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क्या किरोड़ी लाल मीणा राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी दोनों का खेल बिगाड़ेंगे?

राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी के पाला बदल-बदल कर राज करने की जुगलबंदी को तोडऩे में जुटे इस नेता पर है सबकी नजर. क्या वे तीसरी शक्ति बन पाएंगे

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रोहित परिहारनई दिल्ली, 03 December 2013
क्या किरोड़ी लाल मीणा राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी दोनों का खेल बिगाड़ेंगे?

जब आप 62 वर्ष के सांसद किरोड़ी लाल मीणा को एक गद्दे पर शांति से बैठे पॉपकॉर्न चबाते हुए देखते हैं, तो वे एक शांत और सहजता से उपलब्ध व्यक्ति लगते हैं, राजनीति में बनी अपनी गुस्सैल और आक्रामक छवि के बिल्कुल विपरीत. यह वह व्यक्ति है जिसने राजस्थान विधानसभा की 200 में से 150 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को भूचाल जैसा झटका दिया है.

वह एक जनजातीय नेता हैं, उस मीणा समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले, जिसका राज्य की कुल 13.5 फीसदी जनजातीय जनसंख्या में से अकेले छह फीसदी हिस्सा है. लेकिन उनके द्वारा उतारे गए प्रत्याशियों की सूची देखकर यह खुलासा होता है कि वे खास तरह की सोशल इंजीनियरिंग करने का कठिन प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने लगभग हर जाति को प्रतिनिधित्व दिया है.

उनके प्रत्याशियों में एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर, ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई कर लौटे दो युवा और एक रिटायर्ड आइएएस अधिकारी और एक किन्नर शामिल हैं. वे और उनकी पत्नी गोलमा देवी (मौजूदा विधायक) दो-दो सीटों से लड़ रहे हैं. सवाई माधोपुर की जनरल सीट से मैदान में उतरकर उन्होंने बीजेपी नेता वसुंधरा राजे को सीधे चुनौती देने की कोशिश की है.

इस सीट से राजे द्वारा लाई गईं जयपुर की राजकुमारी दिया कुमारी बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. अगर दिया के मुकाबले किरोड़ी की जीत होती है तो वसुंधरा के लिए यह व्यक्तिगत हार जैसी होगी और इसी डर से पार्टी यहां गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली करने जा रही है.

किरोड़ी लाल इस साल की शुरुआत में ही पी.ए. संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी में शामिल हुए हैं. यह उनका समझदारी भरा निर्णय है क्योंकि संगमा ऐसे जनजातीय नेता हैं जिसकी साफ-सुथरी छवि है और जो राष्ट्रीय पहचान भी रखते हैं.

राजस्थान की राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए किरोड़ी लाल ने काफी मेहनत की है. वर्ष 1980 में सक्रिय राजनीति में उतरने से पहले वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे थे और उन्होंने दो साल डॉक्टरी भी की है. आपातकाल के दौरान मीसा के तहत उन्हें 17 माह तक जेल में बंद रखा गया था और उसके बाद से वे 35 बार जेल की सींखचों के पीछे गए.

उन्होंने 280 बार आंदोलनों का नेतृत्व किया और उसमें शामिल हुए जिसके लिए उनके खिलाफ 98 मामले दर्ज किए गए हैं.
पिछले दो वर्षों में उन्होंने 178 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया, हेलिकॉप्टर से एक साल में 160 घंटे की उड़ान भरी, चार साल में सड़क मार्ग से करीब दो लाख किमी. और ट्रेन से 10,000 किमी. की यात्रा की.

इसके अलावा वे गांवों में पैदल भी चला करते थे, जहां अकसर वे रात बिताते थे. वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनका पूरे राज्य में जमीनी स्तर पर संपर्क है. साफ तौर से वे प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वसुंधरा राजे और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बाद तीसरे प्रमुख नेता हैं.

वे राजे जैसे वोट जुटा सकने वाले या गहलोत जैसे दुर्जेय तो नहीं है, लेकिन शहरी इलाकों सहित राज्य के सभी क्षेत्रों में लोग काफी रुचि के साथ 'किरोड़ी फैक्टर’ की बात कर रहे हैं.

कई साल पहले उन्होंने भैरों सिंह शेखावत को नाराज करते हुए उनकी इस सलाह को नजरअंदाज कर दिया था कि एक अधिकारी की दुर्घटना में हुई मौत के मामले में कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी को न फंसाएं.

अतीत को याद करते हुए किरोड़ी लाल कहते हैं कि वे तब युवा और अपरिपक्व थे और उनका मानना है कि शेखावत और जोशी राज्य के अब तक के दो सबसे अच्छे और ईमानदार मुख्यमंत्री रहे हैं. जिंदगी ने उन्हें कई सबक दिए हैं. अशिक्षित गोलमा देवी को एक बार गहलोत मंत्री भी बना चुके हैं.

2008 में उन्होंने वसुंधरा राजे के खिलाफ  विद्रोह कर दिया था, जब राजे ने मीणा बेल्ट में उनकी पसंद वाले छह प्रत्याशियों को उतारने से इनकार कर दिया था और ऐसे लोगों को टिकट दिया था जो कांग्रेस से हार चुके थे. वे कांग्रेस को मदद की पेशकश लेकर 10 जनपथ, दिल्ली चले गए और बदले में अपने चुनावी अभियान के लिए फंड की मांग की.

