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बिहार चुनाव- किसकी दाल गलेगी?

यह नई दिल्ली से पटना जाने वाली उड़ान आइसी-415 है, और बात 21 अगस्त की है. इस उड़ान में बिहार की राजनीति के दो दिग्गज नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव सवार हैं. अचानक विमान में सुगबुगाहटें होने लगीं. दोनों किस तरह एक-दूसरे का अभिवादन करेंगे?

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आज तक वेब ब्‍यूरोबिहार, 21 September 2010
बिहार चुनाव- किसकी दाल गलेगी?

यह नई दिल्ली से पटना जाने वाली उड़ान आइसी-415 है, और बात 21 अगस्त की है. इस उड़ान में बिहार की राजनीति के दो दिग्गज नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव सवार हैं. अचानक विमान में सुगबुगाहटें होने लगीं. दोनों किस तरह एक-दूसरे का अभिवादन करेंगे? दबी जबान में बातें हो रही थीं. जब लालू शाम साढ़े छह बजे विमान में पहुंचे तो बिजनेस क्लास की 1ए सीट पर बैठे नीतीश कुमार ने 'नींद' के आगोश में जाना बेहतर समझा.

राजद प्रमुख ने भी नीतीश को लेकर पूरी तरह उदासीनता भरा रुख अपनाया और वे सीट की क्वालिटी को लेकर चालक दल के सदस्यों से उलझते दिखे. कोई 80 मिनट के इस सफर के दौरान दोनों आगे वाली सीट पर बैठे थे लेकिन उनके बीच कोई बात नहीं हुई. संभवतः इससे दोनों के बीच की तल्खी की गहराई जाहिर होती है. आज बिहार के चुनावी परिदृश्य में इसी तरह के भाव प्रमुख रूप से नजर आ रहे हैं.

बिहार में 21 अक्तूबर से विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में लालू प्रसाद जो नवंबर 2005 से सत्ता से निर्वासन झेल रहे हैं, पाटलिपुत्र की सत्ता को अपने कब्जे में लेने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं जबकि एक शख्स उनकी राह का रोड़ा बना हुआ है, और वे नीतीश कुमार हैं. इसी तरह, यह लालू और सिर्फ लालू ही हैं जो नीतीश को एक बार फिर सत्ता सुख भोगने से वंचित रख सकते हैं.

लालू ट्रैफिक की उस गाय की तरह हैं, जो नीतीश के वाहन के कहीं पहुंचने में देरी कर सकती है और उसे पलट भी सकती है. इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि उनकी दुश्मनी के कोई नियम नहीं हैं. अब चुनावों के सिर पर होने के चलते लालू और नीतीश एक-दूसरे को गुजरे जमाने की चीज बनाने पर उतारू हैं.

बिहार में चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा चुका हैं. जहां नीतीश कुमार कह रहे हैं, ''लोग उम्र छिपाने के लिए अपने बाल रंग रहे हैं'', वहीं लालू ने भी यह आरोप लगाकर आग उगली कि बिहार के मुख्यमंत्री अपने चेहरे की 'डेंटिंग और पेंटिंग' कर रहे हैं. चुनावों के दौरान जबानी महायुद्ध में एक और विषय जो प्रमुखता से रहने वाला है, वह है बदलाव का.

राज्य के 243 विधानसभा क्षेत्रों में 5.44 करोड़ से अधिक मतदाता होने से ही बिहार विधानसभा के प्रचंड चुनाव में व्यक्तित्वों का मुद्दों पर हावी रहना अवश्यंभावी है. वैसे, बिहार आज भी पुरानी समस्याओं से ग्रस्त है- प्रति व्यक्ति आय के मामले में राज्य सबसे नीचे है, 55 फीसदी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है, स्त्री-पुरुष अनुपात राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है, प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग के मामले में भी राज्य बहुत पीछे है. इसके अलावा भी कई समस्याएं मौजूद हैं. विडंबना यह है कि इन चुनावों को बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि इस बार बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है.

