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जनमत सर्वेक्षण: कांग्रेस पर भारी केसरिया बिरादरी

बीजेपी को विधानसभा चुनावों में चार राज्यों में जनाधार वाले क्षेत्रीय नेताओं का लाभ मिलता दिख रहा है जबकि कांग्रेस के लिए हाड़तोड़ ठंड इंतजार कर रही है. बीजेपी के केंद्र में भले ही नेताओं के बीच मारकाट दिखी हो मगर उसके क्षत्रपों ने अपना गढ़ बचाए रखने के लिए अथक परिश्रम किया है. कांग्रेस में ऐसा कुछ नहीं दिखा.

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एस. प्रसन्नराजननई दिल्ली, 03 December 2013
जनमत सर्वेक्षण: कांग्रेस पर भारी केसरिया बिरादरी

सबसे बुरे दौर में कांग्रेस के लिए राज्यों से बुरी खबर आ रही है. ऐसे वर्ष में जब आधुनिक भारत के स्वप्नदर्शी माने जाने वाले प्रधानमंत्री की कलई खुल रही है और वे देश तथा अपनी पार्टी के लिए भारी बोझ साबित हो रहे हैं, कांग्रेस को किसी चमत्कार की बेहद जरूरत है. हार उसके सामने मुंह बाये खड़ी है. दिसंबर में जनादेश सुनाने वाले चार राज्यों में इंडिया टुडे समूह-ओआरजी जनमत सर्वेक्षण के नतीजे बड़े पैमाने पर बीजेपी के नए उभार की गवाही देते हैं, वह दो राज्यों में सत्ता बरकरार रखती और दो में सत्ता हथियाती नजर आ रही है. एक ओर जहां मोदी लहर के आवेग से भगवा जनाधार में नई ऊर्जा आ गई है, वहीं राज्यों में क्षत्रपों के बेहतर प्रदर्शन ने भी देश की सत्ता के लिए ‘‘करो या मरो’’ वाली लड़ाई में बीजेपी को अतिरिक्त बढ़त दे दी है. दशक भर की पराजय और मोहभंग के बाद 2014 में खुशनुमा गर्मियों का इंतजार कर रही इस दक्षिणपंथी पार्टी के लिए यह ठंड स्फूर्तिदायक हो सकती है. वहीं कांग्रेस को यह हाड़तोड़ ठंड और कमजोर कर सकती है.

नरेंद्र मोदी ने भले माहौल बनाया हो मगर बीजेपी को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली (इस जनमत सर्वेक्षण में मिजोरम शामिल नहीं है) में बेहतर नेतृत्व का लाभ मिल रहा है. भगवा परिवार में बगैर शोर-शराबे से प्रदर्शन करने वाले दो मुख्यमंत्री हैटट्रिक बनाने की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि दम-खम वाली रानी इस बार अपने जमीनी तेवर से वापसी की राह पर हैं वहीं चुपचाप रहकर काम करने वाले डॉक्टर साहब राजधानी में मुख्यमंत्री पद की त्रिकोणीय लड़ाई में जीत का नुस्खा तैयार कर रहे हैं. ये चारों बीजेपी के लिए जमीनी राजनीति की ताकत और सुशासन के सुफल का अनोखा मेल साबित हो रहे हैं. पराजय झेलने की संभावना वालों की कथा भी वही पुरानी साख गंवा बैठना और लंबे समय से सत्ता में रहने की ऊब (सत्ता विरोधी लहर) का शिकार होना है, और बेशक, वे पतन के दौर में मनमोहन के कांग्रेस नेता होने का दंश भी झेल रहे हैं.



