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क्या ये यूपीए-3 का रेल बजट है?

मोदी सरकार का दूसरा रेल बजट कुछ इस उत्साह पेश किया गया जैसे यह सरकार का पहला रेल बजट हो. वैसे ऐसा मानने में काई हर्ज भी नहीं है. रेल मंत्री सुरेश प्रभु वैसे भी मृदुभाषी और विनम्र व्यक्ति हैं, उनके चरित्र की ये खासियतें इस बजट में भी दिखाई दीं. दास कबीर की परंपरा पर चलते हुए उन्होंने ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाला लेखा जोखा पेश कर दिया. ऊपर से देखने पर बिलकुल सनसनीखेज या खबर बनाने वाला नजर न आने वाला यह बजट उतना भी बुरा नहीं है.

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aajtak.in
पीयूष बबेलेनई दिल्ली, 26 February 2015
क्या ये यूपीए-3 का रेल बजट है? रेलमंत्री सुरेश प्रभु

मोदी सरकार का दूसरा रेल बजट कुछ इस उत्साह पेश किया गया जैसे यह सरकार का पहला रेल बजट हो. वैसे ऐसा मानने में काई हर्ज भी नहीं है. रेल मंत्री सुरेश प्रभु वैसे भी मृदुभाषी और विनम्र व्यक्ति हैं, उनके चरित्र की ये खासियतें इस बजट में भी दिखाई दीं. दास कबीर की परंपरा पर चलते हुए उन्होंने ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाला लेखा जोखा पेश कर दिया. ऊपर से देखने पर बिलकुल सनसनीखेज या खबर बनाने वाला नजर न आने वाला यह बजट उतना भी बुरा नहीं है.

बड़ी बातों की चर्चा बाद में करेंगे, लेकिन जो सबसे अच्छी बात इस लेखक को लगी वह है अर्से बाद ट्रेन के जनरल डिब्बों और जनरल डिब्बे के यात्रियों की फिक्र करना. रेलवे नेटवर्क में हजारों सुधार होने के बावजूद साधारण टिकट बेचने वाली रेलवे की खिडक़ी की लंबी होती भीड़, भारत के आम रेल यात्री की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है. रेल मंत्री ने इस बीमारी का इलाज करने के लिए ‘ऑपरेशन फाइव मिनट’ का जिक्र किया है. बजट भाषण में इसके लिए हॉट बटन की बात की है, जहां ऑटोमेटिक मशीनों से यह टिकट प्राप्त किए जा सकेंगे. अगर यह व्यवस्था इस सरकार के बाकी बचे 4 साल तीन महीने में कामयाब हो जाती है तो यह रेलवे स्टेशनों की सूरत बदल देगी.

सिर पर अटैची, एक हाथ में थैला और दूसरे हाथ में बच्चे का हाथ पकड़े गरीब आदमी के लिए जनरल डिब्बे का टिकट पाना अटूट दु:स्वप्न जैसा है. वैसे यूपीए-2 में भी इस लाइन को कम करने का प्रयास हुआ था, लेकिन तब रेलवे नेटवर्क के भीतर प्रयास करने के बजाय, निजी एजेंसियों को एक रुपए प्रीमियम पर साधारण टिकट बेचने के अधिकार दिए गए थे. लेकिन योजना गरीब आदमी से जुड़ी थी, इसलिए इसके प्रचार-प्रसार पर खर्च नहीं हुआ.

दूसरी चीज यह कि जनरल डिब्बे बढ़ाने की बात भी बजट में कही गई. मौजूदा व्यवस्था में रेल गाडिय़ों में सामान्य तौर पर दो जनरल डिब्बे आगे और इतने ही डिब्बे पीछे लगाए जाते हैं. कम से कम 20 वर्ष से तौ मैंने उस किसी रूट पर इन डिब्बों की संख्या बढ़ते नहीं देखी, जिन पर यात्रा करने का मौका मिला. जनरल डिब्बे में आज आदमी जिस तरह सफर करता है, अगर उसे यमराज देख लें तो नरक में जनरल डिब्बे को सजा को नई श्रेणी की तरह जोड़ दें.

एक-दूसरे से मिलती इन योजनाओं के अलावा यह बजट पुराने बजटों का पुनर्पाठ जैसा दिखता है. हां, इसमें एक समझदारी यह की गई कि किराया न तो बढ़ाया गया और न घटाया गया. प्रभु ने यह ठीक ही किया, क्योंकि दोनों ही स्थिति में उन्हें आलोचना का शिकार होना पड़ता. और यह आलोचना इस समय होने वाली आलोचना से उग्र होती. रेलवे में अगले पांच साल में भारी निवेश का लक्ष्य रखकर उन्होंने मोदी सरकार की आकांक्षाओं के लिए पूरे दरवाजे खोल दिए हैं और इसका साफ खाका न बताकर रेलवे कर्मचारी यूनियनों को तुरंत आक्रामक मुद्रा में आने का मौका भी नहीं दिया है. जरा पीछे जाकर देखिए तो यूपीए टू में तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी से मनमोहन सिंह यही करवाना चाहते थे और बाद में पवन बसंल से भी कुछ-कुछ ऐसा ही कराया.

बजट में यूपीए के समय से चली आ रही योजनाओं को यह कहते हुए प्राथमिकता से पूरा करने की बात कही गई कि जो योजनाएं अंतिम चरण में हैं उन्हें पहले पूरा करना है. मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार के एजेंडे को अपने अंदाज बिना आक्रामकता आगे बढ़ाने का हौसला दिखाया है. ऐसे में कई बार लगता है कि क्या यह यूपीए-3 का बजट है? वैसे अगर ऐसा है भी तो बुराई भी क्या है. वह भी भारत सरकार थी और यह भी भारत सरकार है. तब जनता ने उन्हें सेवा करने का जिम्मा दिया था, अब इन्हें दिया है. ऐसे में अच्छी चीजें आगे बढ़ाने में गुरेज कैसा. जैसे यूपीए-1 एनडीए-2 की तरह काम कर रहा था, वैसे ही एनडीए-टू, यूपीए- 3 जैसा दिखे तो क्या हर्ज?

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