इन चुनावों में नीतीश कुमार, लालू; और राम विलास पासवान अपने राजनीतिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण जंग लड़ रहे हैं. जाहिर है कि एक का नुक्सान होने से दूसरे को फायदा मिलेगा. अगर लालू और पासवान वापसी करने में असफल रहे तो उन्हें अपनी विदाई के लिए तैयार रहना चाहिए. अगर नीतीश असफल रहे तो वे इस बात का ताजा और सबसे विडंबनात्मक उदाहरण होंगे कि किस तरह से अच्छी शुरुआत का फायदा वे न ले सके.

लालू और पासवान साठ की उम्र पार कर चुके हैं, इसलिए 2010 के विधानसभा चुनाव उनके लिए राजग को सत्ता से उखाड़ फेंकने का संभवतः सर्वश्रेष्ठ और आखिरी मौका भी हैं. उधर, 59 साल की उम्र में नीतीश कुमार राष्ट्रीय मानचित्र पर अपनी ताजा छाप छोड़ने की दहलीज पर हैं. दिग्गजों को धूल चटाने वाले के रूप में मशहूर नीतीश कुमार को अगर लगातार दूसरा मौका मिलता है तो वे बड़े राष्ट्रीय नेताओं की कतार में आ जाएंगे. अगर वे हार गए तो उन्हें शायद दूसरा मौका न मिल सकेगा.

लालू और पासवान नीतीश को सत्ता विरोधी लहर में बहाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. दूसरी ओर, नीतीश अपने राजनीतिक ह्ढतिद्वंद्विंयों के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने की निरंतर कोशिश में जुटे हैं. उधर, कांग्रेस राहुल गांधी के सहारे राज्य में त्रिकोणीय मुकाबले बनाने की जुगत में जुटी है.

दिलचस्प बात तो यह है कि बिहार के चुनाव हालांकि अक्सर निजी करिश्मे के बल पर लड़े जाते हैं, लेकिन इस बार बड़ी हस्तियों ने चुनाव नहीं लड़ने का मन बनाया है. नीतीश कुमार कह चुके हैं कि उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने की कोई जरूरत नहीं है. इसी तरह, राजद-लोजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार लालू प्रसाद की भी चुनाव लड़ने की संभावना कम ही नजर आती है.

इसके अलावा, 2009 के लोकसभा चुनाव में लोजपा का खाता न खुलने का दंश झेल रहे राज्यसभा सांसद रामविलास पासवान और उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, जो राज्य में जद(यू)-भाजपा गठबंधन कायम रहने की कुंजी हैं, भी चुनाव नहीं लड़ेंगे. यह बिहार की व्यक्तित्व आधारित राजनीति से मेल नहीं खाता है. लेकिन रणनीतियां बनाने और प्रचार करने की दोहरी जिम्मेदारियां उन्हें कतई एक सीट पर ध्यान केंद्रित करने की आजादी नहीं देती हैं.

दो दशक पहले, मंडल लहर लालू को मजबूत स्थिति में ले आई थी. तब से राजद धीरे-धीरे ही सही लेकिन निश्चित तौर पर कभी अपने मजबूत रहे जनाधार को प्रतिद्वंद्वियों के हाथों खोता आया है. आज, लालू उसी इतिहास को दोहराने का प्रयास कर रहे हैं. 10 मार्च, 1990 को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल की शुरुआत करने वाले लालू एक बार समय की मरुभूमि में उलटा सफर तय कर रहे हैं.

आज 20 साल बाद, अतीत का यह सफर ही उन्हें उज्जवल भविष्य की ओर ले जा सकता है. लालू समझौते करने में भी उदार रहे हैं, जीत की उम्मीद से झुकते गए हैं. वे प्रभुनाथ सिंह जैसे कट्टर आलोचक को भी अपने साथ ले आए हैं. नीतीश विरोधी वोटों को कटने से बचाने के लिए उन्होंने पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को 75 सीटें दी हैं. उन्हें पासवान के साथ न होने का खामियाजा अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ा था.

हाल ही में जब पार्टी में सवर्णों के वरिष्ठ नेता अखिलेश सिंह कांग्रेस की ओर अधिक झुकते नजर आए तो लालू उनके आवास पर रात्रि भोज पर संबंधों को दुरुस्त करने के लिए पहुंचे. उन्होंने सवर्णों को लुभाने के लिए उनके बीच आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 फीसदी आरक्षण देने का वादा भी किया है. ये वही सवर्ण हैं जो 15 साल के राजद के शासन काल को घृणा से देखते हैं. इस बार लालू उन जातीय समूहों को लुभाने में सफल भी हो सकते हैं, जो नीतीश के पिछड़े वर्गों और महादलितों के प्रति अत्यधिक अनुराग से खफा हैं.

