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शांत और अनूठे हैं मिजोरम में चुनाव

मुख्यमंत्री ललथनहवला पांचवीं बार गद्दी संभालने के लिए राज्य में हर आम और खास को थमा रहे हैं चेहरे पर मुस्कान लाने वाले तोहफे.

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कौशिक डेकानई दिल्ली, 03 December 2013
 शांत और अनूठे हैं मिजोरम में चुनाव

ललथनहवला अपने क्षेत्र आदिवासी नगर सेरछिप में चुनाव प्रचार में व्यस्त थे कि अचानक उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का फोन मिला. मिजोरम के मुख्यमंत्री ललथनहवला ने वहां अपना पूरा कार्यक्रम रद्द किया और समुद्र से 3,715 फुट ऊंचाई पर दो नदियों के दोआब में बसी राजधानी आइजाल लौट आए. उन्हें 50 किमी का पहाड़ी रास्ता तय करने में तीन घंटे लगे.

अगले दिन 10 नवंबर को चार बार से मुख्यमंत्री अपने सरकारी बंगले पर सोनिया के दूत का इंतजार कर रहे थे. अपनी मेज पर राहुल और प्रियंका गांधी की दो तस्वीरों को देखकर 71 वर्षीय कांग्रेस दिग्गज पुरानी यादों में खो जाते हैं, ''1985 में दिल्ली में मेरा ऑपरेशन हुआ था. राजीव गांधी मुझे देखने आए.

उन्होंने मेरे बेटे जौवा से जन्मतिथि के बारे में पूछा. मेरे बेटे का जवाब सुनकर वे खुशी से उछल पड़े और उसे अपने घर ले गए. उन्होंने जौवा को राहुल से मिलवाया. राहुल की जन्मतिथि भी वही है. तब से दोनों पक्के दोस्त बन गए.”

जौवा की 2001 में मौत हो गई लेकिन उनके दोस्त राहुल 21 नवंबर को मिजोरम दौरे पर जा रहे हैं. इस बार पारिवारिक मित्र की तरह नहीं, बल्कि अच्छे चुनाव नतीजों के लिए बेसब्र नेता के रूप में. जनमत सर्वेक्षणों को सही मानें तो चार विधानसभाओं के चुनाव में बीजेपी की जीत की संभावना भारी है, अगर सचमुच ऐसा हुआ तो यही एकमात्र पूर्वोत्तर राज्य कांग्रेस की कुछ हद तक नाक बचा सकता है.

ललथनहवला को पूरा यकीन है कि 25 नवंबर के चुनाव में राज्य कांगे्रस को निराश नहीं करेगा. वे कहते हैं, ''हम इस बार उन सीटों को भी जीतेंगे, जहां पिछली बार हार गए थे.” कांग्रेस 2008 में 40 में से 32 सीटें जीती थी.

हर किसी के लिए तोहफा
राज्य के मुख्यमंत्री का यह पक्का भरोसा राज्य की फ्लैगशिप नई भू-उपयोग नीति (एनएलयूपी) के कारण है. यह नीति किसानों को झूम खेती छोडऩे को प्रोत्साहित करने के लिए 2011 में लाई गई. इसके तहत किसानों को कृषि प्रशिक्षण और सालभर में 1 लाख रु. वित्तीय सहायता दी जाती है.

राज्य में कृषि-भूमि कुल जमीन का महज 20 प्रतिशत है और कुल 10 लाख की आबादी में 60 प्रतिशत कृषि पर निर्भर है. मिजोरम विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर अयंगबाम श्यामकिशोर कहते हैं, ''यह नीति काफी लोकप्रिय साबित हुई और अब सरकार ने इसे आठ दूसरे विभागों में भी शुरू कर दिया है.

आज कोई कारीगर भी प्रशिक्षण और वित्तीय मदद पा सकता है.” योजना आयोग अब तक एनएलयूपी के लिए 838.82 करोड़ रु. जारी कर चुका है.

ललथनहवला के पास 35 वर्ष से कम उम्र के वोटरों के लिए भी तोहफे हैं. मसलन, तीन एस्ट्रोटर्फ फुटबॉल मैदान, तीन एस्ट्रोटर्फ हॉकी मैदान और दो फ्लडलाइट वाले खेल के मैदान. यह उस राज्य में वाकई अनोखा उपहार है जहां लॉयनल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर्स को देवता की तरह पूजा जाता है.

यहां सचिन तेंडुलकर का आखिरी टेस्ट कोई मायने नहीं रखता लेकिन 10 नवंबर को मैनचेस्टर यूनाइटेड बनाम आर्सेनल प्रीमियर के लीग मैच की धूम थी. हालांकि यहां मनोरंजन फुटबॉल और टीवी तक ही सीमित है. राज्य में कोई सिनेमाघर नहीं है.

