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बजट: रईसों से वसूली का इरादा

घाटा कम करने के लिए अमीरों पर टैक्स लगा सकते हैं चिदंबरम. वेतनभोगी प्रोफेशनल्स की नाराजगी का जोखिम.
बजट: रईसों से वसूली का इरादा पी. चिदंबरम
धीरज नय्यरनई दिल्‍ली, 22 February 2013

आजकल वित्त मंत्री पी. चिदंबरम बहुत परेशान हैं. अगले आम चुनाव से पहले उन्हें यूपीए का आखिरी बजट पेश करना है और देश की अर्थव्यवस्था का भाग्य दांव पर लगा है. दांव पर तो उनकी साख भी है. वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो चिदंबरम किसी भी हालत में अव्वल दर्जे के मंत्री के रूप में अपनी साख बचाने को बेताब हैं, जिस पर 2जी घोटाले का दाग लग चुका है.

जनवरी में दूरसंचार से जुड़े मंत्री समूह की बैठक में उन्होंने अपने साथियों से कह दिया था, ''दूरसंचार के मामले में बहुतों ने साख गंवाई है.” यूपीए-2 में वे एकमात्र बजट 2013 ही पेश करेंगे और यह चिदंबरम के लिए अपनी खोई साख पाने का एकदम सही मौका है.

अधिकारियों का कहना है कि उनका सारा ध्यान इस वक्त एक ही आंकड़े पर लगा है और वह आंकड़ा राजकोषीय घाटे का है. उनके सामने चुनौती 2013-14 में इस घाटे को घटाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.8 प्रतिशत तक लाने की कोई भरोसेमंद योजना पेश करने की है. 2011-12 में इस घाटे ने 5.9 प्रतिशत की ऊंचाई छू ली थी. अपने इस मकसद को पाने के लिए चिदंबरम वह भी करने को तैयार हैं, जिसकी कोई उनसे उम्मीद नहीं कर सकता और यह फैसला डायरेक्ट टैक्स रेट बढ़ाने का है.

चिदंबरम बड़ी दुविधा में हैं, उन्होंने 1997 के अपने ड्रीम बजट में कुशल आर्थिक प्रशासक के तौर पर साख बनाई थी. उस बजट में उन्होंने दूसरे उपायों के साथ-साथ इनकम टैक्स की सबसे ऊंची दर को 40 से घटाकर 30 प्रतिशत कर दिया था, जिसकी हिम्मत नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह की सुधारवादी जोड़ी भी 1991-1996 के बीच उदारवाद के पहले पांच साल में नहीं कर पाई थी. चिदंबरम के इस फैसले से टैक्स चुकाने वालों का अनुपात सुधरा और उसके बाद अलग-अलग राजनैतिक सोच वाले कई वित्त मंत्री आए लेकिन कोई इस फैसले को पलट नहीं सका. इसे नियति की क्रूरता ही कहा जाएगा कि वे अपना ही फैसला पलटने पर मजबूर हैं.

फिर भी वे ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि चिदंबरम किसी हालत में नहीं चाहेंगे कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां उनके वित्त मंत्री रहते हुए भारत की सरकारी ऋण रेटिंग घटाएं. इसके लिए चाहे उन्हें टैक्स की दरें ही क्यों न बढ़ानी पड़ें. अनेक रेटिंग एजेंसियां इशारा कर चुकी हैं कि अगर राजकोष को मजबूत करने की कोई भरोसेमंद योजना सामने नहीं आई तो वे ये रेटिंग घटाने वाली हैं. इससे बचने के लिए चिदंबरम दुनिया को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं.budget

