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एजेंडा आज तक में गुलाम अली ने जमाया रंग

जांनिसार अख्तर ने लिखा था, हमसे पूछो गजल क्या है और गजल का फन क्या है चंद लफ्जों में आग छिपा दी जाए...
एजेंडा आज तक में गुलाम अली ने जमाया रंग एजेंडा आज तक में गुलाम अली
सौरभ द्विवेदी [Edited by: कुलदीप मिश्र]नई दिल्ली, 04 December 2013

जांनिसार अख्तर ने लिखा था,
हमसे पूछो गजल क्या है और गजल का फन क्या है
चंद लफ्जों में आग छिपा दी जाए...
तलत अजीज ने गजल की बात यहां से बात शुरू की जिसे गुलाम अली और पंकज उधास की मकबूल आवाजों ने आगे बढ़ाया. मौका था एजेंडा आज तक के सेशन 'हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह' का. गजल के तीनों उस्तादों ने गायकी, शायरी और गजल के अदब पर बातें की और सुर भी छेड़े.

गुलाम अली ने शुरुआत में बताया कि गजल क्या है. एक जंगल में भागता हिरन जब किसी तीर का शिकार हो गया. तीर उसकी गर्दन में लगा. वह मरने लगा. तो मरते वक्त जो आखिरी आह निकली. आह बोलकर...उसको गजल कहते हैं.

तलत अजीज ने इस किस्से से बात आगे बढ़ाई. वह बोले- 'मैं बहुत छोटा था. हैदराबाद में था, सन 75 की बात है. ऐसे ही बैठे थे. मैंने कहा कि कैसे गाऊं न माइक है और हारमोनियम का स्टैंड नहीं है. तो जगजीत सिंह बोले कि तू गा न. मैं हारमोनियम पकड़ता हूं.'

फिर तलत अजीज ने सुनाई गजल...
कैसे सुकून पाऊं, तुझे देखने के बाद,
अब क्या गजल सुनाऊं, तुझे देखने के बाद
तेरी मिसाल ये है कि तू बेमिसाल है
तुझको कहां से लाऊं तुझे देखने के बाद

फिर शुरू हुआ किस्सों का दौर. माला सेखरी ने बताया कि गुलाम अली के लिए गाया था मल्लिका-ए-सुर नूरजहां ने गाना. तेरे मुखड़े पर काला काला तिल रे...गुलाम अली बोले कि सबसे बडे शायर वह थे, जिन्हें आज से 55 साल पहले गाया. रेडियो लाहौर के लिए मीर तकी मीर को गाया. सौदा को गाया. मोमिन को गाया.फिर उसके बाद फैज अहमद फैज और अल्लामा इकबाल को गाया. नासिर कादरी साहब को गाया. फराज को गाया. ये सब मेरे अजीज हैं.

इन अजीजों के बारे में बताकर गुलाम अली ने सुनाई गजल...नासिर काजमी साहब की. अब वह दुनिया में नहीं हैं...मगर लफ्ज दिलों में हैं...

तो खां साहब गाते हैं...
दिल में इक लहर सी उठी है अभी,
कोई ताजा हवा चली है अभी.
तुम तो यारों, अभी से उठ बैठे,
शहर में रात जागती है अभी

इसके बाद बारी आई अब तक खामोश बैठे पंकज उधास साहब की. उन्होंने शुरुआत गजल से की...
सबको मालूम है, मैं शराबी नहीं
फिर भी कोई पिलाए तो मैं क्या करूं
सिर्फ इक बार नजरों से, नजरें मिलें
और कसम टूट जाए तो मैं क्या करूं

इस गजल के बाद गुफ्तगू का रुख मुड़ा आजकल की ऑडियंस के मिजाज पर. तलत अजीज बोले कि रोमांस पुराना नहीं पड़ सकता, उसकी अदाएं बदल जाती हैं वक्त के साथ. उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी के एक्सप्रेशन बदले हैं. मगर मुहब्बत या तो होती है या नहीं होती. ये की नहीं जाती. बातचीत को आगे बढ़ाते हुए पंकज उधास बोले कि मेरी एक नज्म थी, जिसका वीडियो भी बना था. उसकी नई पीढ़ी बहुत बड़ी फैन हुई. तब मुझे लगा कि मुहब्बत की जुबान बदली नहीं है. जैसे तलत ने कहा कि हो सकता है कि अंदाज बदला हो. मगर मेरा मानना है कि मुहब्बत के इजहार के लिए उर्दू और गजल से बेहतर कोई जुबान नहीं हो सकती.

