. वहीं, रिजल्ट बिगड़ जाए तो वही रिश्तेदार दुश्मन नजर आने लगते हैं.

बिगड़ा रिजल्ट रिश्तेदारों को मौका देता है, कमियां निकालने का. छः महीने पहले सिरमौर चौराहे पर चिनियाबदाम और बिहारी के यहाँ इमरती खाते देखी हो इसे भी वो खराब रिजल्ट से जोड़ देते हैं. चलते-चलते गुर्जर आरक्षण के लिए पटरियां उखाड़ रहे हैं, ऐसे में कल सीबीएसई का रिजल्ट आया, लड़कियां फिर बाजी मार गईं. एक बात समझ आई यही हाल रहा तो आगे आरक्षण किसी जाति को नही सिर्फ देश भर के लड़कों को चाहिए होगा.

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