जनवरी के आखिर में वे लंदन, हांगकांग और सिंगापुर सहित यूरोप और एशिया के प्रमुख वित्तीय केंद्रों के दौरे में विदेशी इन्वेस्टर्स को आगामी बजट के बारे में आश्वस्त करने की कोशिश कर चुके हैं. चिदंबरम ने बार-बार कहा है कि यह जिम्मेदार बजट होगा और उनकी सारी कोशिश चुनाव से पहले के साल में बेलगाम लोकलुभावन बजट की आशंकाओं को निर्मूल ठहराने की है. अधिकारियों की नजर में आम तौर पर वित्त मंत्री ऐन बजट की तैयारी के दौरान एक सप्ताह विदेश में नहीं बिताया करते. एक वरिष्ठ अधिकारी ने तो मजाक में यहां तक कह दिया, ''चिदंबरम की फिल्म सिर्फ रेटिंग एजेंसियों के लिए दिखाई जा रही है.” लेकिन उनके बजट को लेकर बॉस तो बेहद गंभीर हैं.

चिदंबरम ने बड़ी तरकीब से अमीरों के लिए टैक्स बढ़ाने का मुद्दा उठाया है. प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री, दोनों के भरोसेमंद आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन ने जनवरी के पहले हफ्ते में टैक्स में इजाफा करने का शिगूफा छोड़ा. उन्होंने दिल्ली में एक सेमिनार में कहा, ''हमें राजस्व बढ़ाना होगा और ज्यादा आमदनी वाले लोगों को ज्यादा योगदान देने के लिए तैयार करना होगा.” रंगराजन का सुझाव 30 प्रतिशत की अधिकतम दर को 40 प्रतिशत करने की बजाए 30 प्रतिशत पर सरचार्ज लगाने का था.

जनवरी के आखिरी हफ्ते में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के एक और भरोसेमंद मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने भी सी. रंगराजन की हां में हां मिलाते हुए कहा था, ''अमीरों को ज्यादा टैक्स देना चाहिए.” एक अधिकारी के शब्दों में, ''अगर चिदंबरम की हां न होती तो रंगराजन और मोंटेक खुलेआम ऐसी बात न करते.” चिदंबरम तो पहले ही सभी विकल्प खुले रखने की बात कह चुके हैं. उन्होंने यह इनकार करने में बड़ी सावधानी दिखाई है कि टैक्स बढ़ाने का विचार उनका है.

टैक्स की अधिकतम दर बढ़ाने में कई जोखिम हैं. सुझाव तो यह भी है कि अतिरिक्त टैक्स 12 लाख रु. और उससे ज्यादा की सालाना आमदनी वाले लोगों को देना होगा. इसके निशाने पर बेहद अमीर लोगों की बजाए मध्यम वर्ग की ऊपरी परत होगी. एक अधिकारी की मानें तो, ''इस फैसले से वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों सहित बहुत सारे वेतनभोगी प्रोफेशनल्स नाराज हो जाएंगे.” आबादी का यह हिस्सा यूपीए से पहले ही नाराज है. टैक्स बढ़ा तो यूपीए को इन वोटों का नुकसान होना निश्चित है. अधिकारी बताते हैं कि बेहद अमीर (उद्यमी और जिनके पास भरपूर कैपिटल असेट्स हैं) लोग अपना ज्यादातर पैसा आमदनी से नहीं कमाते, बल्कि कैपिटल गेन जैसे रास्तों से कमाते हैं, जिन पर टैक्स कम है.

ऊंचे टैक्स रेट के सीमित लाभ

अर्थशास्त्री सुरजीत एस. भल्ला का तर्क है कि सबसे अधिक आमदनी वाले वर्ग पर और टैक्स लगाने का कोई औचित्य नहीं है. भल्ला सरकारी आंकड़ों के सहारे ही साबित करने की कोशिश करते हैं कि पर्सनल टैक्स के कुल राजस्व में 63 प्रतिशत हिस्सेदारी पहले से ही भारत में सबसे ऊपरी 1.3 प्रतिशत इनकम टैक्स दाताओं की है. अमेरिका से तुलना करें तो शीर्ष के एक प्रतिशत टैक्स देने वाले कुल इनकम टैक्स का 37 प्रतिशत देते हैं.