जैसा नतीजों से पता चलता है कि यह जनमत सर्वेक्षण कुर्सी पर बैठे और उन्हें चुनौती देने वालों के बारे में रायशुमारी है. हर राज्य अपने तरीके से बदलाव के लिए वोट देगा, लेकिन इसका मतलब जरूरी नहीं कि कुर्सी पर बैठा शख्स बदले, जैसा कि मध्य प्रदेश और पड़ोसी छत्तीसगढ़ का मामला है. मध्य प्रदेश में करीब 60 प्रतिशत लोग शिवराज सिंह चौहान को फिर गद्दी पर देखना चाहते हैं. चौहान 2005 में बाबूलाल गौर की जगह मुख्यमंत्री बने थे. 2004 के भारी फेरबदल वाले विधानसभा चुनावों में उमा भारती ने कांग्रेस का गढ़ भेद कर भोपाल के शामला हिल्स पर भगवा ध्वज लहराया था. उस साल मध्य प्रदेश की तेजतर्रार संन्यासिनी और राजस्थान में अजेय रानी ने संघ परिवार को अतिरिक्त ऑक्सीजन मुहैया कराई थी. लेकिन भारती की तेजी जनादेश को संभाल कर रखने के आड़े आ गई और उनके उत्तराधिकारी बाबूलाल गौर बेहद सुस्त साबित हुए. आखिर शिवराज सिंह चौहान ने जनाधार को व्यापक किया.

खांटी संघ परिवारी चौहान कभी हिंदू संस्कृति की याद दिलाना नहीं भूलते. उनके पास हिंदुत्व का झंडाबरदार बनने की काबिलियत और साख दोनों थी. उन्होंने बड़ी जल्दी यह जान लिया कि गोपूजा (उन्होंने गोवध पर पाबंदी लगाई) और सूर्य-नमस्कार (जिसे स्कूलों में अनिवार्य किया) से ही वे 21वीं सदी के बाजार मूल्य वाले नेता नहीं बन पाएंगे. चौहान की कृषि और बिजली क्षेत्र में उपलब्धियां बेमिसाल हैं, पर उन्होंने विकास की राजनीति में सामाजिक पूंजी के महत्व को भी बड़ी चतुराई से समझ लिया है. आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. 18 वर्ष से 40 वर्ष आयु वर्ग के 60 प्रतिशत से ज्यादा मतदाता उन्हें फिर गद्दी पर देखना चाहते हैं और कॉलेज-शिक्षितों के तो 65 प्रतिशत की वे पसंद हैं. मतदाताओं के इस वर्ग की पसंद गायों के रक्षक चौहान नहीं, बल्कि आधुनिकता के पैरोकार चौहान हैं. हालांकि वे आज भी जमीनी नेता हैं, उनके व्यक्तित्व में कोई तड़क-भड़क नहीं बल्कि सादगी है, उनकी अपील खांटी देसी है.

आज बीजेपी को ऐसे ही जनाधार वाले स्थानीय नेताओं से बढ़त मिल रही है. ऐसे दूसरे नेता छत्तीसगढ़ के रमन सिंह हैं जो टिकाऊ और भरोसेमंद माने जाते हैं. उन्हें देश के संभवतः सर्वाधिक जोखिम वाले राज्य में 52 प्रतिशत लोग तीसरा कार्यकाल देना चाहते हैं, जहां माओवादी देश की आंतरिक सुरक्षा पर भ्रम की स्थिति का लाभ उठाकर खूनी खेल रहे हैं. और शायद यही कारण है कि मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ ऊंचा होते हुए भी 58 प्रतिशत लोग माओवाद से निपटने में सरकार के तरीकों का समर्थन नहीं करते. प्रशासन में रमन प्रभाव उनके एक रुपए किलो चावल जैसी योजनाओं को सबसे गरीब तबकों को मुहैया कराने में दिखता है, जो खाद्य सुरक्षा का उनका विकल्प है. छत्तीसगढ़ के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री रमन सिंह अब भी पूरे दम-खम के साथ काम कर रहे हैं.

