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जब वी पी सिंह निर्दलीय चुनाव जीते

अमिताभ बच्चन के इलाहाबाद से इस्तीफा देने के बाद हुए उपचुनाव में वीपी सिंह निर्दलीय के रूप में ही कामयाब हुए थे. मजे की बात यह है कि इस उपचुनाव में 65 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे. चुनाव कार्यक्रम । शख्सियत । विश्‍लेषण । वीडियो । चुनाव पर विस्‍तृत कवरेज

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आज तक ब्‍यूरोलखनऊ, 11 May 2009
जब वी पी सिंह निर्दलीय चुनाव जीते वीपी सिंह

15 वीं लोकसभा में अपने बलबूते संसद पहुंचने की इच्‍छा लिए उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ रहे 563 निर्दलीय उम्मीदवारों में से कितने सफल होते है यह तो बाद की बात है मगर चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि पहले के आम चुनावों में अपवाद को छोड़कर अधिकतर अपनी जमानत तक नही बचा पाये हैं.

वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनावों में प्रदेश से कुल 481 निर्दलीय उम्मीदवार चुनावी समर में उतरे परन्तु इनमें से अमरोहा संसदीय सीट पर हरीश नागपाल ही चुनाव जीतने में सफल हो पाये बाकी सभी अपनी जमानत तक गंवा बैठे. चुनावी आंकड़ों पर नजर डाली जाये तो इन निर्दलीय उम्मीदवारों को प्रदेश में पड़े कुल मतों का सिर्फ 3.81 प्रतिशत मत ही हासिल हो पाया. जो निर्दलीय उम्मीदवार संसद तक पहुंचे उनमें से ज्यादातर मजबूत जनाधार और दमदार शाख्सियत वाले थें.

चुनावी इतिहास पर गौर किया जाये तो वर्ष 1952 में दो, 1957 में नौ, 1962 में पांच, 1967 में आठ, 1971 में दो तथा 1980 में एक निर्दलीय उम्मीदवार ने कामयाबी हासिल की थी जबकि वर्ष 1984 में कोई निर्दलीय प्रत्याशी जीत नहीं सका. इसी प्रकार वर्ष 1989 में दो, 1991 में कोई नहीं, 1996 और 1998 में एक-एक निर्दलीय जीत हासिल कर पाये परन्तु 1999 में कोई भी निर्दलीय सफल नहीं हो सका.

अमिताभ बच्चन के इलाहाबाद से इस्तीफा देने के बाद हुए उपचुनाव में वीपी सिंह निर्दलीय के रूप में ही कामयाब हुए थे. मजे की बात यह है कि इस उपचुनाव में 65 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे. वर्ष 1967 और 1971 के चुनाव में गोरखपुर संसदीय सीट से दिग्विजय नाथ तथा महंत अवैद्यनाथ अपनी प्रतिष्ठा और जनाधार के चलते निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते थे.महिला निर्दलीय उम्मीदवारों में मेनका गांधी का नाम सर्वोपरि आता है जिनहोंने पीलीभीत संसदीय सीट से वर्ष 1998 और 1999 में जीत की पताका फहरायी अलबत्ता यह जरूर था उनको भारतीय जनता पार्टी का समर्थन प्राप्त था.

निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने वालों में बरेली के धरती पकड़, कानपुर के घोड़े वालें, फर्रुखाबाद और कन्नौज संसदीय क्षेत्रों से इलाइची वाला ऐसे प्रत्याशी रहे हैं जो शौकिया तौर पर चाहे जो भी चुनाव हो उसमें खड़े होते रहे हैं. यह बात दीगर है कि यह तीनों प्रत्याशी चुनाव जीतना तो दूर अपनी जमानत भी नही बचा पाये पर प्रदेश व देश की चुनावी राजनीति में चर्चा का विषय जरूर बने रहे.

निर्दलीय प्रत्याशियों में से अधिकांश भले ही अपनी जमानत न बचा पाये हो पर एक उदाहरण कन्नौज संसदीय क्षेत्र में निर्दलीय प्रत्याशी इलाइची वाला का भी जिन्होंने राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के प्रत्याशी सत्यदेव त्रिपाठी से ज्यादा मत पाये और इसे लेकर इलाइची वाला बरसों तक राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने रहे.

कांग्रेस के दो बार विधायक रहे ठाकुर मेहरम सिंह ने बीते समय में चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों का जिक्र करते हुए बताया कि पहले राजनैतिक दलों के प्रत्याशी जातिगत और निजी क्षेत्रीय पकड़ को देखते हुए वोट काटू के रूप में निर्दलीय प्रत्याशियों को खड़ा कर दिया करते थे लेकिन अब दलीय प्रत्याशियों द्वारा पोलिंग एजेंट मतगणना एजेन्ट के रूप में और चुनावी खर्चो को बचाने और उनकी गाड़ियों का अपने लिए इस्तेमाल करने के इरादे से निर्दलीय प्रत्याशियों को खड़ा करने का चलन शुरु हो गया है.

इस बार भाजपा छोड़कर निकले कल्याण सिंह एटा संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं और यह उम्मीद भी की जाती है कि कल्याण सिंह 15वें लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के एकमात्र निर्दलीय प्रत्याशी हो सकते है जो संसद की दहलीज तक पहुंच जायें.

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