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एजेंडा आज तक: महिलाओं की दशा पर सुषमा, शीला और वृंदा ने की बातचीत

'राजनीति में महिलाएं' और 'महिलाओं की राजनीति' पर एक अर्थपूर्ण चर्चा के साथ एजेंडा आज तक-2013 गुरुवार को संपन्न हो गया. देश की तीन बड़ी महिला नेताओं, दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित, लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज और पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात ने मौजूदा दौर में महिलाओं की दशा और सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी पर चर्चा की.

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aajtak.in
सौरभ द्विवेदी [Edited by: कुलदीप मिश्र]नई दिल्ली, 06 December 2013
एजेंडा आज तक: महिलाओं की दशा पर सुषमा, शीला और वृंदा ने की बातचीत एजेंडा आज तक में कुछ यूं मिलीं सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित

क्या महिलाओं की जो स्थिति घर में है, वही संसद में है?
शीला: इच्छा की कमी है. अब पढ़ाई या कामकाज में उतना भेदभाव नहीं रहा. हमने नगर पालिका में महिलाओँ को 50 फीसदी आरक्षण दिया. इस पर बहुत बहस हुई, पर हमने कदम उठा लिया. तब लगता था कि इतनी महिलाएं मिलेंगी भी या नहीं. कर पाएंगी या नहीं. हमारा तजुर्बा ये रहा कि उन्होंने कई जगह मर्दों से भी बेहतर काम किया है. तो मुझे लगता है कि महिला आरक्षण बस कदम उठाने की देर है. साहस होना चाहिए.और ये साहस महिलाओँ में हैं, पुरुषों में नहीं है.

सुषमा: बीजेपी के पुरुष मुख्यमंत्रियों ने भी ये साहस दिखाया. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल और उत्तराखंड में बीजेपी की सरकारों ने 50 फीसदी आरक्षण दिया पंचायतों में. मगर संसद या विधानसभा में सब नदारद है.

क्या संसद या विधानसभा के अंदर पुरुषों की सत्ता या मानसिकता आरक्षण विधेयक को इसलिए रोकती है कि अगर महिलाएं आ गईं तो राजनीति की धारा बदल जाएगी?
वृंदा करात: समाज में जो भेदभाव है, वह राजनीति में भी दिखता है. संविधान बराबरी की बात करता है, मगर हर जगह पुरुष प्रधानता दिखती है. आज औरतें उसके खिलाफ उठ रही हैं.नई पीढ़ी की लड़कियां इन स्टीरियोटाइप को नकार रही हैं. लेकिन जिस राजनीतिक दृढ़ता की जो जरूरत है, वह है नहीं.

राज्यसभा में हमने 2010 में संघर्ष कर ये बिल पारित कर दिया. मगर पांच मिनट की दूरी पर स्थित लोकसभा में ये अटका हुआ है. क्यों, क्योंकि पुरुष अपनी पावर छोड़ना नहीं चाहते.

आज पॉलिटिक्स में आने के लिए पैसे और पावर का जो खेल चल रहा है. तो ऐसे माहौल में औरत कैसे आ सकती है.

क्या राजनीति के इस स्तर के लिए तैयार नहीं हैं महिलाएं? नेतृत्व दे पाएंगी?
सुषमा: ये जो 'परकटी' शब्द लाकर कुछ नेता विधेयक रोकते हैं, वह गलत करते हैं. अगर महिलाएं एक शहर को बतौर नगर निगम मेयर चला सकती हैं, तो संसद और विधानसभा में काम क्यों नहीं कर सकतीं.

वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हरैसमेंट के बिल को लेकर तेजपाल प्रकरण में नए सिरे से बात हो रही है...
वृंदा: तेजपाल के मामले में गोवा सरकार जो कर रही है, वह सही है. मगर आप देखिए विशाखा बिल पास हो गया है. पर सरकार रूल्स तैयार नहीं कर पाई है अभी तक. पूरा सिस्टम सड़ा हुआ है इस मसले पर. ये केवल एक व्यक्ति तेजपाल की बात नहीं है.

दुनिया में महिलाओं की हालत देखते हुए भारत को कहां आंकती हैं आप...?
शीला: जब मैं यूएन में थी, तब इंदिरा पीएम थीं.तब मैंने एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में अमेरिकन लोगों से पूछा था कि हमारे यहां महिला पीएम है. आपके यहां प्रेजिडेंट बनने की कोई सोचता ही नहीं. वो जवाब देते कि महिलाएं इसलिए आगे नहीं आतीं कि उनको कोई पैसा नहीं देता.ये जवाब डेलिगेशन की हेड का था.तो हमारे यहां हाल इतना भी बुरा नहीं है.

वृंदा करात: हमारे यहां औरत की मदर इंडिया की इमेज बना दी जाती है, ठीक है. मगर काम के, खेती के सवाल पर, आर्थिक आजादी के सवाल पर औरत को आज भी किनारे लगा दिया जाता है. उसे संपत्ति में हिस्सा देने में दिक्कत होती है. उन्हें अपनी मेहनत का पूरा पैसा नहीं मिलता.दिल्ली में आपने देखा कि एक पढ़ी लिखी औरत ने एक आदिवासी महिला को मार मारकर काम कराया. तो मसला काम करने की स्वीकृति का है और हिंदुस्तान की राजनीति में उसकी पहचान नहीं है.

