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फिर संकटमोचन की भूमिका में प्रणब

नई सरकार में मुखर्जी को विवेक और लोक-लुभावन नीतियों के बीच संतुलन साध कर चलना होगा. उद्योग जगत और आम लोगों को उनसे काफी उम्‍मीदें हैं.  

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निवेदिता मुखर्जी 27 June 2009
फिर संकटमोचन की भूमिका में प्रणब

मनमोहन सिंह के नए मंत्रिमंडल में सबसे महत्वपूर्ण विभाग उनके पास है. कांग्रेस पार्टी के चहेते संकटमोचन वाली अपनी छवि के बावजूद प्रणब मुखर्जी आगामी महीनों में अप्रत्याशित विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का सामना करते हुए चुनौतियों की तेज आंच महसूस करेंगे. भारत के नए वित्त मंत्री मुखर्जी पिछले महीने मीडिया के सवालों के जवाब देते हुए जब माथे से पसीना पोंछ रहे थे तो यह महज एक प्रतीक के अलावा भी बहुत कुछ संकेत कर रहा था.

चुनौतीपूर्ण वातावरण में संभाली जिम्‍मेदारी
नॉर्थ ब्लॉक के कमरा नंबर 72-जहां उन्होंने अपना पहला पत्रकार सम्मेलन किया-की एअरकंडीशनिंग भी मई की गर्मी को बेअसर नहीं कर पा रही थी. यह आने वाले समय का संकेत हो सकता है. मुखर्जी को जो जिम्मेदारी मिली है वह भी आर्थिक वातावरण जितनी ही चुनौती भरी है- संकट का ऐसा समाधान ढूंढिए, जो सबको खुश करे. आम आदमी से लेकर उद्योगपति और निवेशक, सभी मौजूदा चिंताओं से राहत पाने को बेताब हैं.

कैबिनेट के सर्वाधिक अनुभवी शख्स
उनके पक्ष में अच्छी बात यह है कि वे हर दौर के नेता रहे हैं. ऐसे नेता, जो मंत्री रहे और कुछ कर दिखाया. 78 वर्ष की उम्र में वे कैबिनेट के सर्वाधिक अनुभवी शख्स हैं और नॉर्थ ब्लॉक में अजनबी नहीं हैं. 26/11 कांड के बाद जब पी. चिदंबरम ने गृह मंत्रालय की बागडोर संभाली तो वित्त मंत्री पद के लिए वे स्वाभाविक चयन थे. आखिर, कभी 'यूरोमनी' ने उन्हें विश्व के चोटी के पांच वित्त मंत्रियों में शुमार किया था. कमरे में जब वे प्रवेश करते हैं तो धैर्य और शांति स्पष्ट महसूस की जा सकती है. उनका क्रीम रंग का बंद गला सूट मानो कमरे की सेपिया क्रीम दीवारों से मेल खाता दिखता है.

आने वाला वक्‍त चुनौतीपूर्ण
आने वाले दिनों में उन्हें इन्हीं दो खूबियों की जरूरत पड़ेगी. विश्व आर्थिक संकट से अस्तव्यस्त हुई घरेलू अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और इसे 9 फीसदी की वृद्धि के रास्ते पर लाने के लिए उन्हें कई कड़े फैसले करने होंगे. अपनी पहचान बने चुके पाइप को भले ही उन्होंने छोड़ दिया हो, लेकिन वे भलीभांति जानते हैं कि आर्थिक क्षितिज पर काले बादल मंडरा रहे हैं; उनके लिए तसल्ली की बात यही है कि वे ऐसे राजनैतिक वातावरण में काम करेंगे, जहां वामपंथियों की मौजूदगी परेशान नहीं करेगी. आखिर उन्होंने कितने ही आर्थिक सुधारों में अड़ंगा लगाया था.
कामयाब हो सकते हैं प्रणब
सवाल यह है कि क्या मुखर्जी सफल होंगे? सीआइआइ के अध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन का मानना है कि वे सफल हो सकते हैं. वे कहते हैं, ''यूपीए को मिला पर्याप्त बहुमत आर्थिक स्थिति से निबटने के लिए जरूरी कदम उठाने का अवसर मुहैया कराएगा.'' श्रीनिवासन साथ ही यह जोड़ना भी नहीं भूलते कि यह संभावना नहीं है कि सरकार आर्थिक सुधारों को आगे ले जाने का मौका हाथ से जाने देगी. मुखर्जी के दिमाग में सुधारों का जो व्यापक खाका है, उसे कोई संकेत माना जाए तो अर्थव्यवस्था को उबारने की बूस्टर खुराक अल्पकालीन, मध्यम और दीर्घकालीन अवधि के लिए दी जाएगी और उसका लक्ष्य अर्थव्यवस्था के विकास की गति को बहाल करना होगा.

आत्‍मविश्‍वास बहाली के उपाय ज्‍यादा जरूरी
मुखर्जी का नजरिया इस मामले में एकदम स्पष्ट है कि यह तब तक हासिल नहीं हो सकता, जब तक सरकार उद्योग और व्यवसाय के खोए आत्मविश्वास को बहाल नहीं करती. हर महीने 1 करोड़ नए ग्राहक जोड़ने वाले टेलीकॉम क्षेत्र और एफएमसीजी क्षेत्र के अलावा अधिकतर क्षेत्रों में उत्पादन, उपभोग और निवेश लगभग ठप है. हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले छह महीनों में 19,705 करोड़ रु. राहत के लिए दिए हैं और सरकार ने 2,40,000 करोड़ रु. के तीन उत्‍प्रेरक पैकेज की भी घोषणा की है. लेकिन जाहिर है कि पैकेज ही नहीं, कुछ कर दिखाने के मामले में भी काफी कुछ किया जाना जरूरी है.
 
