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उम्मीद से बेहतर रहा बीजेपी का प्रदर्शन

अपने नब्बे फीसदी उम्मीदवारों की जीत के साथ भाजपा ने गठबंधन में हासिल किया बराबरी का दर्जा, अब आगे दोनों दलों के संबंधों पर नजर रखना दिलचस्पी भरा हो सकता है. 
उम्मीद से बेहतर रहा बीजेपी का प्रदर्शन
अमिताभ श्रीवास्तव 28 November 2010

अगर लालू प्रसाद यादव मुगालते के शिकार हुए हैं तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दीवारों पर लिखी इबारत को समझ नहीं पाई. बिहार चुनाव 2010 में सबसे बड़ी सफलता गाथा लिखने वाली भाजपा को तो मानो बिन मांगी मुराद मिल गई. उसने जितने की उम्मीद नहीं की थी उससे कहीं ज्‍यादा सीटें मिलीं.

पहले, उसके नेता कह रहे थे, ''हम कुछ सीटें जीतेंगे, कुछ हारेंगे.'' सबको लग रहा था कि भाजपा एक बार फिर बड़ी पार्टी जद(यू) के साये में रहने के लिए मजबूर रहेगी. लेकिन पार्टी ने अपने 102 उम्मीदवारों में से 91 को जिता कर सबको चौंका दिया. उसे 2005 की 55 सीटों के मुकाबले इस बार 36 अधिक सीटें मिलीं.

सच तो यह है कि इतने बड़े पैमाने पर जीत से खुद पार्टी के नेता भी चकित हैं. भाजपा को इसका अंदाजा नहीं था. लिहाजा उसे परिणाम पर आधिकारिक प्रतिक्रिया व्यक्त करने में वक्त लग गया. आश्चर्य नहीं कि उसने पटना के अपने कार्यालय में सबसे आखिर में संवाददाता सम्मेलन बुलाया. उस वक्त लालू और लोजपा के रामविलास पासवान मीडिया के आखिरी सवाल का जवाब दे रहे थे. इस देरी का कारण शायद सुशील कुमार मोदी और सी.पी. ठाकुर को साथ लाने में हुई हो सकती है. वैसे दोनों नेताओं ने मुस्कुराकर साथ-साथ फोटो जरूर खिंचवाए.

भाजपा ने यह कमाल कैसे कर दिखाया? हालांकि मोदी ने इसे ''सकारात्मक वोट'' करार दिया लेकिन भगवा पार्टी की कामयाबी के पीछे कई वजहें लगती हैं-नाउम्मीद विपक्ष और राजग के वोटों का सफल मिश्रण से लेकर जमीनी स्तर पर बढ़िया प्रबंधन.

इसके अलावा, निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन ने भी अपनी भूमिका निभाई. इसकी वजह से पिछले विधानसभा चुनाव में जहां 52 निर्वाचन क्षेत्रों में अगड़ी जातियों की पर्याप्त संख्या थी, वहीं इस बार ऐसे क्षेत्रों की संख्या 72 हो गई.

अगड़ों ने कांग्रेस के साथ जाने से इनकार कर दिया और भाजपा को समर्थन जारी रखा. इसके अलावा, बेहतर परिणाम का एक कारण यह भी कि भाजपा के उम्मीदवार ही उपलब्ध विकल्पों में बेहतर माने जा रहे थे.

महत्वपूर्ण बात यह है कि भले ही भाजपा और जद (यू), दोनों इसे राजग की जीत बता रहे हों और एक-दूसरे को धन्यवाद दे रहे हों लेकिन उन्होंने अपनी सफलता गाथा का बखान करने के लिए अलग-अलग संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया. इससे कई लोगों को लगा कि यह गठनबंधन के साझीदारों के बीच अपनी बढ़त साबित करने की शुरुआत थी.

असल में भगवा पार्टी ने करीब 90 फीसदी सफलता हासिल करके 141 में 115 सीटें हासिल करने वाले जद (यू) की 81.56 फीसदी सफलता के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया. अब संदर्भ के बिंदु बदल गए हैं.

