एडवांस्ड सर्च

बहाने नहीं, कामकाज की उम्‍मीद

मनमोहन सिंह की 78 सदस्यीय कैबिनेट साफ-सुथरी तो है, लेकिन वह और छोटी हो सकती थी. बहरहाल, उसे अपनी साख बनाने के लिए काम करके दिखाना होगा. मंत्रियों की सूची । चुनाव परिणाम । शख्सियत । विश्‍लेषण । चुनाव पर विस्‍तृत कवरेज

Advertisement
प्रिया सहगल 30 June 2009
बहाने नहीं, कामकाज की उम्‍मीद

इस पूरी कवायद का जो अंत हुआ उसे एंटीक्लाइमेक्स ही कहा जा सकता है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने मंत्रिमंडल के गठन की कवायद में पूरे 11 दिन लग गए, जबकि दो दशकों में कांग्रेस को मिला यह सबसे बड़ा जनादेश था. बहरहाल, 78 मंत्रियों का जो दल चुना गया है उसमें अनुभव और विशेषज्ञता का मिश्रण है, लेकिन इसमें उन लोगों के लिए सहानुभूति का भी कोटा है, जिन्हें छोड़ा नहीं जा सकता था, भले मनमोहन ने इसके लिए भरपूर कोशिश की हो. उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल की हाल की बैठक में खुद कहा था कि यह ऐसा जनादेश है जो कोई बहानेबाजी नहीं सुनेगा.
 
सिर्फ चार सहयोगी दलों को मंत्रिमंडल में जगह देने के कारण उनके मंत्रिमंडल में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या अब तक की सबसे ज्‍यादा है. 33 कैबिनेट मंत्रियों में 27, और स्वतंत्र प्रभार वाले सात राज्‍यमंत्रियों में से छह कांग्रेस के सदस्य हैं. कांग्रेस के इतने ज्‍यादा सदस्यों के होने से प्रधानमंत्री अब सहयोगी दलों के अड़ियल नेताओं पर दोष नहीं मढ़ सकते, अब उन्हें काम करके दिखाना होगा.

यही नहीं, मंत्रियों के विभागों का बंटवारा करने में भी प्रधानमंत्री को काफी समय लग गया. लेकिन जब मंत्रियों की सूची सामने आई तो लगा इंतजार सफल रहा. इस बार अच्छा प्रदर्शन करने वालों को महत्वपूर्ण मंत्रालयों से नवाजा गया. दूसरी पांत के नेतृत्व को अधिक जिम्मेदारी दी गई है.
 
तेजतर्रार कपिल सिब्बल को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से नवाजा गया, जबकि सुव्यवस्थित तरीके से काम करने वाले सी.पी. जोशी को ग्रामीण विकास मंत्रालय दिया गया. मुखर अंबिका सोनी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय पुरस्कार में पाया, तो कड़ा परिश्रम करने वाले वीरप्पा मोइली को कानून मंत्रालय और जी.के. वासन को जहाजरानी का भार सौंपा गया.
 
प्रधानमंत्री हालांकि इनकार करते हैं लेकिन सूत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे इस बात पर अड़े थे कि महत्वपूर्ण मंत्रालय कांग्रेस के पास ही रहने चाहिए ताकि प्रधानमंत्री उनके कामकाज की प्रगति पर नजर रख सकें. राहुल गांधी की टोली को पार्टी संगठन में ही रखा गया है लेकिन कुछ चेहरों को मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई है. बेशक इसके पीछे मकसद कांग्रेस के युवा उत्तराधिकारी के लिए सरकार के स्तर पर भी टीम तैयार करना है. इसलिए जितिन प्रसाद और वासन को इस बार अपेक्षाकृत भारी मंत्रालय सौंपे गए हैं. वाक्‌पटु सचिन पायलट को मंत्रिमंडल में शामिल कर संचार मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया.
 
लोकसभा के 206 और राज्‍यसभा के 70 पार्टी सांसदों की भारी-भरकम संख्या भी वास्तव में एक समस्या ही है. जैसा कि अब लग रहा है, कांग्रेस के लिए अपने सदस्यों की अपेक्षा सहयोगी दलों को शांत करना कहीं ज्‍यादा आसान था. जातिगत और क्षेत्रीय हितों का ध्यान रखने के अलावा उन्हें नेताओं के महाकाय अहं को भी संतुष्ट करना पड़ा. एक हफ्ते से ज्‍यादा समय तक 13 बड़े कैबिनेट मंत्रियों को इंतजार करना पड़ा, जिन्हें शामिल तो कर लिया गया था लेकिन उनका मंत्रालय तय नहीं हो पा रहा था.

