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चुनाव आयोग की सख्ती की भेंट चढ़ रहा 'चुनावी माहौल', ठप हुआ ये 'बाजार'

चुनाव आयोग की सख्ती के चलते पिछले कुछ सालों के पहले वाला चुनावी माहौल अब बिल्कुल बदल चुका है. हालांकि इसकी एक वजह तेजी से बदल रही डिजिटल प्रवृत्ति और बढ़ती महंगाई भी हो सकती है क्योंकि अब चुनावों में मैदानी प्रचार से ज्यादा प्रचार अन्य माध्यमों के जरिए होता है.

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aajtak.in [Edited By: कौशलेन्द्र]लखनऊ, 06 February 2017
चुनाव आयोग की सख्ती की भेंट चढ़ रहा 'चुनावी माहौल', ठप हुआ ये 'बाजार' चुनाव प्रचार सामग्री

एक दौर था जब चुनाव हुआ करते थे तो प्रदेश का बच्चा-बच्चा चुनावी माहौल में सराबोर नजर आता था. पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार नजर आता था. चुनाव प्रचारों में भारी-भरकम राशि खर्च होती थी. कई गाड़ियों, रिक्शों पर लाउड स्पीकर से प्रचार हुआ करता था. पैसों की बर्बादी और नोटों के दम पर वोट खरीदने की बातें सामने आने पर चुनाव आयोग ने कुछ कठोर कदम उठाने शुरू किए. निष्पक्ष चुनावों की खातिर इस बार चुनाव आयोग ने कई सख्त कदम उठाए. इस बार चुनाव खर्च की सीमा 28 लाख रखी गई है.

चुनाव आयोग की सख्ती के चलते पिछले कुछ सालों के पहले वाला चुनावी माहौल अब बिल्कुल बदल चुका है. हालांकि इसकी एक वजह तेजी से बदल रही डिजिटल प्रवृत्ति और बढ़ती महंगाई भी हो सकती है क्योंकि अब चुनावों में मैदानी प्रचार से ज्यादा प्रचार अन्य माध्यमों के जरिए होता है. मोबाइल मैसेजिंग, कैंपेन कॉल के अलावा फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सएप पर इन दिनों जमकर प्रचार हो रहा है.

इस पूरी कवायद में नुकसान हुआ उन छापाखानों और व्यापारियों का जो चुनाव सामग्रियों का बिजनेस करते थे. आज हम आपको कुछ ऐसी ही चुनाव सामग्रियों से रू-ब-रू करवा रहे हैं जो अब विरले ही देखने को मिलती हैं.

झंडे/झंडियां
रैली और जनसभाओं से पहले कार्यक्रम स्थल के आसपास के इलाकों में राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ता झंडे और झंडियां लगाते हैं. इन दिनों सीमित चुनावी खर्च के चलते यह स्थल के आसपास ही नजर आते हैं वरना एक दौर था कि चुनाव आते ही पूरा शहर झंडे-झंडियों से पट जाता था.

बटन स्टिकर/बिल्ला
बटन स्टिकर और बिल्लों का सबसे ज्यादा क्रेज बच्चों के भीतर हुआ करता था. चुनाव प्रचार में लगी गाडियों के पीछे दौड़ते बच्चे तरह-तरह के स्टिकर और बिल्ले इकट्ठा करते थे. नेताओं के कपड़ों पर भी चुनावी बिल्ला नजर आता था. आज के दौर में अब यह गायब ही हो चुका है. हालांकि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर बीजेपी का बिल्ला लगाए चुनावी रैलियों में नजर आते रहे हैं.

पंपलेट
पंपलेट में राजनैतिक पार्टियां अपने चुनावी एजेंडे के साथ-साथ प्रत्याशी को जिताने की फरियाद करती थीं. चुनावी गाड़ियां अलग-अलग इलाकों में घूम-घूम पंपलेट बांटा करती थीं. अब इनकी संख्या भी काफी सीमित हो गई है.

टोपी/मुखौटा
चुनावी टोपियां भी बच्चों के साथ-साथ युवाओं को लुभाने का काम करती थीं. गर्मियों में होने वाले चुनाव प्रचारों में ये पार्टियों के लिए काफी मुफीद होती थीं. इसके अलावा मुखौटे भी काफी प्रचलित हैं. पार्टियां अपने बड़े नेताओं के मुखौटों का इस्तेमाल भी चुनाव प्रचार में खूब करती आई हैं. नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के मुखौटे इन दिनों काफी नजर आते हैं.

कटआउट
कटआउट का इस्तेमाल चुनावी रैलियों और प्रचार वाहनों पर किया जाता था. लेकिन अब इनकी जगह फ्लैक्स प्रिटिंग ने ले ली है. कटआउट महंगे होने के साथ-साथ बहुत ही ज्यादा देख-रेख मांगते थे जबकि फ्लैक्स सस्ते होने के साथ इजी टू कैरी होते हैं.

की-रिंग/बेल्ट/पेन/टी-शर्ट/छाता/मोबाइल कवर
पहले चुनावों में पार्टियां अपने प्रचार के लिए तरह-तरह की उपयोगी चीजों पर चुनाव-चिन्ह या प्रत्याशी की तस्वीर लगाकर प्रचार किया करती थीं. माहौल और मौसम को ध्यान में रखते हुए इन चीजों का ऑर्डर दिया जाता था. की-रिंग, बेल्ट, पेन, टी-शर्ट, छाता और मोबाइल कवर जैसी चीजें राजनैतिक पार्टियां बांटती रहती थीं. हालांकि इनमें से कुछ चीजें तो अभी भी नजर आ जाती हैं लेकिन अब इनका इस्तेमाल सीमित हो गया है.

फटका/मफलर
फटका चुनाव प्रचार के लिए नेताओं का सबसे पसंदीदा होता है. लगभग सभी पार्टियों के नेता चुनाव प्रचार के दौरान अपने-अपने चुनाव चिन्ह वाले फटके गले में लटकाए नजर आ जाएंगे. हालांकि फटके का फैशन अभी कायम है. ऐसे ही मफलर भी सदाबहार हैं.

हैंड बैंड
फटके की तरह ही युवा नेता हैंड बैंड को काफी पसंद करते हैं. फटका जहां गले में पहना जाता है तो हैंड बैंड हाथ की कलाई में.

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