भाजपा की कामयाबी से साबित होता है कि दोनों साझीदारों ने एक-दूसरे को बखूबी वोट हस्तांतरित किया. लालू और पासवान इस तरह का सहयोग करने में स्पष्ट रूप से विफल रहे.

नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बनने के बाद से अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी), मुस्लिम और महादलित का अनोखा जोड़ तैयार करके मजबूत सामाजिक आधार तैयार किया है.

दूसरी ओर भाजपा ने व्यापारी और अगड़ी जातियों के अपने पारंपरिक वोट बैंक को बखूबी बनाए रखा है जबकि विपक्ष ने-कांग्रेस और राजद-लोजपा के अलग-अलग लड़ने की वजह से-अलग-अलग सामाजिक समूहों के लोगों का प्रतिनिधित्व किया.

दोनों पार्टियों की शानदार जीत को अलग करके नहीं देखा जा सकता. इससे यह साबित होता है कि मतदाताओं के बीच राजग को काफी स्वीकार्यता हासिल है. हालांकि नीतीश कुमार ने लालकृष्ण आडवाणी समेत भाजपा के कई प्रमुख नेताओं के साथ कोई साझा चुनाव प्रचार नहीं किया. शायद अरुण जेटली भाजपा के एकमात्र बड़े राष्ट्रीय नेता थे जिनके साथ नीतीश प्रचार को निकले थे.

हालांकि अगड़ों का बड़ा वर्ग नीतीश कुमार से खुश नहीं था फिर भी उन्होंने भाजपा और उसके साझीदार को वोट दिया. भाजपा उन्हें कांग्रेस से ज्‍यादा बेहतर लगी. शुरू में कांग्रेस से उम्मीद थी लेकिन वह धीरे-धीरे खत्म हो गई. इसी प्रकार, लालू अगड़ों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का वादा करने के बावजूद विश्वास नहीं जमा पाए.

ये परिणाम जद (यू) के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अतीत में नीतीश कुमार भाजपा से ज्‍यादा चुनावी लाभ उठाते थे. इस बार स्थिति पलट गई. यह रिकॉर्ड से जाहिर हो जाता हैः राज्‍य में जद (यू) का वोट प्रतिशत 2000 के विधानसभा चुनाव के बाद 2009 के आम चुनाव में करीब चार गुना बढ़ गया जबकि भाजपा का गिर गया. भाजपा 2009 के आम चुनाव में केवल 13.93 फीसदी वोट ही बटोर पाई, जो उसके राष्ट्रीय औसत 18.8 से भी कम था. लेकिन 2010 में पार्टी फिर अपना आधार बढ़ाकर सामने आई.

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा को ऐसी पार्टी के रूप में देखा जा रहा था, जो राजनीतिक लाभ के लिए नीतीश कुमार की सहयोगी भूमिका निभाने के लिए तैयार है.

कई लोगों का मानना था कि 2004 और 2009 के आम चुनाव में हार के बाद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भविष्य में केंद्र तक पहुंचने के लिए नीतीश को सीढ़ी समझने लगा था.

भाजपा ने अतीत में गठबंधन को बनाए रखने की खातिर नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार से दूर रखने से लेकर नीतीश सरकार को अल्पसंख्यक समर्थक उपाय लागू करने तक सब कुछ करने दिया.

इन चुनाव नतीजों से भाजपा में एक दूसरा मोदी उभर आया है-बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, जो राज्‍य में पार्टी का चेहरा हैं. लगता है कि अब उनका कद काफी ऊंचा हो गया है. संयोगवश, मोदी को पार्टी के भीतर और बाहर सार्वजनिक रूप से निशाना बनाया जा रहा था. उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जा रहा था जो नीतीश के सामने प्रायः झुक जाते हैं. लेकिन वे बड़ी होशियारी के साथ समावेशी एजेंडा पर काम कर रहे थे, यह काम भाजपा के पहले के नेता नहीं कर पाए थे. अब उनकी पार्टी के पास मिसाल है, जिससे साबित होता है कि कैसे नरम हिंदुत्व की जगह मध्यमार्गी, समावेशी राजनीति से ज्‍यादा चुनावी लाभ मिलता है.

