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नौकरीपेशा लोगों को न निचोड़ें

आर्थिक सुधारों के लिए महज दो बिंदुओं वाला एजेंडा होना चाहिएः सुधारों को प्रभावी बनाने के लिए निवेश में फिर से तेजी लाई जाए और सरकारी खर्च में कटौती की जाए.

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बिबेक देबरॉयनई दिल्‍ली, 22 February 2013
नौकरीपेशा लोगों को न निचोड़ें चिदंबरम

वर्ष 2013-14 का बजट चुनावों के पहले का अंतिम बजट है. सरकार के सुधार प्रयास शैशवावस्था में ही हैं और वह चुनाव के करीब वाले वर्षों में फिजूलखर्ची वाले लोकलुभावनवाद का सहारा ले रही है. यूपीए-2 ने व्यावहारिक समझदारी को सिर के बल उलटा कर दिया है और अंतिम कुछ महीनों में अपनी छवि सुधारने के लिए तत्पर दिखना चाहती है. 2009 में 100 दिन की कार्ययोजना की चर्चा ने जोर पकड़ा था, लेकिन यह हवाई ही साबित हुई.

आखिर प्रमुख अड़चन क्या है? 2003 से 2007 के बीच के ऊंची वृद्धि दर वाले दौर में बचत/निवेश की दर भी ऊंची देखी गई थी लेकिन गैर-उत्पादक सरकारी खर्चों की वजह से इसका कोई फायदा नहीं मिल पाया. वित्तीय मजबूती और विकास के बीच सीधा संबंध है. सरकार के निर्णय लेने में देरी से उपजी वन/पर्यावरण मंजूरी और भूमि अधिग्रहण की समस्या ने कोढ़ में खाज का काम किया. गठबंधन की राजनीति और संसद की अड़चन असल में एक बहाना है जिससे असल मुद्दा दरकिनार हो जाता है. सुधारों के लिए महज दो बिंदुओं वाला एजेंडा होना चाहिएः निवेश में फिर से तेजी लाएं और सरकारी खर्चों में कटौती करें. रिटेल में एफडीआइ, पेंशन, बीमा को सजा-संवारकर पेश करने से विदेशी निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों का दिल तो बाग-बाग हो गया होगा, लेकिन इससे किसी मसले का समाधान नहीं हुआ.

बजट 2013-14 पांच के आसपास की संख्याओं के बारे में होगा. पहला, वृद्धि 5.5 फीसदी के आसपास घिसट रही है. इसके लिए ग्रीक/माली को दोष नहीं दिया जा सकता या अर्थव्यवस्था में सुधार की अपरिहार्य जरूरत के बारे में सिर्फ  इच्छा रख लेने से नौ फीसदी की चाल तक वापस नहीं पहुंचा जा सकता. नौ फीसदी के लिए गरीबी/बेरोजगारी में कमी लानी होगी. सड़कों पर फिक्र सिर्फ यौन अपराधों और भ्रष्टाचार को लेकर ही नहीं है बल्कि आर्थिक वृद्धि के सुस्त पडऩे और आर्थिक अवसरों के फीके पडऩे की भी चिंता है. एक तरह से देखें तो हर बजट 14.5 फीसदी की नॉमिनल ग्रोथ को प्रोजेक्ट करता है. 7.5 फीसदी की रियल ग्रोथ और 7 फीसदी की महंगाई को देखते हुए यह शायद कुछ अलग बात नहीं है.

दूसरी बात, महंगाई का एक आंकड़ा है जिसे सरकार आदर्श तौर पर 5 के आसपास रखना चाहती है. यह सरकार का सपना है. कृषि में किसी तरह के सुधार न होने से कृषि उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पा रही है. निवेश में अड़चन से मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई में भी वृद्धि नहीं हो रही है और कच्चे माल की ऊंची लागत की वजह से इस सेक्टर को और परेशानी हो रही है. आयातित महंगाई पर तो सरकार का बहुत कम नियंत्रण होता है. अंतिम बात, सरकारी खर्च बढ़ाने की भी कम ही सराहना की जाती है क्योंकि इससे व्यवस्था में नकदी आती है और महंगाई बढ़ती है.

