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क्या फेल हो गई नोटबंदी? तीन साल के बाद आंकड़ों में जानिए फायदे-नुकसान

aajtak.in
08 November 2019
क्या फेल हो गई नोटबंदी? तीन साल के बाद आंकड़ों में जानिए फायदे-नुकसान
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आज से ठीक तीन साल पहले 8 नवंबर 2016 को रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक 500 और 1000 के नोटों को बंद करने की घोषणा की थी. नोटबंदी के पीछे मोदी सरकार ने कालेधन का खात्मा करना, सर्कुलेशन में मौजूद नकली नोटों को खत्म करना, आतंकवाद और नक्सल गतिविधियों पर लगाम कसने समेत कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देने जैसे कई वजहें गिनाई थीं.
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लेकिन नोटबंदी के बाद धीरे-धीरे इससे जुड़े एक-एक आंकड़े सामने आने लगे. जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि जिस मकसद से नोटबंदी लागू की गई थी, वह पूरी नहीं हुई. सरकार का तर्क है कि नोटबंदी के बाद टैक्स कलेक्शन बढ़ा और कालेधन में इस्तेमाल होने वाला पैसा सिस्टम में आ गया. लेकिन इससे जुड़े कोई आंकड़े तीन साल के बाद भी सामने नहीं आए.
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कालेधन पर लगाम?
आरबीआई के आंकड़े कहते हैं कि नोटबंदी के दौरान बंद हुए 99.30 फीसदी 500 और 1000 के पुराने नोट बैंक में वापस आ गए. जब सारा पैसा वापस बैंकों में लौट गया, तो फिर सरकार कालेधन को पकड़ने में कैस कामयाब रही? वहीं नोटबंदी के बाद नकली नोट के मामले भी बढ़ते दिखे, रिजर्व बैंक के ही आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17 में जहां दो हजार के 638 जाली नोट पकड़ में आये थे, 2017-18 में इनकी संख्या बढ़कर 17,938 हो गई.
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विकास दर पर पड़ा असर
नोटबंदी के बाद जीडीपी को झटका लगा, जिससे देश अबतक नहीं उबर पाया है. नोटबंदी की घोषणा के बाद की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्ध‍ि दर घटकर 6.1 फीसदी पर आ गई थी. जबकि इसी दौरान साल 2015 में यह 7.9 फीसदी पर थी. मौजूदा समय में जीडीपी विकास दर गिरकर 5 फीसदी पर आ गई, जो पिछले छह साल में सबसे निचला तिमाही आंकड़ा है. ऐसे में मोदी सरकार के लिए नोटबंदी की नाकामियों से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है.

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छोटे उद्योगों को झटका
दरअसल देश में लोग नोटबंदी से हुई परेशानी को अब तक भूले नहीं हैं. नोटबंदी का सबसे ज्‍यादा प्रभाव उन उद्योगों पर पड़ा, जो ज्‍यादातर कैश में लेनदेन करते थे. इसमें अधिकतर छोटे उद्योग शामिल होते हैं. नोटबंदी के दौरान इन उद्योगों के लिए कैश की किल्‍लत हो गई. इसकी वजह से उनका कारोबार ठप पड़ गया.
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डिजिटलीकरण और नोटबंदी
नोटबंदी के बाद डिजिटल पेमेंट में बढ़ोतरी हुई. पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक नोटबंदी के बाद कैशलेस लेनदेन की रफ्तार 40 से 70 फीसदी बढ़ी. पहले यह रफ्तार 20 से 50 फीसदी पर थी. लेकिन कुछ महीनों बाद ही इसमें कमी आने लगी और लोग फिर नगदी पर आ गए. आंकड़ों को देखें तो कैश सर्कुलेशन नोटंबदी के पहले से ज्यादा होने लगा है. 
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नक्सल और आतंकवाद पर मार
नोटबंदी को लागू करने के दौरान यह भी कहा गया था कि इससे आतंकवाद और नक्सली गतिविधियों पर लगाम कसेगी. लेकिन तीन साल बाद भी ऐसा कोई पुख्ता आंकड़ा नहीं है, जो ये बता सके कि इन गतिविधियों पर कितनी रोक नोटबंदी की वजह से लगी. हालांकि नक्सली गतिविधियों में कमी देखने को जरूर मिली है.
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विपक्ष ने बताया तुगलकी फरमान
नोटबंदी की वजह से देश की 86 प्रतिशत मुद्रा एक ही झटके में चलन से बाहर हो गई थी. पूरा देश अपने हजार-पांच सौ के नोट बदलवाने के लिए बैंकों पर टूट सा पड़ा और एटीएम भारतीयों के लाइन में खड़े होने के धैर्य की परीक्षा लेने लगे. प्रधानमंत्री द्वारा अपने इस फैसले को भ्रष्टाचार, कालेधन, जाली नोट और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम की तरह पेश किया गया. वहीं विरोधी इसकी तुलना तुगलकी फरमान से करने लगे.
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नोटबंदी पर पीएम मोदी का नजरिया  
नोटबंदी को लेकर लोकसभा चुनाव 2019 से ठीक पहले 'आजतक' के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में पीएम मोदी ने कहा था कि नोटबंदी ने कालेधन पर सबसे बड़ा हमला बोला है और टैक्स में इजाफा हुआ है. उन्होंने कहा थी कि अब भी विपक्षी नेता नोटबंदी को लेकर कभी-कभी रो पड़ते हैं, क्योंकि नोटबंदी की वजह से उनका सबकुछ लुट गया.
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'सफल रही नोटबंदी'
पीएम मोदी की मानें तो नोटबंदी से एक लाख 30 हजार करोड़ रुपये उजागर हुए. उन्होंने कहा कि हमने 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की बेनामी संपत्तियों को जब्त किया. तीन लाख से ज्यादा फर्जी कंपनियों पर ताला गया दिया, जिससे एक-एक कमरे में चल रहा अरबों और खरबों का कारोबार बंद हो गया.
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पीएम मोदी ने नोटबंदी के फायदे गिनाते हुए कहा था कि इससे आजादी के इतने साल बाद जितना टैक्स रेट था, वो दोगुना हो गया. इसकी वजह यह थी कि नोटबंदी के बाद लोगों को लगा कि अब काले धंधे और कालेधन से देश में काम चलना मुश्किल है. लिहाजा ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहिए. नोटबंदी से मुद्रास्फीति भी कम हुई है.
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