पार्टी को इस अप्रत्याशित सफलता से राष्ट्रीय राजनीति में भी बढ़त मिल सकती है. मोदी का कहना है, ''यह प्रगति और विकास के लिए जीत है. इन परिणामों से यह धारणा खत्म हो गई है कि कुछ वर्ग हमें वोट नहीं देते. यहां तक कि अल्पसंख्यकों ने भी भाजपा का समर्थन किया.''

अभी तक बिहार में राजग की इस सफलता की विशेषता यह रही है कि भाजपा ने नीतीश के अल्पसंख्यक समर्थक एजेंडा को शामिल करने में काफी दरियादिली दिखाई है. शायद पार्टी को लगता था कि नीतीश को भाजपा की जरूरत हो न हो, उसे उनकी ज्‍यादा जरूरत है. इसके पीछे मुख्यतः यह धारणा थी कि नीतीश अपने बूते सामान्य बहुमत हासिल कर सकते हैं. उन्होंने अकेले दम 115 सीटें जीत कर ऐसा कर दिखाया-यह विधानसभा में बहुमत से मात्र सात कम है.

लेकिन बिहार में भाजपा के लिए अच्छी बात यह है कि अब उसे भी बराबर का दर्जा हासिल है. अब इस उत्साहजनक नतीजे के बाद दोनों साझीदारों के रिश्तों को देखना दिलचस्प होगा.

दूसरी ओर लालू का जनाधार बिखर गया है. स्पष्ट रूप से यह उनकी अब तक की सबसे करारी हार है, यह 2005 में पार्टी की हार से भी ज्‍यादा करारी है. उनकी पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी दोनों जगह से हार गईं, जिससे लालू का खराब प्रदर्शन जाहिर होता है. इन परिणामों से यह भी साबित होता है कि राजग ने 2009 के आम चुनाव के बाद से अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है. उसे तब 40 में से 32 सीटें मिली थीं.

बिहार की राजनीति में लालू और पासवान अलग-थलग पड़ गए हैं, और अब वे महज अपने समुदाय के नेता बनकर रह गए हैं. एक ओर जहां राजद को 22 सीटें मिलीं वहीं लोजपा को केवल तीन पर संतोष करना पड़ा. लालू और पासवान अब फिर पांच साल के लिए बिहार की सत्ता से दूर हो गए हैं. केंद्र में अवांछित की उनकी स्थिति से उनका पतन और तेज हो गया है. वे राष्ट्रीय राजनीति में भी अपना महत्व खो रहे हैं.

दूसरी ओर, कांग्रेस मुख्य विपक्षी की भूमिका निभाने की उम्मीद कर रही थी. लेकिन करारी हार की वजह से-उसे केवल चार सीटें मिलीं-उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया.

अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा वर्ग स्पष्ट रूप से राजग के पीछे लामबंद हो गया है; इसी तरह महदलित और अति पिछड़ी जातियां भी उसकी समर्थक हैं.

विकास के संकेत से भी बिहार के लोग धर्म और जाति से परे जाकर विकास को वोट देने के लिए प्रेरित हुए. पहली बात, बेहतरीन और चिकनी सड़कों से राज्‍य के विभिन्न सामाजिक और आर्थिक वर्ग में नीतीश की अपील जंच गई. प्रदेश में कानून और व्यवस्था तथा स्वास्थ्य सेवा की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति से उन्हें चुनाव में बढ़त हासिल हुई. नीतीश को लंबे सफर की शुरुआत करनी थी, क्योंकि काफी आगे जाना है.

बिहार ने नीतीश की शानदार जीत के साथ ही विकास की घुट्टी पी ली है. राज्‍य आखिरकार भारत के विकास की मुख्यधारा में शामिल हो गया है. बिहार भsले ही अभी पूरी तरह चमचमा नहीं रहा हो पर उसकी संभावना को नकारा नहीं जा सकता.

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