कांग्रेस ने उन्हें हेलिकॉप्टर मुहैया कराया. मीणा बेल्ट में बीजेपी का बुरा हाल हुआ और किरोड़ी लाल को अच्छी सफलता मिली. वे मंत्री बनने को तैयार नहीं हुए और अपनी पत्नी गोलमा देवी को मंत्री बना दिया, लेकिन वे भी ज्यादा दिन तक पद पर नहीं रहीं.

आखिर एक ऐसी सरकार में रहने का मतलब नहीं बनता था जिसके खिलाफ  उनके पति बार-बार आंदोलन कर रहे हों और जेल जा रहे हों. इसलिए इस बात के संदेह के बावजूद कि उनके मौजूदा चुनावी अभियान को कांग्रेस आर्थिक मदद दे रही है, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है, वे एक अलग तरह के नेता साबित हुए हैं.

वह जोर देकर कहते हैं कि उनके कार्यकर्ता ही चुनाव अभियान के लिए फंड दे रहे हैं और पूरे राज्य में उम्मीदवार खड़े करने के लिए उनकी पार्टी के पास पैसे नहीं हैं. उनके कुछ समर्थकों का कहना है कि संगमा मदद कर रहे हैं, तो कुछ कहते हैं कि मीणा समुदाय के कुछ अफसर आर्थिक मदद दे रहे हैं.

लेकिन मीणा खुलकर यह स्वीकार करते हैं कि राजे के विरोधी सभी पुराने बीजेपी नेता उनके साथ हैं. सत्य नारायण गुप्ता ऐसे ही एक नेता हैं जो कभी राजे के भरोसेमंद सहयोगी हुआ करते थे. व्यापारी समुदाय के एक और प्रमुख नेता का नाम भी चर्चा में आ रहा है.

मीणा बीजेपी से नाराज आरएसएस नेताओं के भी संपर्क में हैं और इसी वजह से उन्होंने बीजेपी के पूर्व उपाध्यक्ष सुनील भार्गव को अपने साथ जोड़ लिया है. भार्गव को उन्होंने राजस्थान एनपीपी का अध्यक्ष बनाया है, जबकि खुद मीणा इसके सदस्य मात्र हैं.

बीजेपी की प्रवक्ता ज्योति किरण कहती हैं, ''यह बचे-खुचे लोगों की पार्टी है जिसमें टिकट अशोक गहलोत ने बांटे हैं ताकि कांग्रेस की बी-टीम तैयार हो सके.” वे इस बात का हंसी उड़ाती हैं कि राज्य में एनपीपी का कोई आधार है: ''भार्गव खुद चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे हैं?” उधर भार्गव का कहना है कि वे चुनाव इसलिए नहीं लड़ रहे ताकि संगठन मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर सकें जो कि अभी शुरुआती अवस्था में ही है.

मीणा की तरह भार्गव भी पूरी तरह राजे के खिलाफ हैं. बीजेपी के उनके अनुभवों का फायदा मीणा को मिल रहा है. जयपुर में पिछले महीने हुई एक सफल रैली के आयोजन में भार्गव की महत्वपूर्ण भूमिका थी. रैली में जबरदस्त भीड़ आई थी.

सवाल उठता है कि विधानसभा चुनाव में किरोड़ी लाल क्या गुल खिला पाएंगे? उम्मीद के विपरीत उन्होंने बहुत ज्यादा बागियों को टिकट नहीं दिया है. हो सकता है कि ज्यादातर बागियों ने उनसे संपर्क ही न किया हो.

इसलिए 40 से 50 सीट जीतने के उनके दावे पर भरोसा कर पाना कठिन है, लेकिन लगभग दो दर्जन सीटों पर उनका असर जरूर होगा और उनमें से कुछ पर उन्हें जीत मिल सकती है. राजस्थान चुनाव के वे 'सरप्राइज एलिमेंट’ हैं.

उनका कहना है कि उन्हें मिलने वाला अस्सी फीसदी वोट ऐसा होगा जो बीजेपी के खाते में जा सकता था और इसी वजह से इस बार विधानसभा त्रिशंकु होगी. वे दो उदाहरण देते हैं. पहला, उनके संगठन को मजबूती बीजेपी के पूर्व कार्यकर्ताओं से ही मिल रही है. दूसरा, उनको उम्मीद है कि एंटी इनकम्बेंसी की वजह से कांग्रेस विरोधी जो वोट बीजेपी को मिलते, वे अब उन्हें मिलेंगे.

बीजेपी यदि वसुंधरा और मोदी की लहर नहीं पैदा कर पाती है तो वे इसकी उम्मीद कर सकते हैं. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में भी मोदी की लोकप्रियता बढ़ रही है और बीजेपी को इसको ज्यादा से ज्यादा भुनाने की रणनीति में जुटी है.

किरोड़ी लाल ऐसे नेता हैं जिनकी बड़ी डिमांड रहती है, बीजेपी के नेताओं से लेकर रामदेव और आचार्य धमेंद्र जैसे धर्मगुरु उनसे बात करते रहते हैं. वे कहते हैं कि वे दोनों में से किसी भी पार्टी से हाथ नहीं मिलाना चाहेंगे, लेकिन उनका दिमाग वसुंधरा के प्रति नफरत से भरा हुआ है. लेकिन कांग्रेस भी उन्हें लेकर आश्वस्त नहीं है.
 
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में किरोड़ी की कीमत करोड़ों से भी ज्यादा हो जाएगी और वे अरबों के आदमी हो सकते हैं. तब पॉपकॉर्न के अलावा उन्हें केक भी खाने को मिलेगा.

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