तफरीह करने की सिर्फ एक ही जगह मिलेनियम सेंटर नामक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है जहां ज्यादातर म्यांमार और चीन से तस्करी के जरिए आया सामान बिकता है. मुख्यमंत्री कहते हैं, ''मेरी बहू रोजी पारिवारिक जमीन पर मल्टीप्लेक्स और ऑडिटोरियम बनाने की योजना बना रही हैं.”
चर्च की कड़ी निगरानी की वजह से मिजोरम में बेरंग है चुनावी माहौल
घोटालों से मुक्त
केंद्र और दूसरे कई राज्यों के विपरीत ललथनहवला घोटालों से मुक्त प्रशासन मुहैया कराने के लिए गर्व महसूस कर सकते हैं. मिजोरम की चर्चों की सर्वोच्च निर्णायक संस्था साइनॉड ऑफिस के सुपरिंटेंडेंट रॉबर्ट एस. हालीडे कहते हैं, ''इसकी वजह यह है कि पारंपरिक रूप से हमारा इस तरह पालन-पोषण किया जाता है जिसमें हमें नैतिक और अनुशासित जीवन का महत्व सिखाया जाता है.”

भ्रष्टाचार कम होने की दूसरी वजह चर्च और सिविल सोसाइटी समूहों का समाज में व्यापक असर है. मसलन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निगरानी सबसे प्रभावी सिविल सोसाइटी गुट यंग मिजो एसोसिएशन करता है.

आइजोल की सड़कों पर पान खाने वाले पुरुषों से अधिक शर्ट-पैंट में कामकाजी महिलाएं दिखती हैं. यह सब वोटों की राजनीति से कुछ अलग नजर आता है. 11 नवंबर को आइजोल उत्तर-3 क्षेत्र के तहत ईडेनथर गांव के बाशिंदे शाम 7 बजे स्थानीय कम्युनिटी हॉल में जुटते हैं.

15 मिनटों में पूरा हॉल भर गया. 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं रंगबिरंगे मिजो सारोंग परिधान में अगली कतार में बैठती हैं. चार पुरुष जल्दी ही पहुंचते हैं. वे हाथ मिलाते हैं और सवालों का जवाब देने को तैयार हो जाते हैं. ये सभी इस विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं.

इनमें एक मुख्यमंत्री के भाई लल थंजारा हैं. प्रार्थना के साथ एक आदमी सभा की शुरुआत करता है. फिर, चारों उम्मीदवार सभा को संबोधित करते हैं. उसके सवालों का दौर शुरू होता है और बहस चलती है. चाय बंटती है और रात 9.30 बजे हर कोई खुशी-खुशी घर चल देता है.

यह साइनॉड नियंत्रित एनजीओ मिजोरम पीपुल्स फोरम की एक सभा थी. यह एनजीओ चुनाव प्रचार की निगरानी कर रहा है. फोरम ने राजनैतिक पार्टियों के लिए 27 नियम बनाए हैं. कोई उम्मीदवार उसकी मंजूरी के बिना सभा नहीं कर सकता.

अलग-अलग सभाओं के बदले वह संयुक्त सभाएं आयोजित करता है जिसमें क्षेत्र के सभी उम्मीदवारों के साथ टीवी शो की ही तरह बहस की जाती है. उम्मीदवारों को घर-घर जाकर प्रचार करने की भी इजाजत नहीं है.

इन पाबंदियों ने यहां के चुनाव को देश के दूसरे हिस्सों की तरह तमाशों से बेरंग जरूर कर दिया है. आइजोल की सड़कों पर बमुश्किल दो दर्जन चुनावी पोस्टर दिखते हैं. सड़कों पर पुलिस नजर नहीं आती. 9-13 नवंबर के बीच इंडिया टुडे को शहर के 25 किलोमीटर के दायरे में एक भी राजनैतिक सभा नहीं दिखी.

राजनैतिक मुद्दों के अभाव में विपह्नी पार्टियां—मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ), मिजोरम पीपल्स कॉन्फ्रेंस (एमपीसी) और जोराम नेशनलिस्ट पार्टी (जेडएनपी)—भूमि नीति से ज्यादा कोई प्रभावी मुद्दा खोज ही नहीं पा रही हैं. एमएनएफ ने इसी उतावली में पक्के ईसाई ललथनहवला पर कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान तिलक लगाने का आरोप लगाया.

लेकिन वे ऐसे आरोपों से पहले भी उबरते रहे हैं. उन्होंने 24 जनवरी को मिजोरम में तुइवाल पुल और पिछले साल नई दिल्ली में मिजोरम हाउस के उद्घाटनों के दौरान नारियल फोडऩे और हिंदू धर्म धारण करने का आरोप झेलना पड़ा था.

विकास का एजेंडा
एमएनएफ के प्रमुख 69 वर्षीय जोरामथंगा धर्म के मुद्दे छोड़कर विकास की भाषा बोलने लगे हैं. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''अगर सत्ता में आया तो मैं राज्य को अगले 10 साल में चावल, बांस और रबर के उत्पादन के जरिए आत्मनिर्भर बना दूंगा. एनएलयूपी तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पैसा पहुंचाने का जरिया भर है.”

