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बिहार में फिर बजी घोटाले की घंटी

यह राज्‍य कभी भी घोटालों से अनजान नहीं रहा. ऐसा लगता है कि बिहार एक के बाद एक घोटाले झेलने का आदी हो गया है, और अगर देखा जाए तो हमेशा ही घोटाले के लिए जिम्मेदार बड़ी मछलियां काफी हद तक पकड़ में आ ही नहीं पाती हैं.
बिहार में फिर बजी घोटाले की घंटी
अमिताभ श्रीवास्‍तवनई दिल्‍ली, 02 September 2010

यह राज्‍य कभी भी घोटालों से अनजान नहीं रहा. ऐसा लगता है कि बिहार एक के बाद एक घोटाले झेलने का आदी हो गया है, और अगर देखा जाए तो हमेशा ही घोटाले के लिए जिम्मेदार बड़ी मछलियां काफी हद तक पकड़ में आ ही नहीं पाती हैं.

साल दर साल, बिहार वित्तीय गड़बड़ियों और अनियमितताओं के मामलों के चलते सुर्खियों में बना रहता है. लेकिन यह मामला-अगर यह घोटाला कहलाने की शर्तों पर खरा उतरता है- अपने विशाल आकार और पैमाने के कारण सबके ऊपर भारी पड़ सकता है. बदतर यह कि यह अनियमितता ऐसे समय हुई है जब बिहार की बागडोर नीतीश कुमार के हाथ में है, जिन्हें एक ऐसे तेजतर्रार राजनीतिज्ञ के रूप में पहचाना जाता है जिसके पास अनुभव है और इस तरह की अनियमितताओं से निबटने की प्रशासनिक समझ भी.

मौजूदा विवाद उभरा है नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट से, जिसमें 1 अप्रैल, 2002 से 31 मार्च, 2008 की अवधि में सरकारी खजाने से गलत ढंग से 11,412 करोड़ रु. निकाले जाने की ओर इशारा किया गया है. 15 जुलाई को पटना हाइकोर्ट ने इन तथ्यों के संदर्भ में मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया था. हालांकि, राज्‍य सरकार ने फैसले की समीक्षा के लिए कोर्ट का रुख किया. 23 जुलाई को कोर्ट ने सरकार की इंटरलॉक्युटरी याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.

अदालत ने सीबीआई निदेशक के पेश होने पर स्टे जारी कर दिया है. अदालत ने 15 जुलाई के अपने फैसले में इस तरह का आदेश जारी किया था. वहीं, एडवोकेट जनरल पी.के. साही ने बताया कि 15 जुलाई के हाइकोर्ट के फैसले पर स्थगन जारी रहेगा. यानी जब तक बिहार सरकार की इंटरलॉक्युटरी याचिका पर हाइकोर्ट कोई फैसला नहीं ले लेता तब तक सीबीआई जांच नहीं होगी. 11,412 करोड़ रु. वह रकम है जिसका विभिन्न सरकारी अधिकारियों को भुगतान किया गया लेकिन इन भुगतानों को लेकर अनिवार्य विस्तृत आकस्मिक (डीसी) बिल जमा नहीं कराए गए.

इस तरह की अनियमितताएं मनरेगा और मिड-डे मील स्कीम सरीखे विकास कार्यक्रमों से संबंधित हैं. इतने सालों से विभिन्न विभागों में विभिन्न स्तरों और स्थानों पर कार्यरत सरकारी अधिकारी संक्षिप्त आकस्मिक (एसी) बिल के आधार पर विकास निधि से पैसा निकालते रहे. अगर साधारण शब्दों में बात की जाए तो सीएजी रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि विभिन्न विकास योजनाओं के लिए निकाली गई राशि के उपयोग से जुड़े वाउचर जमा नहीं कराए गए, जिसके मायने यह हुए कि रिकॉर्ड में इस बात को स्पष्ट करने के लिए कुछ भी मौजूद नहीं था कि खर्च किया गया पैसा सही जगह लगा है.

सीएजी रिपोर्ट 14 जुलाई, 2009 को राज्‍य विधानसभा में पेश की गई थी, लेकिन इसे विडंबना ही कहेंगे कि राज्‍य सरकार ने बगैर किसी ब्यौरे वाले इन भुगतानों के खिलाफ कुछ नहीं किया या कहें, पिछले एक साल के दौरान चीजों को सही करने की दिशा में भी कोई कदम नहीं उठाया. यह मामला फिलहाल विधानसभा की लोक लेखा समिति के पास है. जब 15 जुलाई को पटना हाइकोर्ट ने सीएजी रिपोर्ट में सामने आईं वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया तो राज्‍य सरकार ने भी अपनी कवायद तेज की.