दरअसल, 90 के दशक के बाद 2010 के विधानसभा चुनाव पहला मौका हैं जब बिहार में 16 फीसदी सवर्ण वोट किसी गिनती में माने जा रहे हैं. ऐसा इसलिए है कि पिछड़े वर्ग का जनाधार बंट कर रह गया है. लालू और पासवान दोनों ही मुसलमानों, यादवों, दलितों और मोहभंग का शिकार हुए सवर्णों को लेकर जातीय गणित भिड़ाने में लगे हुए हैं. लालू की हमेशा से अपने मतदाताओं के साथ बेहतरीन जुगलबंदी रही है. लेकिन वे जानते हैं कि जब तक जातीय गणित सही नहीं होगा तब तक इस सब का कोई फायदा नहीं होने वाला. इसके अलावा, उनका फोकस उन कुछ सीटों पर भी है जो राजद ने 2005 में बहुत ही कम अंतराल से गंवा दी थीं.

इस बार लालू बिहार का चेहरा बदलने की बात भी कर रहे हैं. वे वादा कर रहे हैं कि वे बिहार को उसी तरह बदलकर रख देंगे जैसे उन्होंने भारतीय रेल को बदला है. लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर उनके रिकॉर्ड को देखकर, उनकी इस बात के कुछ ज्यादा कद्रदान मिलने वाले नहीं लगते. इसके अलावा राजद प्रमुख के लिए नीतीश की नतीजे देने वाले मुख्यमंत्री की 'छवि' की काट ढूंढना भारी पड़ रहा है.

नीतीश कुमार भी इस बात से वाकिफ हैं कि उनका 'खास प्रभाव' लोकसभा चुनाव, जिनमें राजग को 40 में से 32 सीटें मिली थीं, के बाद कुछ घटा है. उस समय राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से 176 पर जद (यू) और भाजपा उम्मीदवारों ने बढ़त दर्ज की थी जबकि राजद सिर्फ 33 सीटों पर ही बढ़त बना सका था. वैसे, सितंबर 2009 में 18 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में 13 सीटों में राजग की हार हुई थी.

लेकिन नीतीश के तरकश में अब भी कई तीर बचे हैं. उन्होंने दोहरी रणनीति पर काम किया. उन्होंने सीमांत समूहों के सामाजिक कल्याण को ध्यान में रखकर विकास को अंजाम दिया. अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वे बहुत ही सयानेपन से नया सामाजिक आधार तैयार करते रहे. उन्होंने पारंपरिक सामाजिक गुटों से अलग जाति और समुदाय आधारित नए गठबंधन का निर्माण किया. नीतीश अब अपने फायदे के लिए 'विपरीत गुटों के गठबंधन' को भुना रहे हैं, जिसमें सवर्ण से लेकर अत्यधिक पिछड़े और महादलित तक शामिल हैं. संघर्ष करने वाले एक धर्मनिरपेक्ष की उनकी छवि और अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखकर उठाए गए उनके कदमों से उन्हें समर्थन का नया आधार मिला है.

अब जब चुनाव सिर पर हैं, नीतीश के लिए सब कुछ एकदम आसान नहीं है. राष्ट्रपति चुनाव की तरह प्रचार को अंजाम दे रहे नीतीश ने बेशक कुछ नए दोस्त बनाए हैं, पर इस प्रक्रिया में कुछ भरोसेमंद दोस्त खोए भी हैं. उनके सबसे विश्वासपात्र सिपहसालार प्रभुनाथ सिंह और ललन सिंह विरोधी खेमे में हैं. राज्य में नीतीश की स्वाकार्यता दर अब भी ऊंची है. फिर भी नीतीश के लिए एक खतरा मौजूद है. उनकी उपलब्धियों का बढ़ा-चढ़ाकर किया जाने वाला प्रचार जो जमीनी हकीकत से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता है. इससे वे 'बिहार उदय' के जाल में आसानी से फंस सकते हैं. उनके शासन को लेकर भारी गुणगान भी उनकी छवि को धक्का पहुंचा सकता है.