पूर्व मुख्यमंत्री 2008 में 423 वोटों से हार गए थे. एक इंजीनियर वनलाल दुहसका कहते हैं, ''अगर 2008 में एमपीसी और एमएनएफ के वोट प्रतिशत को जोड़ें तो मिल-जुलकर वे काफी ताकतवर दिखते हैं. लेकिन विपक्षी पार्टियां मौजूदा सरकार के खिलाफ कोई हवा ही नहीं बना पाईं.”

उनका मानना है कि ललथनहवला के मुकाबले जोरामथंगा ज्यादा सक्रिय और तीखे तेवरों वाले नेता हैं. आइजोल में कॉल सेंटर चलाने वाले जोरामथंगा के उद्यमी बेटे एंडी सरकार से बेतरह निराश हैं. वे कहते हैं, ''सरकार ने एनएलयूपी का पैसा बांटने के अलावा कुछ नहीं किया. रोजगार सृजन कहां किया गया? मिजोरम में एक भी निजी क्षेत्र की ऐसी इकाई नहीं है जिसमें 100 लोगों को रोजगार मिल रहा हो. हम खैरात पर कितने दिन जिएंगे?”

लेकिन होटल मैनेजमेंट की 21 वर्षीय छात्रा वनलरुहाई की जोरामथंगा के 10 साल के विकास के एजेंडे में कोई दिलचस्पी नहीं है. उनको जेडएनपी के नेता ललदुहवमा से उम्मीद है. 64 वर्षीय पूर्व आइपीएस अधिकारी पहले इंदिरा गांधी और फिर दिल्ली प्रवास के दौरान आंग सान सू की के सुरक्षा अधिकारी रह चुके हैं.

वे मुख्यमंत्री पद के लिए युवाओं की पहली पसंद हैं. स्थानीय स्तर के कई चुनाव सर्वेक्षणों में उन्हें ललथनहवला और जोरामथंगा से काफी ज्यादा मत मिले हैं. वनलरुहाई कहती हैं, ''वे हमारी उम्मीदों और आकांक्षाओं की बात करते हैं. वे दूसरे नेताओं से अलग हैं.” पर राजनैतिक टिप्पणीकार उनकी पार्टी को पांच से ज्यादा सीटें नहीं देते.
आइजोल के गवर्नमेंट हरंगबाना कॉलेज के छात्र और युवा वोटर
राजनीति के प्रति उदासीनता
युवाओं में असंतोष तो भारी है लेकिन शायद पुरानी समाज व्यवस्था की वजह से ही वे राजनीति के प्रति उदासीन रहते हैं. राहुल गांधी की युवा कांग्रेस से सिर्फ दो उम्मीदवार ही 40 वर्ष से कम उम्र के हैं. कांग्रेस, एमएनएफ और एमपीसी की युवा शाखाओं के अध्यक्षों को टिकट नहीं मिला लेकिन नामांकन से पहले वे सभी टिकटों की दौड़ में आगे थे.

मिजोरम युवक कांग्रेस की अध्यक्ष 32 वर्षीया ललवमपुई कहती हैं, ''राजस्व मंत्री जे.एच. रोथौमा 78 वर्ष के हैं और यह उनका आखिरी चुनाव है, इसलिए मैं हट गई.” डेनिम जींस धारी ये महिला नेता टिकट पातीं तो 142 उम्मीदवरों में पांचवीं महिला होतीं. 1972 से सिर्फ तीन महिला नेता ही विधानसभा के लिए चुनी गई हैं.

हालांकि यहां महिला वोटरों की संख्या पुरुषों से ज्यादा है. यहां वोटर लिस्ट के मुताबिक कुल 6,86,305 वोटरों में 3,49,506 महिला और 3,36,799 पुरुष वोटर हैं. ललवमपुई कहती हैं, ''ऐसी बात नहीं है कि पार्टियां महिलाओं को टिकट देने को तैयार नहीं हैं. महिलाएं आगे तो आएं.”

ललथनहवला महिलाओं या कहें कि कम-से-कम एक महिला की ताकत को तो समझ्ते हैं. 11 नवंबर को सुबह 7 बजे वे आइजोल से सेरछिप के लिए निकलते हैं लेकिन उन्हें रात को 'मैडम के दूत से मिलने’ लौट आना है. उन्हें गांधी परिवार से संबंधों का लाभ जितना मिला है, उसके मुकाबले तो यह छोटा-सा त्याग है.

मिजो लोग अभी भी मिजो समझौते के लिए राजीव गांधी को सम्मान से याद करते हैं, जिससे लुशाई पहाडिय़ों में स्थायी शांति लौटी. इसी वजह से मुख्यमंत्री के ड्राइंग रूम में पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के मिजोरम दौरे पर एक कॉफी टेबल बुक पड़ी है और शीर्षक भी असरदार  है: लेस्ट वी फॉरगेट (सनद रहे).

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