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'ससुराल से ज्यादा सड़कों पर सेफ हैं महिलाएं'
29 September, 2014
दिल्ली हाई कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने 2011 में पत्नी की हत्या के जुर्म में पति की उम्र कैद की सजा बरकरार रखते हुए आज कहा कि भारत में शादीशुदा महिलाएं अपने ससुराल की तुलना में सड़कों पर कहीं अधिक सुरक्षित हैं. न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता की बेंच ने प्रदीप नाम के एक शख्स की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की. बेंच ने कहा कि आरोपी प्रदीप का मौका-ए-वारदात से भागना उसके दोषी होने का सबूत है.

निचली अदालत ने प्रदीप को अपनी पत्नी की हत्या करने के अपराध का दोषी ठहराया था. बेंच ने कहा कि जब किसी विवाहिता की अपने घर में हत्या कर दी जाती है और वहां पति की मौजूदगी साबित हो जाती है तो कानूनन यह स्पष्टीकरण देना पति की जिम्मेदारी है कि उसकी पत्नी की मौत कैसे हुई और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो पति के खिलाफ गलत मतलब निकाला जा सकता है.

कोर्ट ने कहा कि भारत में यह देखा गया है कि हमारे समक्ष हत्या के मामले में हर 10वीं अपील करने वाला दोषी मुजरिम पति है और शिकार पत्नी है और अपराध की जगह ससुराल है. कोर्ट ने कहा कि हत्या के मामले में हमारे सामने आने वाली 10 में से नौ अपील, जिनकी अपराध की जगह घर से बाहर है और इसमें मृतक व्यक्ति पुरुष है. ऐसा लगता है कि भारत में शादीशुदा महिलाएं अपने ससुराल की तुलना में सड़कों पर कहीं अधिक सुरक्षित हैं.

गौरतलब है कि प्रदीप ने हाई कोर्ट का रुख कर अपनी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ दायर अपील में दलील दी थी कि उसे इस मामले में फंसाया गया है क्योंकि उसकी पत्नी की हत्या के वक्त वह मौके पर मौजूद नहीं था. पुलिस के मुताबिक 15 मई 2011 को उसे यह सूचना मिली थी कि यहां नजफगढ़ रोड पर एक मकान में एक व्यक्ति ने फावड़े से अपनी पत्नी की हत्या कर दी है.

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