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मोदी@4: BJP शासन में दिखे फसाद के ये पांच नए ट्रेंड

साल 2014 में मोदी सरकार बनने के साथ देश भर में एक खास तरह की विचारधारा में तेजी देखी गई. भगवा अचानक रंग पकड़ने लगा. पहले से स्थापित एक खास विचारधारा और नए लोगों के बीच टकराहट बढ़ती चली गई.
मोदी@4: BJP शासन में दिखे फसाद के ये पांच नए ट्रेंड गोरक्षा के नाम पर हिंसा
मुकेश कुमार गजेंद्रनई दिल्ली, 22 May 2018

साल 2014 में मोदी सरकार बनने के साथ देश भर में एक खास तरह की विचारधारा में तेजी देखी गई. भगवा अचानक रंग पकड़ने लगा. पहले से स्थापित एक खास विचारधारा और नए लोगों के बीच टकराहट बढ़ती चली गई. इसी टकराहट ने अपराध को जन्म दिया. इस तरह मोदी राज में हमें फसाद का नया ट्रेंड देखने को मिला.

देश में गोरक्षा और गोसेवा की बात बहुत पहले से होती रही है. हमारे समाज में जानवरों के प्रति एक खास लगाव हमेशा देखा गया है, लेकिन साल 2014 के बाद अचानक गाय को लेकर एक खास वर्ग के लोग उत्तेजित हो गए. गोरक्षा के नाम पर हिंसा होने लगी. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच रियल और वर्चुअल दुनिया एक होती गई.

नई सरकार, नई फसाद, नया ट्रेंड

गाय के नाम पर हिंसा

पिछले कुछ वर्षों में गाय एक बड़ा मुद्दा बन गई है. हर जगह गोरक्षा, गाय की तस्करी, गोहत्या या गोमांस से जुड़ी खबरें पढ़ने को मिलती रही हैं. यह मुद्दा आज का नहीं है. बहुत पुराना है. लेकिन पिछले वर्षों में अचानक चर्चा का विषय सा बन चुका है. कहीं गोहत्या रोकने पर प्रदर्शन होते रहे, तो कहीं गोमांस के नाम पर किसी की जान ले ली गई.

साल 2015 में यूपी के दादरी के रहने वाले अख़लाक़ की जान गई, 2016 में ऊना में दलित युवकों की सरेआम पिटाई और 2017 के पहले हिस्से में अलवर ज़िले में पहलू खां को गाड़ी में गाय ले जाने पर जान गंवानी पड़ी. खुद प्रधानमंत्री से लेकर तमाम मुख्यमंत्री और नेता गोरक्षा के नाम पर हिंसा के खिलाफ बोलते रहे, लेकिन इसका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा.

दलितों का उत्पीड़न

हाल के वर्षों में दलित समुदाय के उत्पीड़न की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ी हैं. पहले इस तरह की जातीय हिंसा देखने को नहीं मिलती थी. ताजा मामला तो गुजरात के राजकोट का है, जहां एक दलित को चोरी के आरोप में पीट-पीट कर मार डाला गया. पिछले साल सहारनपुर में भड़की हिंसा भी जातीय संघर्ष का नतीजा था. महीनों चले इस मामले में कई लोगों की जान गई थी.

भीड़ का गैरकानूनी इंसाफ

नो अरेस्ट, नो टॉक, फैसला ऑन द स्पॉट...इस फिल्मी डायलॉग की तरह अचानक भीड़ ने पुलिस और जज का काम करना शुरू कर दिया है. पुलिस के पहुंचने से पहले ही भीड़ अपनी स्टाइल में किसी भी जुर्म की सजा सुना देती है. हाल ही में तमिलनाडु में 65 साल की एक बुजुर्ग महिला को बच्चा चुराने के आरोप में भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था.

हिन्दू-मुस्लिम रंग देना

आजकल हर मामले को हिन्दू-मुस्लिम का रंग देने की कोशिश की जा रही है. ऐसा लगता है कि पूरा समाज जाति और धर्म की दीवारों के बीच उलझा हुआ है. कश्मीर के कठुआ में हुए गैंगरेप केस को भी धार्मिक रंग दिया गया. बताया गया कि एक खास धर्म के लोगों ने धार्मिक परिसर के अंदर वारदात को अंजाम दिया. इसे लेकर पूरे देश में बहस हुई है.

सोशल मीडिया ट्रोलिंग

सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के साथ लोगों के बीच कई बार असहिष्णुता जैसी स्थिति देखी गई है. यदि किसी ने अपने कोई विचार या तस्वीर पोस्ट की है, तो लोग उसे ट्रोल करके परेशान करना शुरू कर देते हैं. फिल्मी सितारों से लेकर राजनीतिक हस्तियों तक इसके शिकार हुए हैं. कई सेलिब्रिटी इसी वजह से सोशल मीडिया को बॉय-बॉय कह चुकी हैं.

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