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व्यंग्य: रिझाने वाले डियोड्रेंट की खोज में...

टीवी विज्ञापनों को देखना-समझना समझदारों का काम है. जिस विज्ञापन को आप एयरलाइन्स या रियल इस्टेट से जुड़ा समझ देख डालते हैं, अंत में पता चलता है वो पिछले बीस सेकेण्ड से गुटखा बेचना चाह रहे थे.

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आशीष मिश्र [Edited By: अमरेश सौरभ]नई दिल्ली, 15 May 2015
व्यंग्य: रिझाने वाले डियोड्रेंट की खोज में... विज्ञापन समझना भी टेढ़ी खीर...

टीवी विज्ञापनों को देखना-समझना समझदारों का काम है. जिस विज्ञापन को आप एयरलाइन्स या रियल इस्टेट से जुड़ा समझ देख डालते हैं, अंत में पता चलता है वो पिछले बीस सेकेण्ड से गुटखा बेचना चाह रहे थे.

कई बार पूरा देख डालने के बाद भी समझ नही आता कि अगला अचार बेचना चाह रहा है या डायनिंग टेबल की खूबियां बता रहा है. शॉवर के विज्ञापन में आकाशगंगा नजर आ सकती है. एक साबुन के विज्ञापन में वो हर कहीं नहाते हैं, बरफ के पानी में, पहाड़ी झरने पर, ऊंट की नाद में सिवाय घर के बाथरूम के हर कहीं. एडवेन्चरस स्पोर्ट्स से जुड़ा हर विज्ञापन अंत में कोल्डड्रिंक का निकलता है. ऐसे विज्ञापन देख पता चलता है कि कोल्डड्रिंक पीने के लिए भी कलेजा चाहिए होता है, पर उससे भी मजबूत कलेजा ऐसे विज्ञापन के पीछे छुपा लॉजिक ढूंढने के लिए चाहिए होता है.

सबसे ज्यादा धोखा गर्भनिरोधक उत्पाद देते हैं. दिल टूट जाता है, जब अंत में पता चलता है कि इतने चाव से देखा गया विज्ञापन स्ट्राबेरी आइसक्रीम या फ्रूट बियर का नहीं है. कन्फ्यूजन सिर्फ इस बात का नहीं कि मर्दों के शेविंग फोम के विज्ञापन में लड़कियों का क्या काम या हेयर जेल के विज्ञापन में बियर बार क्यों दिखाया जा रहा है, कन्फ्यूजन इस बात का भी रहता है कि सबसे छोटा एसी बेचते जीजा-सालों की शक्ल एक सी कैसे हो सकती है?

तिस पर भी आम आदमी को अगर किसी ने सबसे ज्यादा परेशान किया है तो वो है डियोड्रेंट के विज्ञापन. सारा बाजार छान मारने पर भी अव्वल तो वो डियोड्रेंट नहीं मिलता, जिसे छिड़कते ही बीसियों कन्याएं वस्त्रों का मोह छोड़ एक मानुष की देह पर पिल पड़ती हैं. कोई उठा भी लिया, तो उसे छिड़के बदन पर एक मरी मक्खी न भिनकती है. पहले लोग ठीक करते थे गर्मियों में नहा लेते थे डियोड्रेंट की जरुरत न पड़ती थी. जो न नहाते थे, वो पसीने से नहा जाते थे. इधर उपभोक्ता जागरूकता वाले विज्ञापनों का फर्क भी पड़ा है. ग्राहक ठगा जाना नहीं चाहता, गैस और बिना गैस के डियोड्रेंट में फर्क समझना शुरू करता है.

इधर ग्राहक गैस और बिना गैस में फर्क समझता है, तभी अगला उससे पूछ मारता है एक केन में कितने स्प्रे? बड़ा सवाल है हमें ऐसे सवालों के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि अगला सवाल डियोड्रेंट में एल्कोहल होने या न होने का होगा.

पहले तो मुझे समझ ही नहीं आता था कि लोग अल्कोहल वाले डियोड्रेंट को पसंद क्यों नहीं करते? मुफ्त की अल्कोहल किसे पसन्द न आएगी, भले वो कहीं भी कैसे भी मिली हो? फिर समझ आया नहीं अल्कोहल वाला डियोड्रेंट लगाना उतना ही गलत है, जितना मर्द होकर औरतों वाला टेल्कम पाउडर या डियोड्रेंट लगाना. गलत ही नहीं, घृणित है, शर्मनाक है.

पहले मुझे लगता था सत्रह का पहाड़ा सबसे मुश्किल है. फिर लगा आठवीं के बाद भूगोल सबसे मुश्किल होती है, फिर महसूस हुआ लड़कियों का मूड समझना सबसे मुश्किल है. पर अब मेरी आंखें खुल चुकी हैं. मुश्किल कुछ है, तो बस ऐसा डियो खोज निकालना, जिसमें न अल्कोहल हो, न गैस, ज्यादा स्प्रे हों और मर्दों वाली महक हो. सफलता के मायने पहले जो रहे हों, आज तो बस वही सफल है, जिसने तमाम कसौटियों पर खरा उतरता डियो खोज निकाला.

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