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वापसी के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है. उन्होंने लोकलुभावन कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी है लेकिन उनकी योजानाएं रानी की वापसी में शायद ही आड़े आएः वहां 52 प्रतिशत लोग बदलाव चाहते हैं. गहलोत ने महज पांच साल में राजस्थान को ऐसे राज्य में तब्दील कर दिया है, जहां 45 प्रतिशत लोग सरकार की सबसे बड़ी नाकामी महिलाओं के प्रति अपराध दर का बढऩा मानते हैं. गहलोत की गरीबों को साड़ी देने की योजना शायद ही इस धारणा को बदल पाए. रानी ने काफी जमीन तैयार कर ली है. 2004 में वसुंधरा राजे ने रेगिस्तानी अंधड़ की तरह 120 सीटों के साथ भारी जीत दर्ज की थी. 2014 में उनकी वापसी की मुहिम भी 2004 का वह खुशनुमा दौर वापस पाने और 2008 के अपमान का बदला लेने की लड़ाई है. उन्होंने अपराजेय नेताओं की पांत में खड़ा होने का मौका गंवा दिया था, जो हैसियत फिलहाल मोदी, चौहान और रमन हासिल कर चुके हैं. जनमत सर्वेक्षण बताता है कि रानी दूसरी शुरुआत करने के कगार पर खड़ी हैं.

सर्वेक्षण के नतीजे कांग्रेस की सबसे टिकाऊ मुख्यमंत्री को चौथा कार्यकाल नहीं देते हैं. दिल्ली की त्रिकोणात्मक लड़ाई में अब भी शीला दीक्षित को ही जीतना या हारना है, लेकिन अचानक अरविंद केजरीवाल के मैदान में आ जाने से नजारा और फिजा दोनों बदल गई है. बीजेपी भी जाति विशेष और क्षेत्र विशेष के घिस-पिट चुके नेताओं से परे निकल कर एक तरोताजा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार डॉ. हर्षवर्धन को लेकर आगे आई है.

जनतम सर्वेक्षण के नतीजे बीजेपी को 46 सीटें, कांग्रेस को 22 और आम आदमी पार्टी को 8 सीटें देते हैं लेकिन शीला ही अब भी दिल्लीवालों के लिए आदर्श मुख्यमंत्री की पसंद बनी हुई हैं. वे अब भी शहर की सहायता करने वाली अम्मी हैं. वक्त कुछ और होता तो वे कांग्रेस की मोदी हो सकती थीं, लेकिन वे मनमोहन के दौर में हैं और इस दौर में होने का खामियाजा भुगत रही हैं, और साथ ही कुछ हद तक शीला को लगातार देखने से पैदा हुई ऊब भी एक वजह है. यह दौर किसी कांग्रेस नेता के लिए अच्छा नहीं है और जैसा कि लगातार कई जनमत सर्वेक्षणों से जाहिर हो रहा है, मोदी की राष्ट्रव्यापी अपील ने भगवा बिरादरी को विधानसभा चुनावों में अतिरिक्त बढ़त दिला दी है.
नरेंद्र मोदी
आज भारतीय राजनीति में मोदी उस सच्चाई के प्रतीक हैं कि सत्ता केंद्र से प्रांतों की ओर जा रही है. नरेंद्र मोदी का मिथक गुजरात के बेहतरीन प्रशासन वाले राज्य होने के रिकॉर्ड से बना है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में गुजरात के अलग-अलग रूप दिख रहे हैं. बीजेपी के केंद्र में भले नेताओं के बीच मारकाट दिखी हो मगर उसके क्षत्रपों ने अपना गढ़ बचाए रखने के लिए अथक परिश्रम किया है. कांग्रेस में ऐसा कुछ नहीं दिखा. केंद्र कमजोर है और राज्य के नेता उससे भी तंगहाल.

इन चार राज्यों में लोकसभा की 72 सीटें हैं. सो, 2014 की गर्मियों में इन राज्यों से निकले महारथी देश की गद्दी की लड़ाई में मोदी के सिपहसालार बनेंगे. राहुल गांधी की जवाबी कार्रवाइयां निपट अकेली पड़ जाएंगी. ऐसे दौर में जब घबराई सरकार जनमत सर्वेक्षणों पर पाबंदी लगाने की योजना बना रही है, चुनाव विज्ञान का बहु-विवादित शास्त्र उस सचाई की ओर इशारा कर रहा है कि देश उस पार्टी को माफ करने के मूड में नहीं है जिसने उसे नीचा दिखाया, और वह भगवा रंग में रंगने को तैयार है.

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