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मां विंध्यवासिनी: आस्था का चमत्कारी धाम
7 February, 2014
मां विंध्यवासिनी
मां विंध्यवासिनी एक ऐसी जागृत शक्तिपीठ है जिसका अस्तित्व सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी रहेगा. यहां देवी के 3 रूपों का सौभाग्य भक्तों को प्राप्त होता है.

पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व तपोभूमि के रूप में वर्णित है. मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र है. देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है विंध्याचल की देवी मां विंध्यवासिनी. विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा की पवित्र धाराओं की कल-कल करती ध्वनि, प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरती है.

त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं. विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं. कहा जाता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे अवश्य सिद्वि प्राप्त होती है. विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं.

ऐसी मान्यता है कि सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता. यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्वि प्राप्त होती है. इस कारण यह क्षेत्र सिद्व पीठ के रूप में विख्यात है. आदि शक्ति की शाश्वत लीला भूमि मां विंध्यवासिनी के धाम में पूरे वर्ष दर्शनाथयों का आना-जाना लगा रहता है. चैत्र व शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां देश के कोने-कोने से लोगों का का समूह जुटता है. ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं. इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है.

विध्य पर्वत श्रृंखला (मिर्जापुर, यूपी) के मध्य पतित पावनी गंगा के कंठ पर विराजमान मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र है. देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है विंध्याचल. सबसे खास बात यह है कि यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं. ऐसा माना जाता है कि तीनों देवियों के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है. तीनों के केन्द्र में हैं मां विंध्यवासिनी. यहां निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं.

शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है. शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है. मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं. इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से पूजन होता है. शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं. शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है.

लगभग सभी पुराणों के विंध्य महात्म्य में इस बात का उल्लेख है कि 51 शक्तिपीठों में मां विंध्यवासिनी ही पूर्णपीठ है. नवरात्र के दिनों में मां के विशेष श्रृंगार के लिए मंदिर के कपाट दिन में चार बार बंद किए जाते हैं. सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट रात 12 बजे से भोर 4 बजे तक बंद रहते हैं. नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है. यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी तथा दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है. आधी रात के बाद रोंगटे खड़े कर देने वाली पूजा शुरू होती है. ऐसा माना जाता है कि तांत्रिक यहां अपनी तंत्र विद्या सिद्ध करते हैं. कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में मां मन्दिर की पताका पर वास करती हैं ताकि किसी वजह से मंदिर में न पहुंच पाने वालों को भी मां के सूक्ष्म रूप के दर्शन हो जाएं. नवरात्र के दिनों में इतनी भीड़ होती है कि अधिसंख्य लोग मां की पताका के दर्शन करके ही खुद को धन्य मानते हैं. कहते हैं कि सच्चे दिल से यहां की गई मां की पूजा कभी बेकार नहीं जाती. हर रोज यहां हजारों लोग मत्था टेकते हैं और देवी मां का पूजन जय मां विंध्यवासिनी के उद्घोष के साथ करते हैं.

मां के इस धाम में त्रिकोण यात्रा का विशेष महत्व होता है जिसमें लघु और बृहद त्रिकोण यात्रा की जाती है. लघु त्रिकोण यात्रा में एक मंदिर परिसर में मां के 3 रूपों के दर्शन होते हैं वहीं दूसरी ओर बृहद त्रिकोण यात्रा में तीन अलग-अलग रूपों में मां विंध्यवासिनी, मां महाकाली व मां अष्टभुजी के दर्शनों का सौभाग्य भक्तों को मिलता है.

बृहद त्रिकोण यात्रा में मां महाकाली के दर्शनों के बाद अगला पड़ाव आता मां अष्टभुजी का जहां आठ भुजाओं वाले रूपों में करती हैं अपने भक्तों का कल्याण. कहते हैं इस मंदिर में दर्शन करने के बाद ही भक्तों की बृहद त्रिकोण यात्रा पूर्ण होती है.

मां पीतांबरा का सिद्धपीठ
अब बात करते हैं झांसी के मां पीतांबरा का सिद्धपीठ की. मां का ये धाम अनोखा इसलिए है क्योंकि भक्तों को यहां मां अपने भक्तों को एक झरोखे से देती हैं दर्शन.

मां पीतांबरा! शत्रुओं को परास्त करने वाली, विजय का वरदान देने वाली, मुश्किलों को हरने वाली मां. इस सिद्धपीठ की विशेषता ही यही है कि यहां से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता, यहां कोई पुकार कभी अनसुनी नहीं रहती, राजा हो या रंक, मां के नेत्र सभी पर एक समान कृपा बरसाते हैं.

मां पीतांबरा ये सिद्धपीठ मध्यप्रदेश के झांसी के दतिया जिले में स्थित है. जिसकी स्थापना 1935 में परम तेजस्वी स्वामी जी के द्वारा की गई. मां पीतांबरा का जन्म स्थान, नाम, कुल आजतक रहस्य बना हुआ है. मां का ये चमत्कारी धाम स्वामी जी के जप और तप के कारण ही एक सिद्ध पीठ के रूप में देशभर में जाना जाता है.

चर्तुभुज रूप में विराजमान मां पीतांबरा के एक हाथ में गदा दूसरे में पाश, तीसरे में वज्र और चौथे हाथ में उन्होंने राक्षस की जिह्वा थाम रखी है. भक्तों के जीवन में मां के चमत्कार को आए दिन घटते देखा जा सकता है लेकिन इस दरबार में भक्तों को मां के दर्शन एक छोटी सी खिड़की से ही होते हैं. दर्शनार्थियों को मां की प्रतिमा को स्पर्श करने की मनाही है.

माना जाता है कि मां बगुलामुखी ही पीतांबरा देवी हैं इसलिए उन्हें पीली वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं. लेकिन मां को प्रसन्न करना इतना आसान भी नहीं है. इसके लिए करना होता है विशेष अनुष्ठान, जिसमें भक्त को पीले कपड़े पहनने होते हैं, मां को पीली वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं और फिर मांगी जाती है मुराद. कहते हैं विधि विधान से अगर अनुष्ठठान कर लिया जाए तो मां जल्द ही पूरी कर देती हैं भक्तों की मनोकामना. मां पीतांबरा को राजसत्ता की देवी माना जाता है और उसी रूप में भक्त करते हैं मां की आराधना. राजसत्ता की कामना रखने वाले भक्त यहां आकर गुप्त पूजा अर्चना करते हैं. मां पीतांबरा शत्रु नाश की अधिष्ठात्री देवी है तथा राजसत्ता प्राप्ति में माँ की पूजा का विशेष महत्व होता है.

मंदिर में मां पीतांबरा के साथ ही खंडेश्वर महादेव और धूमावती के दर्शनों का भी सौभाग्य मिलता है. मंदिर के दायीं ओर विराजते हैं खंडेश्वर महादेव जिसकी तांत्रिक रूप में की जाती हैं पूजा. महादेव के दरबार से बाहर निकलते ही दर्शन होते हैं दस महाविद्याओं में से एक मां धूमावती के. सबसे अनोखी बात ये है कि भक्तों को मां धूमावती के दर्शन का सौभाग्य केवल आरती के समय ही प्राप्त होता है क्योंकि बाकी समय मंदिर के कपाट बंद रहते हैं.

मां के वैभव से सभी की मनोकामना पूरी होती है. भक्तों को सुख समृद्धि और शांति मिलती है, यही वजह है कि मां के दरबार में दूर दूर से भक्त आते हैं, मां की महिमा गाते हैं और झोली में खुशियां भर कर घर ले जाते हैं.

 

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