औरतों को क्या तर्क देकर राजनीति में खारिज किया जाता है?
सुषमा: राजनीति की बात करूं तो जब भी महिला का जिक्र आता, एक मिनट में यह कहकर खारिज कर दिया जाता कि जीत नहीं सकतीं. मैं पूछती क्या आप स्टांप पेपर पर लिखकर दे सकते हैं कि जितने पुरुषों को टिकट दिया गया वे सब जीतने वाले हैं. लोग समझते नहीं कि टिकट की दावेदारी करने तक एक महिला को कितना संघर्ष करना पड़ा. अगर कुंआरी है तो मां-बाप, परिवार को मनाना, विवाहित है तो और भी बड़े परिवार को मनाना. आप अपने आसपास के देशों में देखिए. अपने देश में देखिए. महिलाएं राजनीति में कितना बेहतर कर रही हूं.

वृंदा करात: ये आदमी के खिलाफ औरत की लड़ाई नहीं है. ये लड़ाई पुरुषवादी मानसिकता के खिलाफ है. उनके वर्चस्व के खिलाफ है.
शीला: जिस दिन पुरुष समझ जाएं कि महिलाओं की ये मांग कंपटीशन नहीं कॉम्प्लीमेंट्री यानी पूरक है, उस दिन मसला सुलझ जाएगा. याद रखिए महिलाएं पुरुषों का काम कर सकती हैं. मगर पुरुष महिलाओं का काम नहीं कर सकते.

वृंदा: मसला संस्कृति की टेक का भी है. ये कहां का सोचना है कि बेटियां सहारा नहीं बन सकतीं. बेटे ही बनते हैं. ये क्या तर्क है कि हम बेटियों के घर शादी के बाद जाकर नहीं रह सकते, उनके यहां खाना नहीं खा सकते. इन्हीं सबके चलते दहेज का चलन आता है.

सुषमा: प्रकृति ने हमें तमाम चीजों से संपन्न किया है. ममता अलग से दी है, जो पुरुषों में नहीं है. मैं इसके लिए शुक्रगुजार हूं.

एक लडाई और लड़नी है, वह है कि घरेलू काम करती या परंपरागत काम करती महिला के श्रम की आर्थिक महत्ता समझी जाए.
सुषमा: हर चीज को कीमत लगाकर नहीं समझा जा सकता. सवाल गरिमा और बराबरी का है.महिलाओं को बराबरी के नाम पर शेफ रूपी पति नहीं चाहिए. मगर जब दोनों दफ्तर से घर लौटते हैं, तो हर तरह के काम के लिए दोनों को तैयार लहना चाहिए.

वृंदा करात: जो पुरुष महिलाओं की मदद करते हैं, उन्हें हमारा समाज जोरू का गुलाम कहता है. ये सोच है.जो शराब पीकर जाते हैं. चीखकर बात करते हैं. उन्हें बहुत बड़ा मरद माना जाता है.मरद वो माना जाता है, जो घर में तानाशाह बन सके.

आप तीनों ने सार्वजनिक जीवन में बहुत संघर्ष किया है. क्या औरतों के लिए राजनीति में आना मुश्किल है?
शीला: पुरुषों के लिए स्वीकार्यता आसान है. जैसा सुषमा जी ने कहा. हमारे आते ही कहा जाता है कि अरे ये तो हार जाएगी. माना जाता है कि महिलाओं में जीतने की दृढ़ता नहीं है. आप देखिए जहां भी आरक्षण लागू किया, वहां महिलाएं सफलता से काम कर रही हैं.जरूरत ये है कि अब पुरुष राजनेताओं को संसद और विधानसभा में भी महिलाओं के आने का भय छोड़ देना चाहिए. महिलाएं बहुत एडस्ट कर सकती हैं. वे घर भी संभालेंगी और बाहर का काम भी. राजनीति की बात करूं तो भारत की बात हो या किसी और मुल्क की.कोई भी ऐसी महिला राजनेता नहीं है, जो परिवार के स्तर पर या राजनीति के स्तर पर असफल रही हो.

सुषमा: मसला सारा पहले प्रवेश का है. एक बार जब महिलाएं आ जाती हैं तो जो काम दिखाती हैं, वह काबिले गौर होता है. स्थानीय निकाय में 33 फीसदी आरक्षण आया, मगर जब अगली बार चुनाव हुए और परिसीमन बदला तो 35 फीसदी महिलाएं आईं. हुआ यूं कि महिला जनप्रतिनिधि इतनी लोकप्रिय हुईं कि जनरल सीट पर भी उन्हीं की डिमांड हुई.

अब मौजूदा हालात में समाधान क्या है?
वृंदा: एक ही रास्ता है. सब जोर लगाएं. लेफ्ट की बात करूं तो हम कोशिश करेंगे कि इसी सत्र में पास हो जाए. अगर कांग्रेस, बीजेपी और लेफ्ट चाह ले, तो कोई रोक नहीं सकता. नंबर्स हमारे साथ हैं.लेकिन मौजूदा या अब तक की संसद की बात करूं तो वहां भी पुरुषवादी मानसिकता हावी रहती है.

शीला दीक्षित: उपाय एक ही है कि जिस दिन महिलाओं को पॉलिटिकल पावर मिल गई तो अल्टीमेट हो जाएगा. आप कॉरपोरेट में देखिए, कितना अच्छा कर रही हैं. हम सब भाइयों में जो भय है, वह यह है कि जिस दिन महिलाएं 33 फीसदी से ज्यादा संख्या में संसद पहुंच गईं तो आपका पत्ता कट जाएगा.सवाल राजनीतिक बराबरी का है.

सुषमा स्वराज: केवल राजनीतिक भागीदारी की बात है. बाकी कहीं महिलाओं को आरक्षण नहीं चाहिए.बिना आरक्षण के महिलाएं अंतरिक्ष में पहुंच गईं, हिमालय पर चढ़ गईं. कहीं मोहताज नहीं हैं. मगर राजनीति में टिकट वितरण पुरुषों के हाथ है. इसलिए आरक्षण की बात हो रही है.

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