भल्ला का कहना है, ''बहस टैक्स रेट बढ़ाने पर नहीं, बल्कि बेहतर टैक्स वसूली पर होनी चाहिए.” उनकी राय में टैक्स कानूनों के पालन की दर सबसे अच्छी 20 लाख रु. से ऊपर की सालाना आमदनी वाले वर्ग में ही है. उनकी मानें तो असली चोरी 5-10 लाख रु. आमदनी के वर्ग में होती है. सरकारी आंकड़ों के विस्तृत अध्ययन के आधार पर भल्ला का अनुमान है कि सरकार को देय कुल इनकम टैक्स में से असल में सिर्फ एक-तिहाई की वसूली ही हो पाती है. 5 फरवरी को चिदंबरम ने टैक्स विभाग से आग्रह किया कि कानूनों को बेहतर ढंग से लागू कर ज्यादा टैक्स वसूला जाए. लेकिन पिछले अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि इतनी जल्दी नियमों के पालन में सुधार की गुंजाइश बहुत कम है.budget

वित्त मंत्री को यह भी सोचना चाहिए कि अमीरों पर टैक्स की दर बढ़ाकर आखिर वे कितनी कमाई कर लेंगे. 30 प्रतिशत की अधिकतम दर पर 10 प्रतिशत के सरचार्ज से 7,000 करोड़ रु. के आसपास जमा होंगे और यदि यह दर 40 प्रतिशत कर दी जाए तो 22,500 करोड़ रु. की आमदनी होगी, लेकिन 5 प्रतिशत से ऊपर के राजकोषीय घाटे में जीडीपी के लिए इसका असर सिर्फ 0.01 प्रतिशत से 0.04 प्रतिशत के बीच होगा. सरकार को सोच-समझकर हिसाब लगाना चाहिए कि एक तरफ यह मामूली लाभ है तो दूसरी ओर आबादी के एक हिस्से में नाराज होने का जोखिम है.

चिदंबरम इन्हेरिटेंस (विरासत) टैक्स लगाने की सोच सकते हैं जिस पर विवाद इनकम टैक्स की दर बढ़ाने की तुलना में कम होगा. मई, 2011 में गृह मंत्री रहते हुए चिदंबरम योजना आयोग की पूर्ण बैठक में यह टैक्स लगाने का संकेत दे चुके हैं. नवंबर, 2012 में सार्वजनिक भाषण के दौरान उन्होंने यह सुझाव दोहराया था. चिदंबरम को यकीन है कि इन्हेरिटेंस टैक्स लगाने से कमाई भी होगी और यूपीए का राजनैतिक मकसद भी पूरा हो जाएगा.

सैद्धांतिक रूप से देखें तो इन्हेरिटेंस टैक्स अनर्जित आय पर लगता है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलती है. यह बेहद प्रगतिशील कदम है, क्योंकि आबादी का सबसे अमीर हिस्सा ही यह कर चुकाएगा. यह एक लोकलुभावन उपाय भी हो सकता है क्योंकि इससे पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही असमानता की समस्या पर सीधी चोट पड़ेगी. यूपीए के पास अपने दूसरे कार्यकाल में लोकलुभावन उपायों की वैसे ही कमी रही है. वह अपनी साख को चमकाने के लिए इसका सहारा ले सकती है और अपनी गरीबों की हितैषी वाली छवि को बचाकर रख सकती है.