गौरतलब है कि 24 नवंबर, 2005 को नीतीश कुमार के सत्ता में आने से पहले 1 अप्रैल, 2002 और 31 मार्च, 2005 के बीच राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थीं. अदालत ने अरविंद कुमार शर्मा की जनहित याचिका (पीआइएल) पर सुनवाई के दौरान जांच के आदेश दिए थे. याचिका में आरोप लगाया गया है कि ऑडिट संबंधी विभिन्न आपत्तियों के बावजूद 2002-03 और 2007-08 के लिए लंबित पड़े डीसी बिलों को संबंधित डीडीओ (ड्रॉइंग और डिस्बर्सिंग अधिकारी) द्वारा महालेखाकार के कार्यालय में जमा नहीं कराया गया.

राज्‍य की ओर से अदालत में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एल. नागेश्वर राव ने तर्क दिया कि सीएजी की जिस रिपोर्ट को विधानसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) के समक्ष जांच के लिए रखा गया है, वह सदन की संपत्ति है और विशेष रूप से उसके अधिकार क्षेत्र में आती है. इसलिए इस मसले पर दाखिल की गई जनहित याचिका को रद्द कर देना चाहिए. सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि लंबित पडे़ डीसी बिल अनियमितताओं की श्रेणी में नहीं आते हैं क्योंकि एसी बिलों के निमित्त निबटारा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है.

इन तर्कों से परे देखा जाए तो मौजूदा मामला नैतिकता का राग अलापने वाली नीतीश सरकार को अन्य पूर्ववर्ती सरकारों की श्रेणी में खड़ा कर देता है. हमेशा आत्मप्रशंसा में गले तक डूबी रहने वाली सरकार खराब वित्तीय प्रबंधन से अपना पल्ला आसानी से नहीं झड़ सकती. सीएजी के तथ्यों पर आधारित यह विवाद नीतीश सरकार के लिए एक बड़ा झटका है. राज्‍य सरकार ने यह तर्क भी दिया है कि विभिन्न राज्‍य सरकारों और केंद्र सरकार की कुछ शाखाओं में भी डीसी बिल लंबित पाए गए हैं.

उदाहरण के लिए, केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के 9,789.14 करोड़ रु. के डीसी बिल भी लंबित पड़े हैं. लेकिन यहां यह बात खास है कि बिहार के सरकारी अधिकारियों ने बिहार ट्रेजरी कोड की स्थापित प्रक्रियाओं की भारी अनदेखी की है. इस प्रक्रिया से जुड़ा नियम बहुत सीधा हैः एसी बिल के बाद डीसी बिल दिया जाना चाहिए जिसमें उस खर्च से जुड़ा वाउचर होना चाहिए और उस पर वरिष्ठ अधिकारी के हस्ताक्षर होना भी जरूरी है.

लेकिन क्या यह एकाउंटिंग संबंधी लापरवाही का एक सीधा-सादा मामला है? या फिर इस गड़बड़ी की और भी कोई हकीकत है? फिलहाल तो विशेषज्ञ भी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में अक्षम हैं लेकिन ऐसे कुछ निश्चित संकेतक हैं जो कुछ तो आभास देते ही हैं. हालांकि सीएजी रिपोर्ट से नीतीश कुमार के पूर्ववर्तियों पर भी आरोप लगे हैं लेकिन उनकी सरकार इसलिए ज्‍यादा सुर्खियों में है क्योंकि उनके कार्यकाल में निकाले गए पैसे और उसके एवज में जमा न कराए गए डीसी बिलों की संख्या बहुत ज्‍यादा है.

2002-03 से एसी बिलों के एवज में निकाली गई राशि में एकदम से उछाल आया है जिसे एक हद तक तो समझा जा सकता है. लेकिन इस तर्क को काटने वाला तथ्य भी मौजूद है, वह यह कि इस अवधि के दौरान असमायोजित राशि में भी इजाफा हुआ है. यहां आसान-सी बात जाहिर होती है कि जितनी बड़ी राशि निकाली गई, उतनी ही कम रशीदें जमा कराई गईं. असमायोजित राशि में निरंतर वृद्धि देखी गई है.

2002-03 में जो असमायोजित राशि 324.20 करोड़ रु. थी वह 2007-08 में 12 गुना बढ़कर 3,810.84 करोड़ रु. पर पहुंच गई. 2007-08 में सरकार के विभिन्न विभागों ने 7,081 एसी बिलों के एवज में 3,860.47 करोड़ रु. के खर्च का दावा किया था. लेकिन जब बात इस खर्च को सही ठहराने की आई तो सरकार ने सिर्फ 49.63 करोड़ रु. की लागत वाले 228 विस्तृत आकस्मिक बिल ही जमा कराए. अगर इसे किसी भी पैमाने से आंका जाए तो यह बड़ी राशि है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.