इस तरह हमारे पास एक तीसरा पांच के आसपास का आंकड़ा बचता है, वित्तीय घाटा/जीडीपी का अनुपात. वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि 2012-13 के संशोधित अनुमान में यह 5.3 फीसदी पर रहे और 2013-14 के बजट अनुमानों में इसे और घटाते हुए 5 फीसदी तक ले जाया जाए. सब्सिडी वाले दौर में प्रमुख सुधारों के साधन के रूप में सीधे नकदी देने और यूआइडी की काफी चर्चा हो चुकी है. अभी तक कैश ट्रांसफर को स्कॉलरशिप/पेंशन तक सीमित रखा गया है और यूआइडी लागू होने की कई समस्याओं में उलझ गया है.

पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी को लेकर कुछ प्रयास चल रहे हैं, लेकिन सरकारी नियंत्रण वाले कीमत तंत्र को खत्म करने या उसमें आमूल बदलाव करने और बीपीएल पहचानपत्र के साथ सब्सिडी को टारगेट करने के बारे में कोई संकेत नहीं मिल रहा है. खाद्य सब्सिडी बिल के कई प्रारूपों को देखकर तो यही लगता है कि यह योजना लक्षित तरीके अपनाने से काफी दूर है. इसलिए एक छोटे बिंदु के रूप में देखें तो प्रस्तावित बदलाव बजटीय सब्सिडी बिल पर मामूली (यदि ऐसा कुछ हुआ) चोट ही करेंगे. एक बड़े बिंदु के रूप में इन बहुचर्चित सुधारों में प्रचार ज्यादा है, तत्व कम. तब आखिर वित्त मंत्री आंकड़ों का मैनेजमेंट कैसे करेंगे? यह कठिन नहीं है. बस खर्चों का बजट घटाएं और निर्दयतापूर्वक मंत्रालयों के अनुदान में कटौती करें. गैर-टैक्स सहित सभी प्राप्तियों का ज्यादा अनुमान लगाएं. बेहतर है कि आंकड़ों की बाजीगरी का सहारा लें.

टैक्स दरों को बढ़ाने के सुझाव भी सामने आ रहे हैं. यह मौजूदा प्रधानमंत्री और मौजूदा वित्त मंत्री द्वारा 1991, 1995 और 1997 में वित्त मंत्री के रूप में दी गई दलील के विपरीत है. ऊंची दरों की व्यवस्था चल नहीं पाती है. दुर्भाग्य से ग्रामीण आमदनी को बिलकुल नहीं छुआ जाता है. बाकी बचे हुए सात करोड़ शहरी परिवारों के लिए टैक्स आधार बढ़ाकर टैक्स/जीडीपी अनुपात बढ़ाना चाहिए, दरें बढ़ाकर नहीं. आधार बढ़ाने के बाद छूटों को भी खत्म करने का नंबर आता है.

इस बजट में कुछ टैक्स छूटों को खत्म किया जा सकता है, लेकिन कैश ट्रांसफर और जीएसटी, दोनों के टल जाने से टैक्स छूटों को बड़े पैमाने पर खत्म करने की संभावना नहीं दिख रही है. इसलिए दरें बढ़ाने की आकर्षक संभावना के लिए लार टपकाई जा सकती है, भले ही सेस/सरचार्ज के छद्म रास्ते से ऐसा किया जाए. इसमें कोई संदेह नहीं कि टैक्स चोरी होती है, लेकिन ऐसा काफी हद तक छूटों का फायदा उठाते हुए वैधानिक तरीके से किया जाता है. इसको नजरअंदाज कर, वेतनभोगी वर्ग (जो छूटों का इस्तेमाल नहीं कर सकता) को निशाना बनाकर और सार्वजनिक खर्चे बढ़ाकर यूपीए-2 सरकार लगातार 1970 के दशक की याद दिला रही है. अन्य चीजों

में सरकारी हस्तक्षेप बढऩे से भी यह बात पुख्ता होती है. यदि हम ’70 के दशक के ग्रोथ रेट तक पहुंच जाएं तो कोई अचरज की बात नहीं होगी.

बिबेक देबरॉय दिल्ली के सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में प्रोफेसर हैं

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