यहां तक कि छोटा-सा राज्‍य हिमाचल प्रदेश -जहां सिर्फ चार लोकसभा सीटें हैं-की भी अपनी विडंबना थी. पहले चक्र में प्रदेश से राज्‍यसभा सदस्य और पूर्व राज्‍यमंत्री आनंद शर्मा को शपथ दिलाई गई. इससे पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह खफा हो गए, जो इस राज्‍य से लोकसभा के अकेले कांग्रेसी सांसद हैं. मंडी के राजा वीरभद्र दबाव बनाने के खेल के पुराने खिलाड़ी हैं. उन्होंने मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए अपने समर्थकों को एकजुट कर लिया और टीवी कैमरों के सामने घोषणा की, ''मैं केंद्र में जाने के लिए तैयार हूं.'' अब सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को झुकना पड़ा. इस तरह खुशी से चहकते वीरभद्र सिंह ने दूसरे दौर में शपथ ले ली.
 
जहां छोटे-से राज्‍य हिमाचल से दो कैबिनेट मंत्री रहे, वहीं तीन राज्‍यों को, जहां से बड़ी संख्या में सांसद आए हैं, समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला. आंध्र प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से कुल 74 कांग्रेसी सांसद लोकसभा में चुनकर आए लेकिन आंध्र और राजस्थान को केवल एक-एक कैबिनेट पद मिला. उत्तर प्रदेश से, जहां कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी की है, एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं है, जबकि केरल जैसे छोटे-से राज्‍य से दो कैबिनेट और चार राज्‍यमंत्री शामिल किए गए. हां, यह सही है कि केरल में विधानसभा चुनाव 2011 में होने हैं और कांग्रेस मार्क्सवादियों को वहां से उखाड़ना चाहती है.
 
सोनिया गांधी से जब उत्तर प्रदेश की उपेक्षा के बारे में पूछा गया तो उन्होंने राहुल गांधी की ओर इशारा किया और कहा, ''वजह ये हैं. ये मंत्री बनने से इनकार कर रहे हैं. वे पार्टी के लिए काम करना चाहते हैं.'' सोनिया ने यह भी स्वीकार किया कि ''कैबिनेट गठन काफी मुश्किल भरा काम था. उसमें काफी मशक्कत करनी पड़ी.''
 
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2012 में होने हैं और यह राहुल के लिए दूसरी बड़ी परीक्षा होगी. यह भी एक कारण है कि उन्होंने खुद को कैबिनेट से बाहर रखने का फैसला किया. वे प्रदेश में कांग्रेस को फिर से जिंदा करना चाहते हैं. कैबिनेट में शामिल होने से इनकार की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, ''मैं एक बार में एक ही काम कर सकता हूं. उत्तर प्रदेश में पिछले पांच वर्षों में मेरी कड़ी मेहनत का फायदा मिला है. हमें उत्तर प्रदेश के लोगों को उम्मीद बंधाने की जरूरत है.'' लेकिन शपथ ग्रहण से उम्मीद और नाउम्मीदी, दोनों ही पैदा होती है.
 
बहरहाल, एक अच्छा संदेश यह दिया गया है कि अपनी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वाले बेनी प्रसाद वर्मा और पी.एल. पूनिया जैसे लोगों की जगह जितिन प्रसाद जैसे दून स्कूल के उनके सहपाठियों और पहली बार सांसद बने आर.पी.एन. सिंह जैसे वफादारों को तरजीह दी गई. जितिन प्रसाद दूसरी बार सांसद बने हैं और पूर्व मंत्री रहे हैं, जबकि आर.पी.एन. सिंह पूर्व विधायक और युवा नेता रहे हैं. इसी तरह पहली बार सांसद बने प्रदीप जैन को राहुल का पसंदीदा ग्रामीण विकास मंत्रालय दिया गया. वे इस मंत्रालय में राज्‍यमंत्री बनाए गए हैं. इन दोनों में अनुभव और जवानी का मिश्रण है.
 