तलत अजीज ने सुनाया एक किस्सा. मोहतरमा आईं और बोलीं, गजल और उसकी उर्दू बहुत मुश्किल होती है. इस पर मैंने उन्हें सुनाय...अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा. मगर तुम्हारी तरह कौन मुझको चाहेगा. वह सुनकर बोलीं, वाह, क्या ये गजल है. मैंने कहा, जैसा आप समझना चाहें.

मुहब्बत पर बात हुई तो गुलाम अली का दखल बनता ही था. उन्होंने सुनाया बचपन के दिनों का किस्सा, जब लाहौर रेडियो के साथ इश्क की शुरुआत हो चुकी थी. नासिर काजमी की गजल. चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है. जिसकी धुन गुलाम अली ने बनाई थी. जिक्र हुआ तो सुर का आना लाजिमी था. सो गुलाम अली ने गाई गजल...

चुपके-चुपके रात दिन
आंसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिकी का
वो जमाना याद है...

फिर महफिल में जिक्र आया बॉलीवुड का और फरमाइश हुई तलत अजीज की फिल्म बाजार और उमराव जान में गाई गजलों की. मुखड़े की शुरुआत हुई राग बागेश्वरी में.

फिर छिड़ी रात बात फूलों की...

तलत ने बताया कि उस वक्त सिंगल टेक रेकॉर्डिंग की कोशिश होती थी. अस्सी के साल में इस गाने में साथ में लता जी थीं. तलत बहुत नर्वस थे, उन्होंने लता जी को बताया. लता जी ने पूछा क्यों, उन्होंने बताया कि आपके साथ गा रहा हूं, कहीं गलती न हो जाए. तो लता बोलीं कि आप तो अच्छा गाते हैं. तो तलत के मुंह से निकल गया, आपने कब सुना. तो लता दी ने बता दिया कि दूरदर्शन के किस प्रोग्राम के लिए सुना. फिर बाद में तलत को समझ आया कि लता दी उन्हें सहज करने के लिए ढाढस बंधा रही थीं. बहरहाल, बात गजलों की...उमराव जान की ये गजल, जो खुद तलत ने नहीं सोची थी कि इतनी मकबूल हो जाएगी.

जिंदगी जब भी तेरे बज्म में लाती है हमें
ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें
हर मुलाकात का अंजाम जुदाई क्यों है
अब तो हर वक्त यही बात सताती है हमें

आखिरी में तलत अजीज बोले कि गजल वाले किसी को थप्पड़ नहीं मारते, गाली नहीं देते, इसलिए खबरों में अमूमन नहीं आते. वरना दुनिया में गजल की पूछ खूब है.

गुलाम अली ने भारत प्यार का जिक्र किया. मई 1980 में वह पहली बार भारत आए थे. पहली बार मेंहदी हसन आए थे इक फोरम पर 79 में .उसके बाद गुलाम का सिलसिला शुरू हो गया.गुलाम अली बोले कि पाकिस्तान में लोग मुझसे प्यार करते हैं और खुश होते हैं कि ये हिंदुस्तान में जाकर अपना और मुल्क का नाम ऊंचा करता है.

इस पर तलत अजीज बोले कि बेहतर होगा कि अगर पाकिस्तान गुलाम अली को अपना ब्रैंड एंबैसडर बना दे. सारा मसला सुधर जाएगा. गुलाम अली बोले कि हां, सुर से सुर तो मिलना ही चाहिए.

तलत अजीज ने सुनाया अटल बिहारी वाजपेयी का एक किस्सा. वह पीएम रहने के दौरान छुट्टी मनाने केरल गए थे. वहां तलत अजीज परफॉर्म कर रहे थे. उन्होंने अटल से पूछा, आपकी कोई फरमाइश. वाजपेयी ने दो गजलें बताईं. एक अहमद फराज की और दूसरी फैज अहमद फैज की. दोनों मेहदी हसन की गाई हुई. तीनों पाकिस्तान के. मैंने गाईं और उनसे पूछा कि हमारी सियासत का क्या रंग और आपकी पसंद कहां. अटल बोले कि फन की क्या सरहद होती है मियां.

आखिरी में गुलाम अली, तलत अजीज और पंकज उधास ने गाया

कदम मिलाके चलो, अब कदम मिलाके चलो
ये भेदभाव धरम-जात सब मिटाकर चलो

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