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राजस्थान में अब वसुंधरा राजे की बारी

गहलोत की 5,000 करोड़ रु. की रेवडिय़ों के बावजूद राजस्थान में वसुंधरा वापसी की डगर पर हैं लेकिन अशोक गहलोत अब भी सबसे लोकप्रिय.

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रोहित परिहारराजस्थान, 03 December 2013
राजस्थान में अब वसुंधरा राजे की बारी

बात 5 नवंबर की है, जब राजस्थान बीजेपी की अध्यक्ष वसुंधरा राजे नई दिल्ली के लेखा विहार स्थित अपने आवास पर थोड़ी देर से पहुंचीं. उस समय वे आत्मविश्वास से लबरेज नजर आ रही थीं. पार्टी की चुनाव अभियान समिति ने राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए 200 में से 176 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी थी. अगले कुछ घंटों तक वे पार्टी कार्यकर्ताओं को एक ही संदेश देती रहीं, ‘‘पथभ्रष्ट कांग्रेस सरकार के कल्याणकारी योजनाओं से संबंधित दावों की धज्जियां उड़ा डालिए.’’ धौलपुर की पूर्व महारानी 60 वर्षीया राजे वापसी की डगर पर हैं. इंडिया टुडे  ग्रुप-ओआरजी सर्वेक्षण में बीजेपी को 105 और कांग्रेस को 76 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है.

बीजेपी की इस संभावित लहर की वजह यह है कि राजे गहलोत पर हमला बोलने के लिए सही मुद्दों को उठाती रही हैं. 26 अक्तूबर को अपने 31,000 फॉलोअर्स को उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘राजस्थान की कांग्रेस सरकार न सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा करने में नाकाम रही है बल्कि महिलाओं के खिलाफ अपराध में भी शामिल रही है.’’ अपने चुनावी भाषणों में वे श्श्चेन छीनने्य्य की बढ़ती घटनाओं समेत प्रदेश में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को अपने निशाने पर रखती हैं. 25 अक्तूबर को उदयपुर की रैली में नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे का जिक्र किया, ‘‘क्या कोई महिला इस प्रदेश के मंत्रियों से मुलाकात करने की हिम्मत कर सकती है?’’ उनका इशारा महिलाओं के शोषण के आरोप में बर्खास्त किए गए प्रदेश के तीन मंत्रियों की ओर था. जनमत सर्वेक्षण से पता चलता है कि 41 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध को गहलोत सरकार की सबसे बड़ी नाकामी माना.

मुख्यमंत्री ने पांच साल के अपने कार्यकाल का ज्यादातर समय अपने से पहले के मुख्यमंत्रियों पर निशाना साधते हुए बिता दिया. पहले दो साल तो राजे के शुरू किए गए प्रोजेक्ट्स को ढहाने के लिए ही समर्पित रहे जिनमें जयपुर के लिए मास रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम और महिलाओं के लिए भारत की पहली डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम जैसे प्रोजेक्ट भी शामिल थे. फिर उन्होंने जयपुर मेट्रो जैसे अपने खुद के कुछ प्रोजेक्ट्स इस मंशा से शुरू किए कि चुनाव से पहले उन्हें पूरा कर लिया जाएगा. सितंबर तक वे महज बाड़मेर में राज्य की वित्त पोषित एक रिफाइनरी के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी ही हासिल कर पाए. फिर भी, गहलोत कहते हैं, ‘‘हमने बेहतर प्रदर्शन किया है. मैं जनमत सर्वेक्षणों पर भरोसा नहीं करता.’’