दुनिया के कई देशों में नागरिकों पर इन्हेरिटेंस टैक्स लगाया जाता है (देखें ग्राफिक). अमेरिका में 50 लाख डॉलर यानी करीब 27 करोड़ रु. से अधिक कीमत की किसी भी जायदाद पर मालिक की मौत के समय 40 प्रतिशत की दर से यह टैक्स लगता है. ब्रिटेन में इसकी सीमा कुछ कम यानी 3 लाख पाउंड अर्थात ढाई करोड़ रु. है. चिदंबरम और उनके सलाहकारों के लिए चुनौती ऐसी व्यावहारिक सीमा तय करने की है जिसके नीचे लोगों को इन्हेरिटेंस टैक्स चुकाने से छूट रहे. अगर यह सीमा बहुत नीची रखी गई तो मध्यम वर्ग खफा हो जाएगा, अगर बहुत ऊंची रखी गई तो हो सकता है कमाई बहुत कम हो.

दौलत का दुश्मन इन्हेरिटेंस टैक्स

इन्हेरिटेंस टैक्स की इस दलील से सब सहमत नहीं हैं. अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय का तर्क है कि सिर्फ कमाई पर उचित ढंग से टैक्स लगना चाहिए. दौलत तो उसी आमदनी से पैदा होती है जो टैक्स देने के बाद बचती है. वे कहते हैं, ''मेरा मानना है कि जब तक इनकम और संपत्ति के संचयन पर टैक्स लगता है तब तक संपत्ति पर किसी तरह का टैक्स नहीं होना चाहिए.”

भारत का कारोबार जगत भी सहमत नहीं लगता. ऐसी आशंकाएं हैं कि इससे संपत्ति अर्जित करने की सोच कमजोर पड़ेगी जबकि आगे बढऩे की सोच भारत के विकास के लिए जरूरी है. सीआइआइ के अध्यक्ष आदि गोदरेज इन्हेरिटेंस टैक्स के खिलाफ हैं. उनका कहना है, ''किसी भी विकासशील देश में ऐसा टैक्स नहीं है. यह विकसित देशों की सोच है. जब वृद्धि बहुत तेज हो रही हो तो इन्हेरिटेंस टैक्स लगाने पर अमीरों में इन्वेस्टमेंट और सेविंग्स, दोनों में गिरावट आएगी, जबकि दोनों ही वृद्धि के लिए जरूरी हैं.” आदि गोदरेज भारत में एस्टेट ड्यूटी के पिछले अनुभवों को याद दिलाते हुए कहते हैं, ''भारत में कई दशकों तक एस्टेट (जमीन-जायदाद) पर टैक्स था. इस टैक्स को जुटाने की लागत इसे जमा करने से ज्यादा रही और यह कभी कामयाब नहीं हुआ. यह बहुत ही खराब विचार है.”

प्राइसवाटरहाउसकूपर्स के टैक्स पार्टनर केतन दलाल को उम्मीद है कि इन्हेरिटेंस टैक्स को लागू नहीं किया जाएगा. दलाल कहते हैं, ''अगर ऐसा हुआ तो भी कम-से-कम शेयर्स जैसे प्रोडक्टिव असेट्स पर टैक्स को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा. इसके अलावा लिमिट भी ऊंची होनी चाहिए ताकि इसका बोझ सिर्फ बेहद अमीर लोगों पर ही पड़े. कम-से-कम एक रिहाइशी मकान की छूट होनी चाहिए ताकि मृतक के मकान में रहने वालों को यह टैक्स न चुकाना पड़े.”

चिदंबरम के वित्त मंत्री के रूप में लंबे कार्यकाल में उनके अमीर विरोधी होने का कोई संकेत नहीं मिला है, लेकिन वित्त मंत्री 4.8 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर अपनी साख दांव पर लगा रहे हैं. वे यह भी जानते हैं कि चुनाव से पहले के साल में खर्च में ज्यादा कटौती की गुंजाइश नहीं है. उन्हें मालूम है कि अगर, खासकर अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के सामने  विश्वसनीय चेहरा रखना है तो उन्हें खर्च में कटौती के साथ-साथ आमदनी बढ़ाने के नए उपाय बताने होंगे. इसकी कीमत अमीरों को चुकानी पड़ सकती है.

—साथ में श्रव्या जैन

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