उनकी परेशानियां यहीं खत्म नहीं हो जातीं. उनकी सहयोगी भगवा पार्टी के कुछ अवयव नीतीश की आक्रामक धर्मनिरपेक्षता के विरूद्ध मूक विरोध जताते रहे हैं. ये शायद भाजपा के कोर काडर को राजग के प्रति वैसी सीटों पर उदासीन कर सकता है, जहां जद (यू) के प्रत्याशी खडे हों. अयोध्या पर फैसला-जिसकी इस महीने आने की संभावना है-चाहे जो हो, भाजपा उसे अपने मूल मतदाताओं के समक्ष भुनाने की कोशिश कर सकती है, लेकिन इसका जद (यू) के साथ उसके गठबंधन पर उलटा असर हो सकता है और नीतीश इस मसले पर कौई रुख अपनाने से इनकार कर सकते हैं.

दरअसल, गठबंधन में ताजा दरार सोमवार को तब नजर आई जब जद (यू) नेताओं ने भाजपा के साथ सभी संबंधों को खत्म करने की मांग कर डाली. उन्होंने यह मांग भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी के इस बयान पर की कि नरेंद्र मोदी बिहार में प्रचार करेंगे. लेकिन अब दोनों ही पार्टियां इस मामले को रफा-दफा करने का प्रयास करती दिख रही हैं क्योंकि गठबंधन में किसी भी तरह की फूट को उजागर करने का यह सही समय नहीं है. अगर कुछ और नहीं तो इस बात से कम-से-कम एक बार फिर यह इशारा मिल जाता है कि भाजपा बिहार में नीतीश की सहयोगी की भूमिका निभा रही है.

एक ऐसी पार्टी जो कर्नाटक, मध्य प्रदेस, गुजरात, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और झारखंड में सत्ता में है, वह पार्टी बिहार में मातहत पार्टी बन कर रह गई है. ऐसा इसलिए भी माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व अतीत में कई सहयोगियों को खो चुका है और वह बिहार के मुख्यमंत्री को बतौर सहयोगी नहीं खोना चाहता. यह गठबंधन उस समय एकदम टूटने के कगार पर पहुंच गया था जब इस साल जून माह में नीतीश ने नरेंद्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के नेताओं के लिए रात्रि भोज को रद्द कर दिया था और गुजरात द्वारा बिहार को भेजी गई बाढ़ राहत सामग्री भी लौटा दी थी. लेकिन भाजपा अभी तक उनके आगे झुकती आ रही है.

नीतीश के लिए प्राकृतिक आपदाओं से उपजी परेशानियों-सूखा और बाढ़-के अलावा उनकी कुछ एकदम स्पष्ट असफलताएं भी हैं जो एक झटके में उजागर हो जाती हैं. गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है, राज्य बिजली के लिए केंद्र पर निर्भर है, उद्योगीकरण के नाम पर भी ज्यादा कुछ आकार नहीं ले सका है और बेरोजगारी का दर्द अब भी लोगों को सालता है. उनकी मुसीबतों में इजाफा माओवादियों द्वारा हाल ही में अपहृत चार पुलिसकर्मियों की वजह से हुआ है, जिसके चलते कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में राज्य की सफलता की दास्तान पर ग्रहण लग गया.

उधर, कांग्रेस त्रिशंकु विधानसभा की उम्मीद लगाए बैठी है. उसका लक्ष्य 10 सीटों के अपने मौजूदा आंकड़े में चार गुना की वृद्धि करने का; है ताकि वह कुछ बड़ा उलटफेर कर सके. यह बिहार में राहुल गांधी के लिए एक तरह की अग्निपरीक्षा है.

आखिरकार, यह चुनावी जंग नीतीश विरुद्ध लालू होने जा रही है. नीतीश की सोशल सर्जरी का मुकाबला लालू-पासवान के वोट आधार से होगा. दोनों नेताओं के पास परस्पर विरोधी हुनर और गठबंधन हैं, लेकिन वे एक जैसे दर्शन और एक जैसी महत्वाकांक्षा से प्रेरित हैं. बहरहाल, दोनों जिस लक्ष्य का सपना देख रहे हैं, उसमें दो व्यक्ति एक साथ नहीं समा सकते.

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