सत्तारूढ़ राजग गठबंधन ने इसे मात्र बिलों के समायोजन और खर्च का हिसाब देने में असफलता का मामला बताया. दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे के जरिये राजग को चारों खाने चित करने के लिए अत्यधिक व्यग्रता दिखा रहा है. हालांकि इसे अभी एकदम से घोटाले का नाम नहीं दिया गया है लेकिन सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि विशाल लोक निधि से जुड़े डीसी बिल जमा कराए बिना उसे यूं ही लंबे समय तक लटकाए रखना बहुत बड़ी ''गंभीर वित्तीय अनुशासनहीनता/अनियमितता'' को जन्म दे सकता है. सीएजी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए बिहार को आंध्र प्रदेश सरकार के फॉर्मूले को अमल में लाने के लिए कहा है, जहां अगर पहले एसी बिल का निबटान नहीं किया गया है तो वहां लोक निधि से तीसरे एसी बिल के जरिये राशि नहीं निकाली जा सकती.

सीएजी रिपोर्ट ने साफ तौर पर विवादों के पिटारे को खोल कर रख दिया है. हालांकि अनियमितताएं डीडीओ तक सीमित रहने वाली नहीं. यही नहीं, राजकोष के अधिकारियों की भी खिंचाई हो सकती है कि उन्होंने पूर्व में किए गए भुगतान के लिए उपयोग प्रमाणपत्र लिये बिना ही किस तरह दूसरे पूर्व भुगतान कर दिए.

इससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि क्या हम अफसरशाहों को ऑडिट संबंधी नियमों की धज्जियां उड़ाने की छूट देने के लिए नीतीश सरकार को माफ कर सकते हैं? क्या यह संभव है कि सरकार पूरी तरह से बेखबर रहे? या, क्या यह सरकार द्वारा भरोसे में धोखा खाने का मामला है? अब ऐसे तथ्यों की भरमार है जो राजग के जुनूनी समर्थकों के लिए भी सरकार का बचाव करना मुश्किल बनाकर रख देंगे. जाहिर है, सरकार इतने बड़े स्तर पर अंजाम दी गई अनियमितताओं से पूरी तरह तो बेखबर नहीं रही होगी.

यही नहीं, राज्‍य सरकार का आंतरिक ऑडिट विंग भी पहले ड्रॉइंग और डिस्बर्सिंग अधिकारियों द्वारा इस तरह की गड़बड़ियों की बात कह चुका है. जिस अवधि के लिए राज्‍य सरकार के ऑडिटरों ने प्रश्नचिन्ह लगाया था वह 1989-90 से 2004-05 तक का काल था. इस बार चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि बिहार सरकार ने इन अनियमितताओं को पांव पसारने का मौका दिया. क्या बिहार में सुशासन का दावा करने वाली सरकार को अतिरिक्त रूप से सावधान नहीं होना चाहिए था क्योंकि राज्‍य पहले से ही घोटालों के लिए कुख्यात रहा है? उदाहरण के लिए, बाढ़ घोटाला जिसमें बाढ़ राहत कार्य के लिए जारी फंड में गड़बड़ी की गई. इसका खुलासा उस समय हो सका जब एसी बिलों के एवज में जारी किए गए वाउचरों की जांच हुई. इसे लेकर दिया जाने वाला आमफहम तर्क यह हो सकता है कि ऑडिट संबंधी कई आपत्तियां जांच करने के लिए काफी जटिल हो सकती हैं.

2006 में, हाइकोर्ट के एक अन्य अधिवक्ता महेंद्र प्रसाद गुप्ता ने गबन की गई राशि के बारे में जानकारी देने के लिए जनहित याचिका दायर करके न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की थी-राज्‍य सरकार के ऑडिटरों के मुताबिक यह राशि लगभग 1,700 करोड़ रु. की थी. बाद में 2008 में हाइकोर्ट ने राज्‍य सरकार द्वारा कार्रवाई रिपोर्ट जमा कराने और गड़बड़ी की गई राशि के बारे में उचित कार्यवाही करने के सरकार के वादे के बाद याचिका का निबटारा कर दिया था. यहां प्रश्न पैदा होता है कि राज्‍य सरकार किस प्रकार सीएजी की आपत्तियों को नजरअंदाज कर सकती है, जबकि अतीत में भी वह राज्‍य के ऑडिटरों द्वारा पेश की गई अनियमितताओं को दूर करने का वादा कर चुकी है.