ऋण दरों में मामूली कटौती
इसका अर्थ यह आश्वस्ति भी करना है कि निर्यातकों और छंटनी तथा ऊंची ब्याज दर झेल रहे छोटे तथा मझोले व्यवसायों को बैंक सस्ती दरों पर ऋण दें. फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (एफआइईओ) के अध्यक्ष ए. साक्तिवेल का कहना है, ''रेपो और रिवर्स रेपो दरों में खासी कमी आई है, बैंकों ने ऋण दरों में मामूली ही कटौती दिखाई है.'' मुखर्जी ने बैंकों को अधिक हितकारी कार्ययोजना के प्रति प्रतिबद्धता का वादा लेने के लिए उनके साथ एक बैठक करने को प्राथमिकता दी है. लेकिन वित्त मंत्री की सबसे बड़ी चिंता अर्थव्यवस्था को 9 फीसदी वृद्धि के रास्ते पर लाने की है.

राजस्‍व घाटा बढ़ने की आशंका
सरकार को खर्च के लिए पैसा भी चाहिए. यदि उसके पास संसाधनों की कमी पड़ जाती है तो उसे और पैसा उधार लेना पड़ेगा, जिससे राजस्व घाटा और बढ़ जाएगा. फिलहाल उधार लेने में 46.5 फीसदी की वृद्धि हुई है और केंद्र तथा राज्‍य सरकारों के लिए 2008-09 में राजस्व घाटा 11 फीसदी से अधिक हो गया है. सरकार फिर विनिवेश शुरू कर सकती है लेकिन मंत्रालय संसाधन जुटाने की योजनाओं के प्रति प्रतिबद्ध नहीं दिखता. अब इसे 'ममता फैक्टर' कहिए या 9 के अंक के प्रति दीवानगी, फिलहाल कुछ दिनों के लिए तो सरकार ने विकास को फिर शुरू करने को प्राथमिकता देने और उसके बाद वित्तीय विवेक के मुद्दे सुलझने का फैसला कर लिया लगता है. वित्त मंत्री के मुताबिक, कयामत की भविष्यवाणी करने वाले बढ़े सार्वजनिक खर्च और उसके परिणामस्वरूप बढ़ते राजस्व व वित्तीय घाटे पर जरूरत से ज्‍यादा ध्यान देते रहे हैं. मुखर्जी कहते हैं, ''हाल ही में हमने जो वृद्धि दर दर्ज की है, उस पर जल्दी वापसी हमें वित्तीय विवेक और अनुशासन की पसंदीदा राह पर चलने में मदद करेगी.'' बुनियादी सुविधाओं में निवेश कर वे इसे हासिल करने की सोच रहे हैं. उनके पास जो परियोजनाएं हैं, उनकी पुनःसमीक्षा की जाएगी, और जरूरत पड़ने पर उन्हें और मजबूत बनाया जाएगा तो नीतियों और प्रक्रियाओं में भी पर्याप्त फेरबदल किया जाएगा.सेवा कर में सुधार की जरूरत
मुखर्जी इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि अर्थव्यवस्था को प्रतियोगी बनाने के लिए माल तथा सेवा कर जैसे सुधार और लचीले श्रम कानूनों की जरूरत पड़ेगी. काले धन को विदेशी बैंकों के खातों में जाने से रोकने के लिए वे प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉडरिंग एक्ट को भी लागू करने को उत्सुक हैं. सुधार आधारित विकास का जो जनादेश यूपीए को मिला है उसके प्रति मुखर्जी की प्रतिबद्धता पर शक करने की कोई वजह नहीं है. वाणिज्‍य मंत्री के रूप में उन्होंने मराकेश समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसकी परिणति विश्व आर्थिक संगठन के रूप में हुई. एक वित्त मंत्री के रूप में उनका चयन सरकार के मजबूत इरादों का संकेत है. कई लड़ाइयां लड़ चुके दिग्गज को अब अपने सारे कौशल और राजनैतिक पहुंच का प्रयोग तृणमूल कांग्रेस जैसे सहयोगियों के जरिए सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए करना होगा. तृणमूल कांग्रेस आर्थिक सुधारों के प्रति उदासीन रवैया रखने के लिए ही जानी जाती है. यह देखने के लिए हमें इंतजार करना होगा कि क्या 'ममता प्रभाव' उतनी ही गंभीर बाधा है, जितना 'करात प्रभाव' हुआ करता था.

कार्य योजना

- विकास दर को फिर 9 फीसदी पर लाना.

- तुरंत और सस्ते ऋण की मदद से उद्योग जगत में भरोसे का माहौल बहाल करना.

- बजट में शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे विकास तत्वों को मजबूत करना.
 
- आर्थिक नियमन व्यवस्था को और अधिक कारगर बनाना.

- बुनियादी सुविधाओं के विकास पर होने वाले खर्च को बढ़ाना.

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