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अब लालू चले गांवों की ओर

पहले विधानसभा और अब लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने किया ग्रामीण इलाकों का रुख. मंत्रियों की सूची । चुनाव परिणाम । शख्सियत । विश्‍लेषण । चुनाव पर विस्‍तृत कवरेज

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अमिताभ श्रीवास्तव 02 June 2009
अब लालू चले गांवों की ओर

अब जब बिहार में लालटेन की रोशनी मंद पड़ने लगी है तो राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी हाशिये पर पहुंचे राजनैतिक की तरह वादे करना शुरू कर दिया है-यानी अब वे उसी जनता के बीच वापस लौटेंगे जिसने उन्हें अर्श पर बिठाया था और अब केंद्र की राजनीति में हाशिये पर धकेल दिया है. पूर्व रेल मंत्री ने सही समय पर क्षतिपूर्ति का काम शुरू कर दिया है.

मतलब यह कि वे बिहार के फतुहा विधानसभा क्षेत्र के लिए हो रहे उपचुनाव में रामविलास पासवान की पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में जमकर प्रचार के लिए उतरे. जनता दल (यू) के विधायक सरयुग पासवान के निधन के कारण यह सीट खाली हुई थी. लालू प्रसाद ने कहा भी कि दिल्ली के लिए उन्हें कोई जल्दबाजी नहीं है. वे कहते हैं, ''मैं बिहार के गांवों में समय गुजारूंगा. अब अपना पूरा समय पार्टी में दोबारा जान फूंकने में लगाऊंगा.''
लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने फतुहा आरक्षित क्षेत्र से पुनित राय को चुनाव मैदान में उतारा है. राय पासवान की बेटी के ससुर हैं. हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में पासवान और उनके भाई रामचंद्र पासवान को करारी शिकस्त का मुंह देखना पड़ा था.

यही नहीं, इसके अलावा भी लालू प्रसाद के पास बिहार पर अधिक ध्यान देने के कई कारण मौजूद हैं. उनके केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के सभी कयासों पर बृहस्पतिवार को उस समय विराम लग गया जब कैबिनेट गठन का काम पूरा हो गया. राजद के किसी भी नेता को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया.
 
यही नहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने से यह साफ हो गया है कि कांग्रेस और लालू प्रसाद के बीच संबंधों में तल्खी अब भी बरकरार है. अब वे पहले की तरह कांग्रेस के विश्वसनीय सहयोगी नहीं रहे हैं. देखने वाली बात यह है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के सिर्फ तीन ही सांसद हैं जबकि लोकसभा में राजद के चार प्रतिनिधि हैं. अब यह साफ हो गया है कि लालू प्रसाद ने सार्वजनिक तौर पर यह माना तो सही कि उन्होंने कांग्रेस की अनदेखी करके गलती की है, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के लिए उनके इस कदम के कोई मायने नहीं थे.

और तो और, राज्‍य कांग्रेस में यह बात और गहरी होती जा रही है कि दोस्ती के दिनों में भी लालू प्रसाद ने अपने सभी सहयोगी दलों को किनारे कर रखा था और चुनावी राजनीति में अपनी बात ऊपर रखते थे.

राज्‍य कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा दावा करते हैं, ''कई सामाजिक समूह हमारे साथ दोबारा जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, अगर हम राजद प्रमुख के साथ दोबारा आते हैं तो वह हमसे दूर हो जाएंगे. ये वर्ग लालू को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं और ये पूर्व मुख्यमंत्री को हराने वाले राजनैतिक गठबंधन के साथ हो जाएंगे. इससे साफ तौर पर राज्‍य की राजनीति में विभाजन रेखा खिंच चुकी है.''

कम से कम मौजूदा समय के लिए तो कांग्रेस लालू प्रसाद के साथ गठबंधन के लिए तैयार नहीं है क्योंकि पार्टी के बड़े नेताओं का मानना है कि लालू के साथ दोबारा आने से पार्टी के राज्‍य में पुनरुद्धार की सभी संभावनाओं और कोशिशों को धक्का पहुंचेगा. बदतर यह कि लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक हार के बाद लालू प्रसाद के समक्ष अपने पारंपरिक समर्थकों को खोने का खतरा भी पैदा हो गया है. राजद के पाले से खिसकने वालों में नया नाम उपेंद्र प्रसाद वर्मा का है जिन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दामन थाम लिया है. राजद में अपनी उपेक्षा की बात को लेकर वर्मा ने यह कदम उठाया है.

बिहार में 2010 में अगले विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में राज्‍य में लालू प्रसाद का नीतीश कुमार से सीधा मुकाबला है. लालू और पासवान दोनों ही इस समय रक्षात्मक मुद्रा में हैं. लालटेन की रोशनी को तेज करने के लिए लालू ने गांवों का रुख करने का फैसला लिया है. राजद प्रमुख पहले भी विपरीत परिस्थितियों से उबर चुके हैं. अब देखना यह है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में वे अपने विरोधियों को कड़ी टक्कर दे पाते हैं या नहीं.

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