अपना बेड़ा पार लगाने के लिए गहलोत ने आखिरी क्षणों में लोकलुभावन योजनाओं के माध्यम से 5,000 करोड़ रु. लुटाने का दांव खेला है. राजे इसके प्रभावों को लेकर सतर्क हैं. इन योजनाओं पर जनभावना की थाह पाने के लिए पिछले तीन महीनों से लैपटॉप से लैस 30 स्वयंसेवक पार्टी कार्यालय और जयपुर स्थित उनके आवास पर आने वाले आगंतुकों के साथ बातचीत करते रहे हैं. टीम ने प्रदेश के 45,000 मतदान केंद्रों से 10-10 कार्यकर्ताओं को विभिन्न मुद्दों पर उनकी राय जानने के लिए चुना है. प्रदेशभर के 1,000 स्वयंसेवक सरकारी नीतियों के असर से जुड़े सवालों पर साप्ताहिक प्रतिक्रिया भेजते हैं. राजे व्यक्तिगत रूप से इन रिपोर्टों को पढ़ती हैं, सरकार की नाकामियों की फाइल रखती हैं और उनमें से खास-खास का जिक्र अपने भाषणों में करती हैं. गहलोत के लोकलुभावनवाद के खोखलेपन को बेनकाब करने की रणनीति कामयाब रही है. सर्वेक्षण के अनुसार 53 फीसदी उत्तरदाता मुख्यमंत्री के लोकलुभावन उपायों से अप्रभावित रहे. राजे कहती हैं, ‘‘साढ़े चार साल तक नजरअंदाज किए जाने के बाद राजस्थान की जनता आखिरी समय के इस लालच में नहीं पड़ेगी.’’ गहलोत के लिए और भी अधिक मनहूस बात यह है कि सिर्फ 37 प्रतिशत उत्तरदाता ही इस सरकार को दोबारा चलते देखना चाहते हैं जबकि 55 फीसदी उत्तरदाता सरकार में बदलाव चाहते हैं.
जयपुर की रैली में अशोक गहलोत
बीजेपी के चुनाव अभियान का खाका राजे ने दो साल पहले राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ मिलकर बनाया था. उन्होंने गहलोत से जुड़े भ्रष्टाचार और पक्षपात के मामलों का पर्दाफाश करने की जिम्मेदारी बीजेपी राष्ट्रीय सचिव और सांसद किरीट सोमैया को सौंप दी थी.

इस साल अप्रैल में सुराज संकल्प यात्रा की शुरुआत के बाद राजे ने बीजेपी प्रत्याशियों के जीतने की संभावना पर दो प्रोफेशनल एजेंसियों से सर्वे करवाया था. उन्होंने आरएसएस को इसके नतीजों से रू-ब-रू कराया. आरएसएस समर्थित अपने करीबी गुलाब चंद कटारिया से वसुंधरा ने कहा, ‘‘पहले मुझे जिताऊ उम्मीदवार दीजिए, टिकाऊ बाद में दीजिएगा.’’   

राजस्थान बीजेपी का वार रूम गुजरात के आरएसएस और पार्टी नेताओं से भरा हुआ है. पार्टी की राज्य इकाई के प्रभारी कप्तान सिंह सोलंकी के अतिरिक्त चोटी के छह आरएसएस नेताओं को प्रदेश बीजेपी की मदद करने के लिए एक-एक संभागीय मुख्यालय आवंटित किया गया है. हालांकि आरएसएस परदे के पीछे ही रहकर काम कर रहा है ताकि राजे को 2011 के गोपालगढ़ दंगों में कथित तौर पर पुलिस फायरिंग और आगजनी में 10 मेवातियों की जान जाने की घटना के मद्देनजर अल्पसंख्यकों में पल रही गहलोत विरोधी भावना को भुनाने का मौका मिल सके.

एक ऐसे प्रदेश में जहां जाति निर्णायक भूमिका निभाती हो, पूर्व बीजेपी नेता और अब निर्दलीय विधायक किरोड़ीलाल मीणा खेल बिगाडऩे वाले साबित हो सकते हैं. पी.ए. संगमा की नेशनल पीपल्स पार्टी से हाथ मिलाने वाले अनुसूचित जनजाति के इस नेता को जनमत सर्वेक्षण में 17 प्रतिशत वोट मिले हैं, जो प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के 13.5 प्रतिशत वोटों से अधिक है. इस तरह नामांकन वापस लेने की तिथि 16 नवंबर से पहले बागियों से पार पाना ही प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशियों के भाग्य की कुंजी होगी.

बीजेपी की रैलियों में नया नारा है, ‘‘पीएम, सीएम.’’ यानी प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की पसंद का समर्थन. राजे जनमत सर्वेक्षणों को बहुत अहमियत नहीं देतीं. वे कहती हैं, ‘‘अभी बहुत काम करना है.’’ अगर लहर आपके पक्ष में हो, जनमत सर्वेक्षण आपकी बात करें तो यह कहना और भी आसान हो जाता है.

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