बहरहाल, अतीत में भी बिहार की राजग सरकार अलग-अलग मामलों में सरकारी पैसे हड़पने के आरोप में डीडीओ के खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज करा चुकी है. इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि सीएजी द्वारा वर्तमान में पेश किए गए तथ्यों को आखिर किस तरह नजरअंदाज किया जा सकता है जबकि अतीत में ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है? बिहार सरकार सबक सीखने से इनकार कर चुकी है.

सीएजी रिपोर्ट कहती है कि उसने अकेले मार्च 2007 में 3,849.30 करोड़ रु. के कुल खर्च में से 2,375.04 करोड़ रु. संक्षिप्त आकस्मिक बिल पर निकाले थे. जाहिर तौर पर ऐसा वित्त वर्ष के अंत पर फंड को बेकार न होने देने के लिए किया गया. लेकिन, इसने ऑडिट और एकाउंट के नियमों के मकसद को ही बेमानी कर दिया. ऐसे में राज्‍य एजेंसियां क्या कर रही हैं? लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान कहते हैं, ''यह तो ऊपरी आकलन है क्योंकि राज्‍य की एजेंसियां मामले की तह तक नहीं जा सकतीं. इसके लिए केंद्रीय जांच की जरूरत है.''

स्पष्ट है कि विधानसभा चुनाव सिर पर हैं जिससे राज्‍य में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं लेकिन बिहार विधानसभा में हाल में नजर आया नजारा सीएजी रिपोर्ट को लेकर पैदा हुए विवाद का ही नतीजा था. बिहार के विपक्षी दलों ने, जो अभी तक नीतीश की चालों का जवाब देने में सक्षम नहीं थे, इस मुद्दे को हाथोहाथ लपक लिया. इसका उदाहरण राज्‍य विधानसभा में भी नजर आया. वो दो दिन बिहार विधानसभा के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होंगे. जबरदस्त हंगामे और अन्य विवादास्पद स्थितियां पैदा होने के बाद विपक्ष के 67 विधायकों को निलंबित कर दिया गया और विधानसभा से उठाकर बाहर कर दिया गया.

इस विवाद से राजनीतिक हित साधने के लिए सबसे आगे नजर आ रहे राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने कहा, जब 2006 की सीएजी रिपोर्ट में अनियमितताएं दिखाई गईं थी तो बिहार सरकार ने खुद से कार्रवाई क्यों नहीं की? नीतीश कुमार को सीबीआई जांच पूरी होने तक पद से इस्तीफा दे देना चाहिए.'' इस सब के बीच नीतीश कुमार ने पत्रकारों से बातचीत में इस मामले पर कोई भी बात करने से इनकार करते हुए कहा कि कोर्ट से बाहर इस मसले पर बात करना सही नहीं होगा. उन्होंने इस्तीफे की विपक्षी मांग पर चुटकी लेते हुए कहा, ''उनकी खुशफहमी क्षणिक साबित होगी.''

बेशक नीतीश ने बहादुरी भरे शब्द कहे. लेकिन जिस उत्कंठा के साथ उनकी सरकार ने सीबीआई जांच का विरोध किया उससे ये संकेत मिलते हैं कि वे जानते हैं कि सीएजी विवाद उन्हें आगामी चुनाव में किस तरह का नु.कसान पहुंचा सकता है. हालांकि पिछले कुछ हफ्तों में मुख्यमंत्री विपक्षियों, विशेषकर सवर्णों से दूरियों को पाटने की कवायद में लगे हैं. वैसे भी वे अल्पसंख्यकों, दलितों और अत्यधिक पिछड़ों के बीच अपना आधार मजबूत कर चुके हैं. यही नहीं, वे खुद से अलग हुए लोगों को जोड़ने की कवायद में बखूबी लगे हुए हैं. इसी के तहत उन्होंने जगदीश शर्मा और पूरनमासी राम का निलंबन वापस ले लिया है.

तस्लीमुद्दीन को भी जद (यू) में जगह दे दी है. और तो और, आनंद मोहन को मनाने के लिए उनके गांव तक हो आए. साथ ही अपने सहयोगी दल भाजपा के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए वे हरसंभव कोशिश को अंजाम दे रहे हैं. जाहिर है, नीतीश अपने दूसरे कार्यकाल के लिए अपने धरातल को मजबूत करने की कवायद में जोरशोर से जुटे हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि चुनावी वर्ष में पैदा हुए इस नए विवाद ने उनके लिए एक और मोर्चा तैयार कर दिया है, जिस पर उन्हें ध्यान देने की जरूरत है.

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