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पंजाब में ठीक एक महीने बाद वोटिंग, पढ़ें-कितनी तैयार हैं पार्टियां

पंजाब की सत्ता यूं तो कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन के बीच झूलती रही है लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी की एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है.

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aajtak.in
विजय रावत 04 January 2017
पंजाब में ठीक एक महीने बाद वोटिंग, पढ़ें-कितनी तैयार हैं पार्टियां कांग्रेस के सीएम कैंडिडेट और पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह

पांच राज्यों के चुनावों की रणभेरी चुनाव आयोग ने बजा दी है. पंजाब में ठीक एक महीने बाद यानी 4 फरवरी को वोट डाले जाने हैं. पंजाब की सत्ता यूं तो कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन के बीच झूलती रही है लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी की एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है. यहां एसएडी-बीजेपी गठबंधन के सामने जहां 10 साल की एंटी इंकंबैंसी से पार पाने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस के सामने आम आदमी पार्टी को दिल्ली का इतिहास दोहराने से रोकने की.

कांग्रेस को अमरिंदर से ही आस
पंजाब में कांग्रेस आत्मविश्वास से भरी हुई है. उसने अमृतसर से लोकसभा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पर दांव खेलते हुए उनके नेतृत्व में ही चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है. पिछले चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह का 'मिशन पंजाब' औंधे मुंह गिरा था. खुद उनका बेटा रनिंदर सिंह समाना सीट से हार गया था लेकिन इस बार पार्टी सत्तारूढ़ अकाली-भाजपा से नाराज वोटरों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए मुस्तैद है.

नवजोत सिंह सिद्धू के साथ पार्टी की बातचीत चल रही है जबकि नवजोत कौर सिद्धू पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुकी हैं. परगट सिंह जैसे अकाली दल के भी कई अहम चेहरे जिस तरह कांग्रेस में शामिल हुए उससे पार्टी को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है. यूपी के मुकाबले पार्टी ने यहां अपने उम्मीदवारों की लिस्ट पहले फाइनल कर दी. अगर सिद्धू भी पार्टी के पक्ष में प्रचार को राजी हो जाते हैं तो 10 साल से सत्ता से वनवास झेल रही कांग्रेस के अच्छे दिन आ सकते हैं।

आप ने अपनाया दिल्ली वाला फॉर्मूला
आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपनी सरप्राइज एंट्री की है. लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ऐसी चली कि राजधानी दिल्ली की सात में से एक भी सीट उसके हाथ नहीं लगी लेकिन इसके बावजूद उसने पंजाब से चार सीटें जीतकर सबको हैरान कर दिया. इसके बाद पार्टी ने अपना पूरा ध्यान विधानसभा चुनावों पर लगा दिया और अब जब कि चुनाव का ऐलान हो चुका है तो वो राज्य में बड़ी ताकत बनकर उभरने का दावा कर रही है. आप पंजाब में भी दिल्ली के फॉर्मूले के भरोसे है. दिल्ली में सरकार बनने पर शीला दीक्षित को जेल भेजने के ऐलान की तरह संयोजक अरविंद केजरीवाल पंजाब में भी विक्रम सिंह मजीठिया को जेल भेजने का वादा हर चुनावी सभा में कर रहे हैं.

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की ही तर्ज पर पंजाब में भी वालंटियर्स की मदद से घर-घर जाकर अपना आधार तैयार किया है. खुद उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल कहते हैं कि अगर तीन महीने पहले चुनाव होते तो आम आदमी पार्टी से उनका तगड़ा मुकाबला होता. हालांकि दिल्ली के मुकाबले पार्टी का कमजोर पक्ष उसका सीएम कैंडीडेट न होना है. वहीं अंतिम समय में अपने राज्य संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर को बाहर कर देना भी उसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. भगवंत मान के जैसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं उससे भी पार्टी की छवि को धक्का लगा है. धर्मवीर गांधी पहले ही पार्टी से अलग राह चुन चुके हैं. ये सब केजरीवाल के पंजाब मिशन को पलीता लगा सकते हैं.

बादल विकास और बीजेपी मोदी के भरोसे
पंजाब में पिछले 10 साल से सत्ता पर काबिज शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी गठबंधन अगर एक बार फिर सत्ता में वापसी करता है तो ये किसी चमत्कार से कम नहीं होगा. हालांकि जहां तक तैयारियों की बात की जाए तो उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने अपनी ओर से इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी है. वे लगातार विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं और विभिन्न शहरों में पिछले 10 साल में सरकार द्वारा किए गए कार्यों को उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहे हैं.

शिरोमणि अकाली दल को अपनी सहयोगी बीजेपी के साथ गठबंधन का फायदा मिलने की भी उम्मीद है क्योंकि इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि का उसे सीधे लाभ मिलेगा. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जिस तरह बीजेपी लगातार तीसरी बार सत्ता में आई है, उससे भी इस गठबंधन को अपने लिए उम्मीद दिखी होगी. गठबंधन के लिए चुनौती इस बात की है कि राज्य में जड़ जमाई हुई नशे की समस्या के लिए विरोधी सीधे-सीधे सत्ता में बैठे लोगों को जिम्मेदार ठहराते हैं. पंजाब में पठानकोट और गुरदासपुर में हुए आतंकी हमलों के दौरान राज्य की आंतरिक सुरक्षा भी सवालों के घेरे में आई थी. यही वजह है कि बादल पिता-पुत्र के सामने चुनौती गंभीर मानी जा रही है.


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