आने वाले विधानसभा चुनावों को भी ध्यान में रखा गया है. चूंकि महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव अक्तूबर में होने हैं, इसलिए यहां से सात सांसदों को मंत्री बनाया गया है. दुर्भाग्य से यह तर्क हरियाणा के मामले में लागू नहीं होता, जहां से सिर्फ एक मंत्री (कैबिनेट) बनाया गया है जबकि यहां अगली जनवरी में चुनाव होने हैं. हरियाणा से एकमात्र सदस्य, सोनिया की पसंदीदा कुमारी शैलजा हैं जो पहले राज्‍यमंत्री रह चुकी हैं. इस बार उन्हें कैबिनेट का दर्जा दिया गया है, जिससे राज्‍य से कांग्रेस के आठ अन्य लोकसभा सांसद काफी नाखुश हैं. इतना ही नहीं, दिल्ली से कुल सात में से तीन सांसदों को मंत्री बनाया गया है.

हालांकि इस पूरी कवायद में कई दिल टूटे और निराश भी हुए. मिसाल के तौर पर अच्छी- खासी नेटवर्किंग रखने वाले गुलाम नबी आजाद एक बार और संसदीय मामलों के मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय से ही संतोष करना पड़ा. इंजीनियर से नेता बने पृथ्वीराज चह्वाण प्रधानमंत्री कार्यालय में बने हुए हैं लेकिन उन्हें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया है. दिलचस्प बात यह कि चह्वाण का मुख्य काम 10 जनपथ और साउथ ब्लॉक के बीच समन्वय करना है. पार्टी को इस काम के लिए कोई और नहीं मिल पाया, यह तथ्य ही पार्टी राजनीति के बारे में बहुत कुछ कह देता है.

अपनी दो खूबियों- महिला और दलित- की बदौलत हर बार मंत्री पद पाती रहने वाली मीरा कुमार को भी हाशिये में सरका कर जल संसाधन जैसा अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण मंत्रालय थमा दिया गया. असल में ऐसी ही दो खूबियां (अनुसूचित जाति और महिला) रखने वाली कृष्णा तीरथ को शायद कांग्रेस मीरा कुमार के स्थानापन्न के लिए तैयार कर रही है. शौकीन- मिजाज फारूक अब्दुल्ला ने पर्यटन मंत्रालय की मांग की थी लेकिन उन्हें कम महत्वपूर्ण अक्षय ऊर्जा जैसे मंत्रालय से संतोष करना पड़ा.
 
फिर भी प्रधानमंत्री में दृढ़ता की एक झलक दिखाई देती है. वे अर्जुन सिंह, हंसराज भारद्वाज, शीशराम ओला और सैफुद्दीन सोज जैसे नेताओं के बोझ से छुटकारा पाने में सफल रहे. मनमोहन सिंह ने ऐसे सेवानिवृत्त नेताओं को राज्‍यपाल पद की पेशकश का संकेत देते हुए कह चुके हैं कि ''जिन वरिष्ठ लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है, उनका इस्तेमाल कहीं और किया जाएगा.'' लेकिन उनका क्या हुआ जो इतने वरिष्ठ नहीं हैं, मसलन, ऑस्कर फर्नांडीस और अश्विनी कुमार. फर्नांडीस का उपयोग पार्टी संगठन में किए जाने की उम्मीद है, वहीं अश्विनी कुमार पार्टी प्रवक्ता के पद से कहीं अधिक स्थायी जिम्मेदारी की उम्मीद कर रहे थे.

इनकी जगह कुछ मिलीजुली भर्ती की गई हैं. इनमें नौ पूर्व मुख्यमंत्री हैं जिनमें अपने राज्‍य में सत्ता खोने वाले एस.एम. कृष्ण और वीरभद्र सिंह जैसे नेता शामिल हैं. फारूक अब्दुल्ला को भी अपने बेटे उमर अब्दुल्ला के लिए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ी थी. लेकिन इन लोगों के पास शासन का अनुभव है, इसीलिए इन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है. वित्त मंत्रालय के लिए प्रणब मुखर्जी को राजनैतिक रूप से निपुण होने के कारण मनमोहन सिंह के पसंदीदा नौकरशाह के मुकाबले तरजीह दी गई. वरिष्ठ स्तर पर प्रधानमंत्री ने अनुभव को ही महत्व दिया है.
 
मंत्रिमंडल में औसत आयु 66 वर्ष है. 2004 में यह 67 वर्ष थी. 29 सदस्य पहली बार मंत्री बने हैं (इनमें से 14 पहली बार सांसद चुने गए हैं), जिनमें फारूक अब्दुल्ला, विलासराव देशमुख, एस.एम. कृष्ण शामिल हैं. युवा ब्रिगेड में सचिन पायलट, जिन्होंने कांग्रेस के लिए 25 वर्ष बाद अजमेर की सीट जीती है, अपने प्रदर्शन के कारण मंत्रिमंडल में जगह पाने में सफल रहे हैं. युवा ब्रिगेड में ज्‍यादातर अपने वंश के बल पर राजनीति में आए हैं, न कि जनाधार अथवा जमीन से जुड़े कार्यकर्ता होने के कारण.

चुनाव प्रचार में अच्छे कामकाज के लिए भी कई नेताओं को पुरस्कृत किया गया है. जयराम रमेश, सलमान खुर्शीद, पृथ्वीराज चह्वाण और आनंद शर्मा के नाम इस सूची में शामिल हैं. जैसा कि बाद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, ''यह एक ऊर्जावान कैबिनेट है. इसमें अनुभव और युवा ऊर्जा का संतुलित मिश्रण है.'' स्वतंत्र प्रभार वाले उनके राज्‍यमंत्री भी ऊर्जा और अनुभव को ही प्रतिबिंबित करते हैं. इसके अलावा चार पूर्व युवा कांग्रेस अध्यक्षों को भी कैबिनेट में जगह दी गई है, जैसे आनंद शर्मा, अंबिका सोनी, मुकुल वासनिक और गुलाम नबी आजाद.

हालांकि प्रधानमंत्री ने पहले 100 दिन के लिए राजकाज का एक एजेंडा घोषित कर दिया है लेकिन अपने मंत्रियों को चुनने में उन्होंने 11 कीमती दिन बरबाद भी कर दिए. और इस पूरी कवायद ने जीत की चमक को कुछ हद तक फीका कर दिया. और अंत में यही कहा जा सकता है कि यह कोई छोटा या काम पर जोर देने वाला मंत्रिमंडल नहीं है. जैसा कि एक नए कैबिनेट मंत्री ने बताया कि इसमें पार्टी की बाध्यताओं और कामकाज पर बराबर जोर दिया गया है. उदाहारण के लिए, कर्नाटक को ज्‍यादा महत्व दिया गया है. हालांकि कर्नाटक में कांग्रेस सिर्फ चार सीटें ही जीत पाई लेकिन इसके पीछे वजह यह है कि इस राज्‍य में पार्टी को पुनर्जीवित करने का संदेश देना है, क्योंकि यहां भाजपा का प्रभाव है.
 
पार्टी ने सिर्फ 18 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 11 चुनाव जीतने में कामयाब रहे. इनमें से पांच मुस्लिम सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है. यह संख्या पिछली यूपीए सरकार से सिर्फ एक कम है. इसके अलावा जातीय पहलू को भी ध्यान में रखा गया है. इस तथ्य के बावजूद कि कांग्रेस को, खासकर उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों के  कारण सफलता मिली है, सिर्फ पांच मुसलमानों को ही शामिल करना अटपटा लगता है. इनमें से दो कांग्रेस से हैं. जहां तक दलित कोटे की बात है, इस बार 10 दलितों को शामिल किया गया है. 2004 में मनमोहन  मंत्रिमंडल में सात दलित और छह मुसलमान थे.

अंत में कहा जा सकता है कि महीन रस्सी पर चलकर संतुलन साधने के बाद प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी ने ऐसी टीम तैयार की है, जो काम करके दिखा सकती है. अब बस इन्हें करना इतना ही है कि बांहें चढ़ाकर काम शुरू करें और अपेक्षाओं पर खरे उतरें.
 
कुल 322 सांसदों का समर्थन मिलने से मनमोहन सरकार की दूसरी पारी को अपना एजेंडा लागू करने के लिए कहीं ज्‍यादा मजबूत जनादेश मिला है. कांग्रेस ने हमेशा यही दावा किया है कि शासन चलाने के मामले में वह एक सहज पार्टी है. मनमोहन सिंह को अब दिखाना होगा कि उनकी टीम हर चुनौती स्वीकार करने के लिए तैयार है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
  • Aajtak Android App
  • Aajtak Android IOS
Advertisement
पाएं आजतक की ताज़ा खबरें! news लिखकर 52424 पर SMS करें. एयरटेल, वोडाफ़ोन और आइडिया यूज़र्स. शर्तें लागू
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay